नवजात संतानों को तो ले गए माताओं को मरने छोड़ गए...

30 अपै्रल 2015
संपादकीय

नेपाल से लगातार दिल दहलाने वाली जो खबरें आ रही हैं, उनमें एक खबर भूकंप के बाद की, और भूकंप से परे की ऐसी है जिसे हैवानों पर भरोसा करने वाले लोग हैवानियत कहेंगे। इजराइल के समलैंगिकों ने अपने बच्चे पैदा करने के लिए भारत और नेपाल की गरीब महिलाओं को छांटा था, और किराए की कोख में ये बच्चे सैकड़ों की गिनती में पल रहे हैं, और पैदा भी होते जा रहे हैं। इजराइल की संपन्नता और वहां का कानून, नेपाल की गरीबी और वहां के बेबस-उदार कानून के साथ मिलकर एक ऐसी नौबत बना चुके हैं कि इजराइल समलैंगिक मामूली भुगतान करके नेपाल में अपने बच्चे पैदा करवाते हैं, और ले जाते हैं। 
अभी लगातार वहां से तस्वीरों के साथ ऐसी खबरें आ रही हैं कि इजराइल से फौजी विमान आकर अपने ऐसे समलैंगिक पिताओं और उनके नवजात बच्चों को लेकर वापिस जा रहे हैं। लेकिन इस देश और इसके ऐसे पिताओं में यह रहम भी नहीं है कि साथ-साथ वे ऐसे बच्चों की माताओं को भी ले जाएं। नतीजा यह है कि दूध पीते ऐसे बच्चे अपनी माताओं से भी दूर जा रहे हैं, और उनको जन्म देने वाली माताएं इस तरह वहां पर मरने के लिए छोड़ दी गई हैं। एक तरफ तो दुनिया के कई देश मदद के लिए नेपाल पहुंच रहे हैं और राहत में जुटे हुए हैं, दूसरी तरफ बच्चे पैदा करवाने के अपने मकसद के पूरे होते ही दुनिया के सबसे संपन्न और सबसे हिंसक इस देश, इजराइल की जनता और सरकार, दोनों ने इतनी भी नरमी नहीं दिखाई कि कुछ दिनों के लिए सही इन बच्चों की माताओं को भी साथ ले जाते। 
इसी तरह की एक दूसरी लापरवाही इसमें सामने आई है कि नेपाल को पहुंची पाकिस्तान की राहत सामग्री में गोमांस से बने हुए खाने के लिए तैयार सामानों के पैकेट भरे हुए हैं। नेपाल एक हिंदू राष्ट्र है, और वहां पर गाय को मारने के खिलाफ कड़ा कानून है, और आबादी का कम से कम एक बड़ा हिस्सा तो गोमांस नहीं खाता होगा। ऐसे में पाकिस्तान इस मदद को भेजने से पहले थोड़ी सी सावधानी बरत सकता था। हम यह भी नहीं मानते कि पाकिस्तान ने सोच-समझकर ऐसा किया होगा क्योंकि इससे एक तो उसका सामान खर्च हुआ, और दूसरा उसे बदनामी और नाराजगी हासिल हुई। लेकिन फिर भी यह एक बहुत मामूली समझ की बात है, और किसी भी देश की सरकार को यह तो समझ में आना ही चाहिए था। खासकर पाकिस्तान की बात करें तो इस मुस्लिम देश में कुछ जानवरों के गोश्त के खिलाफ सामाजिक वातावरण भी है, और मुस्लिमों के बीच जानवरों को मारने के तरीके को लेकर भी एक नियम-कायदा है। ऐसे में गोमांस भेजते हुए पाकिस्तान ने एक बुनियादी और न्यूनतम समझ का इस्तेमाल भी नहीं किया।
भूकंप से होने वाले नुकसान की मोटी-मोटी खबरों के बीच इन बारीक पहलुओं पर हम इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि इससे परे भी जिंदगी में बहुत से ऐसे मौके आते हैं जब लोग बेहतर और संवेदनशील इंसान बन सकते हैं, या लोगों की भावनाओं को चोट पहुंचा सकते हैं।

पड़ोसी के काम आना बुनियादी जिम्मेदारी, वाहवाही कैसी?

