सोशल मीडिया पर आजादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का तगड़ा आदेश, और खतरे भी

24 मार्च 2015
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आज देश में बहुत बड़ी आबादी के लिए एक राहत लेकर आया है। सोशल मीडिया पर ताकतवर लोगों के बारे में, या किसी समुदाय के बारे में जरा सी बात लिखने पर देश भर में अलग-अलग पार्टियों के राज में भी लोगों की गिरफ्तारियां हो रही थीं। खासकर सत्ता पर बैठे हुए नेताओं पर जरा सा कार्टून बनाकर पोस्ट करने, एक लाईन लिखने, या आगे बढ़ाने पर थानेदार के स्तर पर ही गिरफ्तारी हो रही थीं। अब सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की एक धारा को असंवैधानिक करार देते हुए खारिज कर दिया है। इसी धारा के तहत पुलिस को यह असीमित अधिकार मिल गया था कि वह किसी को भी गिरफ्तार कर पा रही थी। अदालत ने कानून के इस हिस्से को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकार के खिलाफ बताते हुए कहा कि किसी एक व्यक्ति के लिए जो बात अपमानजनक हो सकती है, वह दूसरे के लिए नहीं भी हो सकती। अदालत ने केंद्र सरकार के इस आश्वासन पर भी सोचने से भी इंकार कर दिया कि इस कानून का बेजा इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। अदालत के आज के आदेश के बाद सोशल मीडिया की पोस्ट को लेकर कोई शिकायत होने पर आईजी से नीचे के दर्जे के किसी पुलिस अफसर को गिरफ्तारी-आदेश देने का अधिकार नहीं रह गया है।
हम लगातार इसी सोच को लिखते आए हैं, और बार-बार हमने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत की है। लेकिन अदालत की बात के साथ-साथ हम यह भी लिखते आए हैं कि लोगों को भी इस आजादी का इस्तेमाल करते हुए खुद होकर एक जिम्मेदारी समझना चाहिए, ताकि देश की पुलिस और अदालतें सोशल मीडिया की जरा-जरा सी बहसों में न फंसें। भारत में एक दिक्कत इस आईटी कानून के साथ-साथ और भी है जिसका शिकार प्रिंट मीडिया भी रहते आए है, और मीडिया के बाहर की अभिव्यक्ति भी उसके घेरे में फंसते आई है। इस देश में धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने का आरोप किसी को भी सीधे गिरफ्तारी तक पहुंचा देता है। कुछ मामलों में यह सचमुच जुर्म के दर्जे की चोट होती है, लेकिन बहुत से मामलों में ऐसे विचार न हिंसक होते हैं, न आपत्तिजनक होते हैं, फिर भी धार्मिक समुदाय या सत्ता के दबाव में थाने के स्तर पर ही लोगों की गिरफ्तारी हो जाती है, और यह नौबत सुप्रीम कोर्ट के आज के इस आदेश से बदलेगी या नहीं, यह खुलासा अभी नहीं हुआ है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जो विचार इस आदेश में सामने आए हैं वे विचार सोशल मीडिया से परे भी पुराने और परंपरागत आम मीडिया पर भी, आम मीडिया के भी, अभिव्यक्ति के अधिकार को एक अधिक हिफाजत देंगे। हमारा यह मानना है कि विचारों से संबंधित मामले चाहे वे धार्मिक ही क्यों न हों, उन पर पहली पुलिस रिपोर्ट के आधार पर थाने के स्तर पर ही कोई गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। पुलिस का आईजी स्तर का अफसर आज के संचार-युग में महज एक फोन कॉल की दूरी पर रहता है, और हर किस्म की अभिव्यक्ति के मामले इसी वरिष्ठ स्तर पर विचार किए जाने चाहिए। 
लेकिन हम बार-बार एक दूसरी बात भी लिखते आए हैं कि सूचना तकनीक, कम्प्यूटर, इंटरनेट, और सोशल मीडिया ने मिलकर आम जनता को एक ऐसी असीमित तकनीकी-आजादी दे दी है, कि उसका बहुत खुलकर बहुत ही हिंसक, साम्प्रदायिक, और आतंकी इस्तेमाल भी हो रहा है। किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश के बाद भी, इसके दबाव में आए बिना अपनी कड़ी कार्रवाई की जिम्मेदारी पूरी करनी होगी, और इसके लिए हो सकता है कि हर प्रदेश में साइबर-जुर्म के लिए आईजी स्तर का एक जानकार व्यक्ति कानूनी सलाहकार के साथ तैनात किया जाए जो कि ऐसे मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की भावना और उसके आदेश को देखते हुए देश-प्रदेश में अमनचैन के लिए जरूरी कार्रवाई करे। 

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