हासिल से हिकारत, और हसरतों का पीछा

10 मार्च 2015
संपादकीय
दुनिया की एक सबसे चर्चित कंपनी एप्पल ने कल एक ऐसी हाथ घड़ी निकाली है जो कि सेहत का ख्याल रखेगी, लोगों को उठने-बैठने, चलने-फिरने की याद दिलाएगी, और भी वे तमाम काम करेगी जो कि एक फोन या कम्प्यूटर करते हैं। इसके साथ ही इसने अपने एक सबसे पतले लैपटॉप का उससे भी पतला एक नया मॉडल पेश किया है। और भी ढेरों कंपनियां रोजाना अपने सामानों में नई खूबियां जोड़कर सामने रखती हैं, और जिनके पास इन्हीं कंपनियों के इन्हीं सामानों के जरा से पुराने मॉडल रहते हैं, वे बेचैनी और हीनभावना के शिकार हो जाते हैं।
बाजार हसरतों पर चलता है। जिन लोगों को नए सामानों का शौक होता है, वे तमाम लोग किसी सामान को पा लेने के बाद उससे और अधिक खुशी नहीं पाते हैं, वे इसके बाद आए अगले सामान को देख-देखकर बेचैनी अधिक पाते हैं। उनके पास क्या है, इसकी अहमियत बड़ी जल्दी काफूर हो जाती है, और उनके पास क्या नहीं है, जो कि बाजार में है, या कि दूसरों के पास है वह बेचैनी की वजह बन जाता है। लोग जब तक पिछले सामान की खूबियों को समझ भी नहीं पाते, इस्तेमाल करना तो दूर है, तब तक वे दूसरी खूबियों के मोह में पड़ जाते हैं। 
यह बहुत मामूली सी बात हम महत्वपूर्ण मुद्दों के इस कॉलम में इसलिए लिख रहे हैं कि समाज का सबसे बड़ा मध्यमवर्गीय हिस्सा इसी बेचैनी का शिकार रहता है, और उसे इस अंतहीन मोह से अपने-आपको बचाना चाहिए। न तो हर दिन बाजार में आए सबसे नए मॉडल के बिना किसी का काम रूकता है, और न ही आज अपने पास का सामान इतना बेकार हो जाता है कि उससे काम न चल सके। लोग खर्च तो अपनी सीमा तक ही कर पाते हैं, या उससे कुछ बाहर निकलकर भी फिजूलखर्ची करते हैं, लेकिन मन में लगातार बना हुआ असंतोष, लगातार हीनभावना, और लगातार हसरत लोगों का सुख छीन लेते हैं। इसके बारे में एक बार हमने इसी पेज पर कहीं लिखा था कि हासिल से हिकारत, और हसरत का पीछा...।
समाज में बाजार की जिस रणनीति को और जिंदगी के जिस तौर-तरीके को उपभोक्तावाद कहा जाता है, उसकी वजह से मध्यमवर्ग पर  महंगाई की मार और बुरी हो जाती है। जगह-जगह से खबर मिलती है कि मनचाहा मोबाइल न मिलने पर किसी लड़के-लड़की ने खुदकुशी कर ली, या कई मामलों में यह भी सुनाई पड़ता है कि इस किस्म के महंगे शौक के लिए नौजवान पीढ़ी देह बेचने को भी तैयार रहती है। ऐसे में मन की तसल्ली एक बड़ी बात है। न्यूनतम जरूरतें जरूर पूरी हो जाएं, लेकिन शौक तो किसी को इतने ही करने चाहिए जितने की फिजूलखर्ची की औकात हो। इसके बिना लोगों को अपने पास की चीजों से खुशी पाने की कोशिश करनी चाहिए। हमेशा ही नई खरीददारी में समझदारी नहीं होती।

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