29 अपै्रल 2015
संपादकीय

देश में जब एक उग्र राष्ट्रवाद छाया हुआ रहता है, तो लोग छोटी-छोटी बातों पर दूसरे देशों से अपनी तुलना करने लगते हैं, और चुनिंदा तथ्यों को लेकर एक गौरव का अनुभव करने लगते हैं। यमन से हिंदुस्तानियों को निकाला गया, और अब नेपाल से हजारों भारतीय वापिस लाए जा रहे हैं, तो इसे लेकर भारतीय सेनाओं, और भारतीय नेताओं के गौरव के गीत गाए जा रहे हैं। कुछ ऐसी तस्वीर बनाई जा रही है कि भारतीय सेनाओं ने बहुत बड़ी बहादुरी का काम किया है। 
जो लोग सेना के काम और उनकी जिम्मेदारियों को नहीं जानते हैं, वे ही ऐसा सोच सकते हैं। दरअसल सेना जिस किस्म की जंग के लिए तैयार की जाती है, और तैयार रहती है, उसमें जान का खतरा इससे भी हजार गुना अधिक रहता है। लेकिन देश के भीतर, और देश के बाहर मुसीबत के वक्त सेनाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे राहत और बचाव के काम के लिए सरकार के निर्देश पर पहुंचें, और जिंदगियां बचाने का काम करें। बहुत से देशों की सेना, अद्र्धसैनिक बल, प्रदेशों में पुलिस ऐसा काम हमेशा ही करती हैं। यह काम अपनी जान को अपनी जिम्मेदारी के मुकाबले अधिक बड़े खतरे में डालकर दूसरी जान बचाने का हो, तो वह उल्लेखनीय होना चाहिए। लेकिन जब किसी बड़े खतरे के बिना अपने काम को ही लोग करते हैं, उसे लेकर एक गैरजरूरी गौरव ठीक नहीं है। 
बहुत से लोग अपने नियमित कामकाज के लिए वाहवाही और ईनाम की उम्मीद करते हैं। बहुत से देश जरा-जरा सी बात में एक झूठे आत्मगौरव का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में लोगों को अपना रोज का न्यूनतम काम भी दूसरों पर अहसान लगने लगता है। जिस तरह सरकारी सेवा में किसी के ईमानदार रहने पर बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि वे देश-प्रदेश पर कोई अहसान कर रहे हैं, उसी तरह लोग मामूली कामों को बहादुरी करार देने को देशभक्ति मान लेते हैं। गौरव के लायक कौन सी बातें हैं, और किन बातों के लिए लोग तनख्वाह पाकर काम करते हैं इनके बीच फर्क करना जरूरी है। ऐसा न होने पर गौरव का महत्व हट जाता है। 
नेपाल में आज जो खबरें आ रही हैं, वे वहां की अखबारों में छपी ऐसी जानकारी है जो कि भारत के आत्मगौरव का वजन कम करने वाली हैं। वहां के अधिकारियों का कहना है कि भारत से पहुंचे बचाव दल जितना योगदान दे रहे हैं, उससे कई गुना अधिक योगदान देने का प्रचार कर रहे हैं। इस विवाद की बारीकियों में गए बिना यह याद रखना चाहिए कि पुराने जमाने से एक नसीहत चली आ रही है कि नेकी कर, दरिया में डाल। मतलब यह कि अपने किए किसी अच्छे काम के लिए वाहवाही की उम्मीद में नहीं पडऩा चाहिए। पड़ोसी के काम आना एक बुनियादी जिम्मेदारी होनी चाहिए, और अपने नागरिकों को बचाना तो एक बुनियादी जिम्मेदारी तो है ही। इसके लिए तारीफ की कोशिश करने से जिम्मेदारी का महत्व भी घट जाता है।

