जमीन-कानून से परे भी विपक्ष के एक होने की ऐतिहासिक जरूरत

18 मार्च 2015
संपादकीय
मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ जिस तरह से कल विपक्ष की चौदह पार्टियां एक साथ सड़क पर आईं, उससे भारतीय लोकतंत्र में कमजोर पड़ चुके विपक्ष के लिए भी एक संभावना दिखती है। पिछले आम चुनाव में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को जो ऐतिहासिक बहुमत मिला है, उसके चलते देश में विपक्ष पूरी तरह ध्वस्त दिख रहा है, और राज्यों में भी जगह-जगह उसका हौसला पस्त है। संसद में ऐसी बुरी हालत बहुत कम होती है कि लोकसभा में विपक्ष का दर्जा पाने लायक भी कोई विपक्षी पार्टी न बचे। लेकिन एक लोकतंत्र की मजबूती मजबूत सरकार से न साबित होती, न चलती, उसके लिए एक मजबूत विपक्ष जरूरी होता है। इसलिए हम विपक्ष की एकता की आज यहां चर्चा करना चाहते हैं कि अतिमजबूत सरकार के मुकाबले कम से कम मामूली विपक्ष तो रहे।
कल का मुद्दा न सिर्फ गैरएनडीए पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण था, बल्कि भाजपा की सबसे पुरानी भागीदार, शिवसेना भी भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ है, और उसका भाजपा के साथ दूसरे मुद्दों पर भी टकराव कुछ ऐसा चल रहा है कि आज जब हम इस पर लिख रहे हैं, महाराष्ट्र में सत्ता में भागीदार शिवसेना राज्य सरकार के खिलाफ भी मुंबई बंद करवा रही है। ऐसे में विपक्ष के सामने कुछ दूसरे मुद्दों को लेकर भी एक बड़ी संभावना खड़ी होती है, जिनमें से कुछ मुद्दों पर हो सकता है कि एनडीए के घटक दल भी साथ आने, या भाजपा से असहमत होने को मजबूर होते हों। 
हमारे हिसाब से आज देश में सबसे भयानक मुद्दा भड़काई जा रही साम्प्रदायिकता है, और चाहे प्रधानमंत्री कार्यालय में दो राज्यों से साम्प्रदायिक कही जा रही घटनाओं पर रिपोर्ट ही क्यों न मांग ली हो, हकीकत यह है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से अब तक भाजपा के कुछ भगवा सांसद, और आक्रामक हिंदू संगठन देश में एक अभूतपूर्व हिंसक साम्प्रदायिकता और नफरत फैलाने में लगे हुए हैं, और एक कड़क प्रशासक की साख वाले नरेन्द्र मोदी बहुत रहस्यमय अंदाज में इस मोर्चे पर एकदम ही नरम और चुपचाप हैं। यह नौबत भारत के विपक्षी दलों को इस एक मुद्दे पर पूरी तरह से एक साथ आने की सबसे बड़ी वजह है, और इसका इस्तेमाल अब तक होते तो नहीं दिखा है। आज जरूरत यह है कि ऊपर की चर्चा के दो मुद्दों से परे भी और जो मुद्दे व्यापक और आम सहमति के हैं, उनके ऊपर विपक्ष को एक मोर्चा बनाना चाहिए जो कि न्यूनतम साझा सहमति का एक घोषणापत्र बनाए और केंद्र-राज्यों में एक साथ संघर्ष करे। पिछले आम चुनाव की बुलडोजर जैसी ताकत ने मोदी सरकार और उनके सहयोगी, समर्थक, और प्रशंसकों को कई किस्म की धर्मांध, कट्टर, और हिंसक साम्प्रदायिकता सुझाई है। ऐसे तमाम खतरों को लेकर विपक्ष को एक होने की जरूरत है।

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