बिहार, उप्र, और ओडिशा नकल के अलग-अलग रंग

संपादकीय
22 मार्च 2015
बिहार की स्कूली परीक्षाओं में नकल की तस्वीरें गजब की हैं। कई मंजिला इमारतों की खिड़कियों पर चढ़-चढ़कर परीक्षार्थियों के घरवाले चिट पकड़ा रहे हैं। और यह हाल कई स्कूलों का तस्वीरों और वीडियो में आया है। कुछ लोग बिहार में इसे बेहतर हालत बता रहे हैं, क्योंकि कुछ बरस पहले तक घरवाले परीक्षा हॉल के भीतर पहुंचकर नकल करवाते थे। फिर मानो यह खबर काफी नहीं थी तो कल उत्तरप्रदेश की खबर आई है कि वहां एक कॉलेज में नकल रोकने पर प्राध्यापक को समाजवादी पार्टी के एक छात्र नेता ने पीटा। और आज ओडिशा की एक खबर है कि एक कॉलेज में नकल रोकने पर परीक्षार्थियों ने प्राचार्य को एक कमरे में बंद कर दिया। खुद छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चाम्पा जिले में इसी तरह की नकल होती थी, और इस बार माध्यमिक शिक्षा मंडल ने वेब कैमरे लगवाकर इंटरनेट से निगरानी करना तय किया था। 
बिहार में मुख्यमंत्री सहित कुछ दूसरे लोगों ने इन तस्वीरों को बिहार की हकीकत मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि बिहार में अधिक संख्या अच्छे परीक्षार्थियों की है, जो नकल नहीं करते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस किसी राज्य में लोग नकल से पास होते हैं, या कि मध्यप्रदेश जैसे राज्य में जहां पर कि व्यापम के तहत हुए भारी संगठित और सत्तारूढ़ भ्रष्टाचार के रास्ते से हजारों छात्र-छात्राओं ने मेडिकल कॉलेज जैसे दाखिले पाए, सरकारी नौकरियां पाईं, वहां पर जो काबिल, मेहनती, और प्रतिभाशाली छात्र-छात्राएं होते हैं, उनका भरोसा व्यवस्था और लोकतंत्र पर से उठ जाता है। दूसरी तरफ इन इम्तिहानों के बाद के कॉलेज या नौकरी पर जिन लोगों को जगह मिलती है, वे काबिल नहीं होते, और ऐसे में वह प्रदेश, वह विभाग, या वह कॉलेज प्रतिभाओं को पाने से रह जाते हैं। 
आज हम उन प्रदेशों को देखें जहां पर कि नकल की ऐसी संगठित और सालाना वारदातें नहीं होती हैं, तो वैसे प्रदेश तरक्की करके आगे बढ़ रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों को देखें, या महाराष्ट्र जैसे राज्य को देखें, तो वहां पर ऐसी संगठित नकल नहीं दिखती। और ऐसे राज्यों के लोग देश भर में भी बेहतर जगहों पर अधिक कामयाबी के साथ पहुंचते हैं, और देश के बाहर भी जाकर काम कर पाते हैं। जब पूरी दुनिया के कामकाजी लोगों के बीच मुकाबले होते हैं, तो वहां पर घरवाले जाकर नकल के पन्ने नहीं थमा सकते। इसलिए जिस किसी राज्य में यह नौबत है, उन्हें बहुत कड़ाई से इसे रोकना चाहिए। मध्यप्रदेश में व्यापम घोटाले के चलते मंत्री और अफसर, दलाल और राज्यपाल-परिवार जिस तरह से कानूनी शिकंजे में आ चुके हैं, वह एक अच्छी नौबत है। समाज में अगर लोगों को बराबरी के मौकों का उनका हक नहीं मिलेगा, तो चाहे वे जंगलों में पनपने वाले नक्सली न बन सकें, वे शहरों में रहते हुए भी समाज विरोधी और मुजरिम तो बन ही सकते हैं। 
जब लोगों को नकल करने से ही अच्छे नंबर मिल जाते हैं, पीएचडी मिल जाती है, नौकरी मिल जाती है, तो वे आगे गलत काम करते हुए अपने बच्चों के लिए भी नकल करवाने की ताकत जुटाकर रखते हैं। जिस तरह फूल के बीज से फूल उगते हैं, और कांटे के पौधे के बीज से कांटे उगते हैं, समाज में भी मुजरिमों के पैसों से उनकी अगली पीढ़ी के मुजरिम होने का खतरा अधिक रहता है। इसलिए सरकारों को बहुत ही कड़ाई से नकल जैसे जुर्म रोकने चाहिए, ताकि आम लोगों के मन में पढ़ाई और इम्तिहान के लिए, नौकरियों के मुकाबलों के लिए कुछ भरोसा बचा रहे। 

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