सोशल मीडिया पर साजिश के तहत फैलते झूठ उजागर करें

संपादकीय
28 अप्रैल 2015
सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब हर इंसान के लिए यह आसान हो गया है कि वे झूठ फैला सकें। इसके लिए सिर्फ इंटरनेट तक खुद की या उधारी की पहुंच, कम्प्यूटर या मोबाइल फोन, और दिल में बदनीयत होना काफी है। इसकी ताजा मिसाल है गुजरात भूकम्प के वक्त की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मदद की तस्वीरों को आज नेपाल के राहत कार्य के जिक्र के साथ दुबारा पोस्ट करना, और यह लिखना कि संघ के बीस हजार स्वयं सेवक नेपाल पहुंच रहे हैं। खुद आरएसएस ने इस जानकारी को गलत बताया और कहा कि ये तस्वीरें पुरानी हैं। लेकिन इस बीच झांसे में आकर भाजपा के ही कुछ बड़े नेताओं ने इस झूठ को आगे बढ़ा दिया कि इतने स्वयं सेवक नेपाल जा रहे हैं। आरएसएस ने तो तुरंत ही उसके बारे में फैलाए झूठ को उजागर कर दिया, लेकिन बहुत से आम लोग ऐसे रहते हैं जो कि यह जानते भी नहीं कि उनके बारे में फैलाया गया झूठ कहां-कहां तक पहुंचा है, और उसे कैसे दुरूस्त किया जा सकता है। 
लोगों को याद होगा कि दो बरस पहले जब उत्तराखंड में कुदरत की मार हुई थी, और दस-बीस हजार लोग मारे गए थे, तब सोशल मीडिया पर एक बात को फैलाया गया था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसा दावा किया है कि वे अपने विमान और गाडिय़ों के काफिले लेकर देहरादून पहुंचे थे और दसियों हजार गुजरातियों को वहां से निकाल ले गए थे। इंटरनेट पर बारीकी से जांच करने पर आसानी से यह पता लग जाता था कि ऐसा कोई दावा मोदी ने नहीं किया था, बल्कि किसी पत्रकार ने किसी लेख में ऐसी बात लिखी थी, और उसी बात को मोदी के दावे की शक्ल में पहले फैलाया गया, और फिर उसकी निंदा की गई। आज कम्प्यूटर पर तस्वीरों से छेडख़ानी करना इतना आसान हो चुका है कि कोई भी तस्वीर बनाकर पहले किसी के दावे की तरह उसके समर्थन में लगती हुई फैलाई जाए, और फिर उसका एक साजिश के तहत बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया जाए कि किसी ने ऐसा दावा किया था। पहले एक झूठ, और फिर उस झूठ को झूठ बताते हुए दूसरा झूठ। 
आज आम लोगों को भी सावधान रहने की जरूरत है। इस अखबार के नंबरों पर हमें बहुत से समझदार लोगों के भी संदेश मिले कि अमरीकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने यह भविष्यवाणी की है कि रात कितने बजे दुबारा भूकम्प आएगा। लोग झूठ और अफवाह को तुरंत आगे बढ़ा देते हैं, बिना यह सोचे कि उससे कितना नुकसान हो सकता है। और झूठ को विश्वसनीय बनाने के लिए बड़ी-बड़ी संस्थाओं और वैज्ञानिक संगठनों का नाम भी जोड़ दिया जाता है। भारतीयों को याद होगा कि इंटरनेट और टीवी के आने के पहले यहां पर कोई अफवाह फैलाने के लिए रेडियो बीबीसी के नाम का इस्तेमाल किया जाता था कि बीबीसी ने ऐसा कहा है। उस रेडियो की विश्वसनीयता इतनी थी कि वह अफवाहबाजों और साजिशबाजों के बड़े काम आती थी। लोगों ने गणेश को दूध पिलाने के लिए भी बीबीसी के नाम का इस्तेमाल किया था। 
सोशल मीडिया पर लोगों के किए हुए गलत काम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों कानून और पुलिस के हाथ कुछ बांधे हैं। लेकिन ऐसे में समाज और लोगों पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे अपने पास आने वाली अफवाहों को पहले जांच-परख लें, और सही मिलने पर ही, जरूरी होने पर ही आगे बढ़ाएं। लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि जब वे किसी झूठ को आगे बढ़ाते हैं, तो वे एक जुर्म में हिस्सेदार तो हो ही जाते हैं, वे अपनी विश्वसनीयता भी खो बैठते हैं। आज किसी को बदनाम करना हो तो उसके नाम से बड़े-बड़े दावों को प्रचारित कर दिया जाए, और फिर उसे बदनाम किया जाए कि वह अपने बारे में झूठे दावे फैलाता है। आज सोशल मीडिया पर ऐसे जिम्मेदार और जागरूक लोगों की जरूरत है जो कि बदनीयत से फैलाए जाते ऐसे झूठ का खंडन भी करते चलें, और हकीकत भी बताते चलें, ताकि लोगों में जिम्मेदारी लौट सके। 

