बेमिसाल विनोद मेहता

8 मार्च 2015
संपादकीय
देश के सबसे चर्चित और दमदार पत्रकारों में से एक विनोद मेहता के गुजर जाने पर हम अपनी सोच के खिलाफ जाकर भी इस कॉलम में संस्मरण-श्रद्धांजलि लिख रहे हैं। जिन लोगों के पीछे रह गए लोग, संगठन, या सरकार मीडिया को प्रभावित कर सके, उन लोगों के बारे में ईमानदारी से लिखना कुछ दिक्कत की बात हो सकती है, लेकिन विनोद मेहता के ऐसे कोई नामलेवा नहीं रह गए हैं, जो कि मीडिया को श्रद्धांजलि-लेखन के लिए कह सकें। इस अखबारनवीस का अपना शानदार काम ही आज देश भर में मीडिया के अधिकतर लोगों को उदास कर गया, कि अब वह आगे नहीं बढ़ेगा।
पिछले चार दशक में विनोद मेहता ने एक वयस्क अंग्रेजी पत्रिका डेबनॉयर से लेकर आज की एक कामयाब अंग्रेजी-हिन्दी पत्रिका आउटलुक तक कितने ही अखबार शुरू किए, जो कि एक-एक कर या तो बंद हो गए, या विनोद मेहता वहां से हट गए। लेकिन यह एक संपादक ऐसा रहा जिसने पत्रकारिता की असाधारण उत्कृष्टता के साथ-साथ असाधारण कामयाबी हासिल की, और जिसका लिखा हुआ कुछ भी बिना चर्चा के नहीं रहा। बहुत से लोग अभी सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि अपने किस्म का एक हौसलेमंद अखबारनवीस अब नहीं रहा, और उसके साथ ही वैसी पीढ़ी भी खत्म हो गई। हम पीढ़ी की बात पर जाना तो नहीं चाहते, लेकिन विनोद मेहता ने भारत की अंग्रेजी पत्रकारिता में जितने शानदार अखबार निकाले, उनका संपादन किया, वैसा कोई भी और नहीं कर पाया। उनके काम का कोई भी हिस्सा औसत या सतही दर्जे का नहीं रहा, और उन्होंने अनगिनत पत्रकारों को रूबरू काम सिखाया, और अपने काम की मिसाल से भी लोगों को बेहतर काम करने के लिए उकसाया।
उनके काम की जिन दो-तीन बातों की वजह से हम यहां आज लिखने पर बेबस हैं, उनमें से एक, एक अनोखी मौलिकता। उन्होंने जो नए अखबार शुरू किए, वे एक भीड़भरे अखबारी-बाजार में ताजगी की एक ऐसी लहर लेकर आए कि लोग उनके अखबार दो-चार दिन बाद भी पहुंचने पर बेसब्री से इंतजार करते हुए उनको पढ़ते थे। दूसरी बात उत्कृष्टता की, अपने किसी भी काम में उन्होंने पत्रकारिता के पेशे के सर्वोच्च पैमानों से नीचे कुछ नहीं किया। समाचार और विचार के बीच का फासला उन्होंने बड़ी गंभीरता से और हमेशा ही कायम रखा। अपने खुले हुए विचारों की वजह से उनकी पसंद और उनकी नापसंद बड़ी साफ रहती थी। और इतनी साफगोई बाजार में कम ही चलती है, नतीजा यह रहा कि एक-एक कर वे अपने शुरू किए हुए अखबारों से बाहर भी होते रहे, और फिर नए सिरे से, राख से उठकर वे खड़े हुए, और उन्होंने पहले से बेहतर अखबार निकाला। मुंबई में जिस वक्त उन्होंने इँडिपेंडेंट का संपादन किया, उस वक्त उस बाजार में उसी प्रकाशन समूह का टाईम्स ऑफ इंडिया पहाड़ जितना ऊंचा और बड़ा था। लेकिन इस नए अखबार की क्वालिटी ने पाठकों के एक तबके को अपने से बांध लिया था। एक खबर को लेकर महाराष्ट्र की क्षेत्रीय भावना इतनी बुरी तरह घायल हुई थी, कि वह उस अखबार और विनोद मेहता की उस कुर्सी दोनों का अंत साबित हुई। लेकिन फिर उन्होंने एक दूसरा शानदार अखबार इंडियन पोस्ट तैयार किया, और फिर वहां से हटने के बाद दिल्ली पहुंचकर पायोनियर नाम का एक बहुत अच्छा अखबार खड़ा किया। वे लगातार सिर्फ पत्रकार बने रहे, और प्रकाशन-कारोबारी नहीं रहे, इसके बावजूद वे एक के बाद एक अच्छा प्रकाशन तैयार करते रहे, और वहां से हटने पर, उसके बंद होने पर, उन्होंने अपनी लकीर को और आगे बढ़ाया।
विनोद मेहता ने पत्रकारिता में शानदार काम के लिए बेमिसाल बातें छोड़ी हैं, और जिन लोगों को इस पेशे में अपने काम को बेहतर करना है, उनके लिए इस देश में विनोद मेहता से ज्यादा अच्छी कोई मिसाल हमको नहीं दिखती है। आज जितने पत्रकार उनके गुजरने पर लिख रहे हैं, उनमें दर्जनों ऐसे हैं जिन्होंने विनोद मेहता के साथ काम किया था, और अपनी आज की काबिलीयत के लिए वे उन्हें याद कर रहे हैं। न सिर्फ इस पेशे में, बल्कि किसी भी पेशे में लोगों को मौलिक, उत्कृष्ट, और हिम्मती होने की इसी तरह जरूरत है, ताकि लोग उनसे सीख सकें, उन्हें याद रख सकें।

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