गरीबों पर ताकतवर सरकारी अमले की लूट पर साधारण से अधिक सजा का कानून हो

संपादकीय
25 मार्च 2015

महाराष्ट्र की एक सरकारी खबर है कि वहां भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (एसीबी) ने पिछले बरस में जिन सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया है, उनमें ऐसे लोग भी हैं जो बलात्कार की शिकार महिला को सरकारी मुआवजे का चेक देने के पहले चालीस फीसदी रकम रिश्वत में ले रहे थे। ऐसे भी हैं जो कि कर्ज से दबे किसानों की आत्महत्या के बाद उनके परिवार को मिलने वाली मदद जारी करने के लिए रिश्वत ले रहे थे। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें गरीबी के रेखा के नीचे के एकदम ही भूखे और बेघर लोगों से, रोजी पर काम करने वाले मजदूरों से रिश्वत ली जा रही है। इसके साथ हम छत्तीसगढ़ के नागरिक आपूर्ति निगम में पकड़ाए भ्रष्टाचार को जोड़कर देखें, तो वैसे तो यह भ्रष्टाचार सीधे-सीधे गरीब के पेट में हाथ डालकर रिश्वत निकालने का नहीं है, लेकिन एक दूसरे हिसाब से यह गरीब के हक पर उसी तरह का डाका है, और इसमें लोगों ने करोड़ों रूपए बनाए हैं। छत्तीसगढ़ के नान-घोटाले में यह रिश्वत इसलिए दी जाती थी कि गरीबों को पीडीएस में मिलने वाले चावल में कितनी अधिक कनकी मिलाई जाए। लोग करोड़ों रूपए इसी बात का पा रहे थे कि छत्तीसगढ़ का विख्यात रियायती-चावल किस तरह कनकी में बदलकर गरीबों को दिया जाए, और रियायत की वजह से वे चुप रहकर जो मिल रहा है उसे ले लें। 
पाठकों को याद होगा कि हम पिछले बरसों में कई बार इस मुद्दे पर लिखते आए हैं कि जब ताकतवर तबका गरीबों और कमजोरों के खिलाफ कोई जुर्म करता है, तो उस पर सजा अधिक होनी चाहिए। कुछ हफ्ते पहले यूरोप के एक देश से खबर आई थी कि वहां पर एक बहुत महंगी गाड़ी के ट्रैफिक चालान पर लाखों रूपए का जुर्माना हुआ, क्योंकि उस देश में जुर्माने की रकम गाड़ी की कीमत के अनुपात में कम या अधिक होते चलती है। हम लंबे समय से इस बात की वकालत करते आ रहे हैं कि ताकतवर तबकों पर इसलिए भी अधिक जुर्माने और अधिक कैद का इंतजाम होना चाहिए क्योंकि वे अदालती कार्रवाई से बच निकलने की तमाम तिकड़में खरीदने की ताकत रखते हैं। दूसरी तरफ जब गरीबों के हक लूटे जाते हैं, तो न तो उनकी आवाज में अधिक दम रहता है, और न ही वे सरकार और अदालत में ताकतवरों के खिलाफ लड़ाई लड़ पाते हैं। तूफान के खिलाफ एक छोटे से दिए की लौ की तरह की यह लड़ाई बड़ी गैरबराबरी की रहती है, और ऐसे ही मुद्दों को लेकर सबसे अधिक लुटे हुए लोगों के बीच नक्सलवाद पनपा था, जो कि आज बढ़ते-बढ़ते देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बना हुआ है। 
छत्तीसगढ़ में भ्रष्ट सरकारी अमले की दौलत राजसात करने का कानून बना है, लेकिन सरकार इसका इस्तेमाल चुन-चुनकर करेगी, या एक नजर से सबको देखते हुए सबके खिलाफ इसका इस्तेमाल करेगी यह आने वाला वक्त बताएगा। हम अपनी तरफ से केन्द्र और राज्य सरकारों को यह सुझाव देते हैं कि जिसके अधिकार क्षेत्र में जिस जुर्माने और सजा को बढ़ाने का काम आता हो, उसे गरीबों के खिलाफ होने वाले जुर्म के लिए एक बहुत कड़ी सजा का इंतजाम करना चाहिए। एक ताकतवर जब दूसरे ताकतवर के खिलाफ जुर्म करे, तो उससे ऐसी बुरी नौबत नहीं आती, जैसी कि रिश्वत देने की नौबत आने पर गरीब की आती है। देश में बिल्कुल साफ-साफ दो अलग-अलग किस्म के कानूनों की जरूरत है, और ताकतवर और कमजोर के बीच फासले के पैमाने तय होने चाहिए, और ऐसे पैमानों पर जुर्माने और सजा का अनुपात सीधे-सीधे बढ़ जाने का इंतजाम रहना चाहिए। 
हम चीन में सरकारी और अदालती व्यवस्था के प्रशंसक नहीं हैं। लेकिन वहां भ्रष्ट लोगों को जिस तरह तेज रफ्तार जांच के बाद मौत की सजा तक दी जाती है, उसकी कुछ बातों से भारत को कुछ सीखने की जरूरत है। यहां पर भ्रष्ट लोग रंगे हाथों पकड़ाने के बाद नौकरी पूरी होने तक और अधिक ताकतवर कुर्सियों पर बिठा दिए जाते हैं, और उससे सरकार की सोच भी पता लगती है। छत्तीसगढ़ को एक कड़ी और ईमानदार नीयत से भ्रष्टाचार विरोध पर अमल करना होगा, वरना नक्सल हिंसा खत्म नहीं हो सकेगी। 

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