हर बरस हजारों करोड़ की टालने लायक बर्बादी

27 अप्रैल 2015
संपादकीय

जब दूसरी जगहों पर बड़े-बड़े हादसे होते हैं, तब लोगों को अपने आसपास के छोटे-छोटे हादसों और छोटी-छोटी मुसीबतों की गंभीरता कम लगने लगती है। छत्तीसगढ़ देश के बीच ऐसी जगह बसा हुआ है कि यहां समुद्री तूफान नहीं आता, भूकम्प से तबाही भी नहीं होती, बाढ़ भी जानलेवा नहीं होती, और कुदरत की किसी और तरह की मार भी बहुत जोरों की नहीं पड़ती। नतीजा यह होता है कि यहां पर छोटे-छोटे खतरों से लोग बेफिक्र हो जाते हैं। अभी एक पखवाड़े से रोज खबरें छप रही हैं कि मोबाइल फोन कंपनियां किस तरह से बिना इजाजत सार्वजनिक जगहों पर खतरनाक टॉवर लगाए जा रही हैं, न भुगतान, न इजाजत, और न खतरे का अंदाज। और इस तरह के काम बहुत सी निजी कंपनियां कर रही हैं, और उन पर कोई रोक नहीं है। हर कुछ महीनों में बड़ी बुरी आंधी आती है और इमारतों पर लगे हुए बड़े-बड़े होर्डिंग्स से सिंथेटिक फ्लैक्स के चीथड़े उड़कर बिजली के तारों से लिपट जाते हैं, होर्डिंग्स तारों पर गिर जाती हैं, और घंटों तक बिजली बंद रहती है। लेकिन दस-बीस बरस से हम ऐसे हर मामले के बाद म्युनिसिपल और प्रशासन की तरफ से चेतावनियां सुनते हैं, जिन पर अमल आज तक कभी देखने नहीं मिला। अब यह सुनने मिल रहा है कि शहर के बीच से बनी एक नई रोड को होर्डिंग्स से मुक्त रखा जाएगा, मानो उसी एक सड़क को खूबसूरत बनाना है, उसी एक सड़क को खतरे से दूर रखना है। 
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थानीय प्रशासन और म्युनिसिपल का, सरकार के विभागों का जो हाल है, जाहिर है कि प्रदेश के बाकी शहरों में उससे बेहतर तो नहीं हो सकता। रोजाना अखबारों में अलग-अलग विभागों की खबरें छपती हैं, तस्वीरों सहित सुबूत छपते हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती और बरस-दर-बरस वही हाल जारी रहता है। ऐसे में सरकार के अंधाधुंध खर्च की उपयोगिता पर भी सवाल उठता है, और यह भी लगता है कि जिस शहर में राज्यपाल-मुख्यमंत्री से लेकर तमाम मंत्रियों और प्रदेश के आला अफसरों की इतनी बड़ी बसाहट है, वहां भी अगर सरकारी कामकाज की खामियां मीडिया में सामने आने के बाद काबू नहीं आतीं, तो फिर और किस जगह उन पर काबू हो सकेगा? 
कई सरकारी अहातों के बारे में पिछले बरसों में ऐसी खबरें सरकारी अफसरों के बयानों के साथ छपी हैं कि कहीं भी कोई भी इमारत बननी शुरू हो गई, उसकी योजना नहीं है, उसकी इजाजत नहीं है, और उसे तोडऩे की नौबत आ सकती है। करोड़ों के खर्च से काम शुरू होते हैं, फिर उनको तोड़ दिया जाता है, फुटपाथ की जगह सड़क, और सड़क की जगह डिवाइडर का सिलसिला इस राजधानी में राज्य बनने के बाद से कुछ ऐसा चल रहा है कि मानो स्कूल का कोई बच्चा स्लेट-पट्टी पर चॉक से लकीरें खींचकर मिटा रहा हो। जनता का इतना बड़ा पैसा दीवारों को बनाने और गिराने पर खर्च हो रहा है, सड़कों को बनाने, और फिर उनके नीचे पाईप डालने के लिए उनको तोडऩे पर खर्च हो रहा है। बार-बार सड़कों की चौड़ाई कम या अधिक होती है, और डिवाइडर की जगह बदल जाती है, फुटपाथों की जगह बदल जाती हैं। कभी वहां पेवमेंट ब्लॉक लगाए जाते हैं, और फिर जल्द ही उनको हटाकर कांक्रीट कर दिया जाता है। 
म्युनिसिपल से लेकर राज्य सरकार तक, और आरडीए से लेकर हाउसिंग बोर्ड तक, अनगिनत पढ़े-लिखे इंजीनियर हैं, लेकिन जो हमारी मामूली समझ में खामियां दिखती हैं, उनको मानो सरकार में बैठे लोग सोच-समझकर, जान-बूझकर अनदेखा करते हैं, क्योंकि बड़े-बड़े निर्माण में, और बड़ी-बड़ी तोडफ़ोड़ में बड़ी-बड़ी दिलचस्पियां जुड़ी रहती हैं। देश के बहुत से शहरों में कांक्रीट के उठाए जाने वाले ऐसे ढांचे बनाए जाते हैं, जिनको कहीं भी रखकर सड़क का डिवाइडर बनाया जा सकता है, और बाद में क्रेन से उठाकर हटाया जा सकता है। लेकिन ऐसी मामूली सी बात भी छत्तीसगढ़ में आज तक इस्तेमाल नहीं हुई है। इन तमाम लापरवाहियों में राज्य के हजारों करोड़ हर बरस बर्बाद हो रहे हैं, और जनता के किसी जागरूक मंच को सरकार के सामने जोरों से इन मुद्दों को उठाना चाहिए। राज्य में विपक्ष ऐसी बातों को देखने के बजाय एक-दो मुद्दों को रोज एक सीडी की तरह बजा रहा है। 

