एक मुद्दे पर सदन का पूरा सत्र कुर्बान कर देना ठीक नहीं...

संपादकीय
26 मार्च 2015

छत्तीसगढ़ विधानसभा काम का ठिकाना नहीं रह गया। यह पूरा सत्र नान-घोटाले को कुर्बान हो गया। विपक्षी कांग्रेस सड़क से लेकर सदन तक लगातार बहुत आक्रामक और सक्रिय है, और उसके हाथ में नान घोटाले का एक बड़ा और मजबूत मुद्दा भी है। लेकिन इसी एक मुद्दे को लेकर पूरे के पूरे विधानसभा-सत्र को समर्पित कर देना कांग्रेस की एक रणनीतिक और राजनीतिक चूक है। संसद हो या विधानसभा, विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए इससे बड़ा मंच और कुछ नहीं हो सकता। और छत्तीसगढ़ में सरकार के नान-घोटाले से परे भी बहुत से विभागों से जुड़े मामले, हर जिले के मामले, हर किस्म के मामले घेरेबंदी के लिए पिछले विधानसभा सत्र के बाद से अब तक सामने आ चुके हैं। लेकिन उनमें से सिर्फ एक मामले को उठाकर कांग्रेस विधायक दल ने, और कांग्रेस पार्टी ने बाकी तमाम मुद्दों पर सरकार की घेरेबंदी का मौका खो दिया है। 
आज इस बात पर हम कुछ नया नहीं लिख पाते, अगर दो दिन पहले ही एक कानून के एक हिस्से के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला नहीं आया होता। सदन के समय की बर्बादी के खिलाफ हम हमेशा लिखते आए हैं, फिर चाहे किसी पार्टी की सरकार हो, या कोई पार्टी विपक्ष में हो। पिछले दस-पन्द्रह बरस में संसद और छत्तीसगढ़ विधानसभा में कांग्रेस और भाजपा की भूमिकाएं उलट-पुलट होते रही हैं, लेकिन जब भी सदन को रोका गया तब हमने यही बात लिखी कि प्रदेश की जनता के हक को, और विपक्ष की जिम्मेदारी को इतने लंबे वक्त तक, पूरे-पूरे सत्र तक अनदेखा करना लोकतंत्र का नुकसान है। अब हम यह मुद्दा उठाएं कि सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की जिस धारा को खारिज किया है, और जिसे असंवैधानिक करार दिया है, वह पूरा का पूरा कानून संसद में यूपीए सरकार ने रखा था, और विपक्षी भाजपा-एनडीए ने उसे समर्थन दिया था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि पिछले कुछ बरसों में आईटी एक्ट के तहत सरकारों की बदले की कार्रवाई के वक्त पर इसी जगह लिखते हुए हमने यह बात लिखी थी कि जब संसद में यह एक बहुत ही क्रूर और अलोकतांत्रिक कानून बनाया गया, तब संसद के सदस्यों को इसकी गंभीरता समझ नहीं आई। दरअसल जब-जब किसी कानून की बारीकियों पर विचार-विमर्श और बहस का मौका सदन के बहिष्कार में खो दिया जाता है, तो फिर हड़बड़ी में औपचारिकता निभाते हुए बिना किसी चर्चा के कई कानून पास हो जाते हैं। 
लोकतंत्र में असहमति और विरोध इनकी इतनी निरंतरता ठीक नहीं है कि संसदीय कामकाज की अनदेखी हो जाए। चाहे संसद में राहुल गांधी पर वेंकैया नायडू की टिप्पणी को लेकर बहिष्कार हो, या छत्तीसगढ़ में नान-घोटाले को लेकर कांग्रेस बहिष्कार करे, कोई भी नौबत सदन के बहिष्कार के लिए बार-बार और लंबे समय तक इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए। आज छत्तीसगढ़ विधानसभा का बजट सत्र खत्म होने के करीब है, और इस पूरे सत्र में बहुत सारे मुद्दों पर गंभीर चर्चा नहीं हो पाई। आंदोलन करने के लिए सड़क से लेकर राजभवन तक, और मीडिया से लेकर अदालत तक बहुत सी जगहें हैं जहां पर राजनीतिक दल उचित तरीके से मुद्दे को उठा सकते हैं। आज इस सत्र के खत्म होने के समय ऐसा लगता है कि लोकतंत्र की उत्पादक क्षमता और संभावना को कांग्रेस ने खो दिया है। और सरकार के लिए इससे अधिक सहूलियत की कोई बात नहीं हो सकती कि एक अकेले मुद्दे को लेकर विपक्ष उसे कई हफ्तों तक घेरता रहे, और बाकी मुद्दे धरे रह जाएं। हम पहले भी यह सुझा चुके हैं कि संसद या विधानसभा के भीतर जब तगड़ा विरोध दर्ज करना हो, तो विपक्ष को इतने मुद्दों को उठाकर सरकार को घेरना चाहिए और सदन के कामकाज को ओवरटाईम तक ले जाना चाहिए। हम इस सत्र में पिछले महीनों में हुए बहुत से मामलों को उठते हुए नहीं देख पाए, और संसदीय समय का एक बेहतर उपयोग होना चाहिए, वरना जनता और किस जगह अपने मुद्दों पर बात होते देख सकेगी? 

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