हेलमेट कड़ाई से लागू होता तो गृहमंत्री के भाई बच जाते

संपादकीय
26 अप्रैल 2015

कल छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री के बड़े भाई एक मोटरसाइकिल हादसे में गुजर गए। मोटरसाइकिल फिसली, और सिर पत्थर से टकराया, और जान चली गई। अब तक की खबरों के मुताबिक उन्होंने हेलमेट नहीं लगाया हुआ था। आमतौर पर हेलमेट किसी हादसे में सिर को तो बचा ही लेता है, और बाकी चोटें मामूली रहती हैं, और जान बच जाती है। 
अब देखें तो छत्तीसगढ़ में पिछले दो-तीन बरस से मुख्यमंत्री के स्तर पर कई बार यह कोशिश हुई कि दुपहिया चलाने वालों, और उन पर पीछे बैठने वालों के लिए हेलमेट लागू किया जाए। शहरों में पुलिस ने दसियों हजार लोगों से जुर्माना भी वसूल किया, और पूरे प्रदेश में लाखों लोगों ने हेलमेट खरीद भी लिया। लेकिन फिर पुलिस ढीली पड़ी, और जनता में जागरूकता और जिम्मेदारी की, आत्मरक्षा की समझ की इतनी कमी है, कि उसने हेलमेट ताक पर रख दिए। लोगों का रूख इस देश में कुछ ऐसा रहता है कि हेलमेट उनके अपने सिर की हिफाजत के लिए नहीं, पुलिस के कानून की हिफाजत के लिए रहता है। लोग चोरों की तरह गलियों से निकल जाते हैं, लेकिन अपनी जान बचाने वाला यह सामान इस्तेमाल करने से बचते हैं। छत्तीसगढ़ में शासन-प्रशासन ने जो ढिलाई इस मामले में दिखाई है, वह अगर मामूली सी कड़ाई भी बरती जाती, तो हो सकता है इस प्रदेश के गृहमंत्री के भाई आज जिंदा होते। 
मुख्यमंत्री और राज्यपाल की तरफ से ऐसी हर मौतों के बाद श्रद्धांजलि के संदेश आते हैं, लेकिन अगर सरकार अपनी इस न्यूनतम जिम्मेदारी को पूरा नहीं करती है, तो ऐसे संदेशों के क्या मायने हैं? इसी देश में दूसरे प्रदेशों में बड़ी साधारण सी सरकारें कड़ाई से हेलमेट लागू कर चुकी हैं। राजस्थान के जयपुर में देखें, तो दुपहियों के पीछे की सीट पर बैठी हुई घाघरा पहनी, घूंघट निकाली हुई महिलाएं भी हेलमेट पहनकर बैठती हैं, और इसे लागू करने के लिए वहां किसी बंदूक की जरूरत नहीं पड़ी, पुलिस ने नियमों को ठीक से लागू किया, और हर बार जुर्माना देने के बजाय लोग जिम्मेदार हो गए। इतनी आसान सी बात छत्तीसगढ़ में क्यों नहीं हो पाती, यह समझना नामुमकिन है। हेलमेट लागू करवाने के लिए मुख्यमंत्री खुद दुपहिए पर सड़कों पर निकले थे, और आधी-चौथाई जनता राजधानी रायपुर में हेलमेट लगाते दिखने भी लगी थी। और अब तो हर किस्म के चुनाव भी निपट चुके हैं, और मूर्ख जनता खुद होकर जिस जिम्मेदारी का महत्व नहीं समझ पाती, उसे ट्रैफिक जुर्माने के साथ उसके सिर पर थोपने की जरूरत है। आज लोग घायल होकर जब सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हैं, तो उन पर खर्च तो सरकार का ही होता है। जब लोग सरकार के दिए हुए इलाज के कार्ड को लेकर निजी अस्पतालों में पहुंचते हैं, तो वह पैसा भी सरकार का ही दिया हुआ होता है। ऐसे में हेलमेट लागू नहीं करना, कारों के सीट बेल्ट का नियम लागू नहीं करना, तेज रफ्तार गाडिय़ों वालों के लोगों के लाइसेंस निलंबित या रद्द नहीं करना, सरकार की गैरजिम्मेदारी है। 
एक जनकल्याणकारी सरकार को जनता को नियम-कायदे सिखाने का कड़वा काम भी करना चाहिए। बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जिनको लोग खुद नहीं समझ पाते, खुद जिन पर अमल नहीं कर पाते। ऐसी बातों के लिए सरकार को अपना जिम्मेदारी का काम करना चाहिए। छत्तीसगढ़ में हेलमेट और सीट बेल्ट सहित सड़कों के तमाम नियम अगर सरकार कड़ाई से लागू करे तो हर बरस हजारों जिंदगियां यहां पर बचेंगी, और दसियों हजार लोग स्थायी विकलांगता के साथ जीने को मजबूर नहीं होंगे। आज इस राज्य की सरकार सड़कों के ढांचे बनाने में और शहरों को खूबसूरत बनाने में हर बरस दस-बीस हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है। लेकिन इन सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए अपना दिल भी कड़ा नहीं कर पा रही है। राज्य के गृहमंत्री, जो कि पुलिस और ट्रैफिक के भी जिम्मेदार हैं, उन्होंने कल ही अपना भाई खोया है। किसी सरकार के लिए दुख के ऐसे मौके से बड़ा कोई दूसरा मौका एक कड़ा संकल्प लेने के लिए नहीं हो सकता। मुख्यमंत्री इस काम को अपनी प्राथमिकता मानकर पूरे प्रदेश में सड़क सुरक्षा कड़ाई से लागू करें। 

किसी और को लगी ठोकर से बाकी को सबक लेना चाहिए

संपादकीय
25 अप्रैल 2015

नेपाल से शुरू हुआ भूकम्प भारत के दर्जन भर राज्यों तक फैल गया और कुछ घंटों से बस भूकम्प ही चर्चा में है। रिक्टर पैमाने पर भूकम्प खासा तेज था, लेकिन तबाही के अब तक आने वाले आंकड़े राहत के हैं, और अधिक मौतें अब तक खबरों में नहीं आई हैं। भारत पड़ोसी नेपाल की मदद के लिए यहां से सुरक्षा बलों, राहत कर्मियों को भेजने की बात कर रहा है। लेकिन इससे बहुत अधिक तबाही वाले भूकम्प भारत खुद झेल चुका है, और आने वाली जिंदगी न सिर्फ भारत के लिए बल्कि और देशों के लिए भी कई किस्म की कुदरती तबाही लेकर आ सकती है। नेपाल से खासे दूर बसे हुए छत्तीसगढ़ में भी मंत्रालय सहित प्रदेश के बहुत से शहरों में बहुत सी इमारतें हिलीं, और लोग बाहर निकले। 
इस मौके पर हम अपनी एक पुरानी राय दुहरा रहे हैं कि ऐसे कुदरती हादसों से लेकर आधुनिक जीवन की टेक्नालॉजी के हादसों तक के लिए हर देश-प्रदेश, और हर शहर के कैसे तैयार रहना चाहिए। वैसे तो आपदा प्रबंधन की योजना केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक हर किसी के एजेंडा में है, लेकिन हकीकत यह है कि बुरी नौबतों को सोचकर अच्छी-खासी तैयारी की योजना भी कागज पर नहीं है। आज जब सड़कों का आल-जाल चारों तरफ फैला हुआ है, और हिन्दुस्तान का तकरीबन हर हिस्सा किसी न किसी किस्म की संचार तकनीक की पहुंच में है, और बचाव-राहत की कई किस्म की क्षमता चारों तरफ बिखरी हुई है, तो सरकारों को इनका एक ऐसा इंटरएक्टिव नक्शा बनाना चाहिए जिससे कि बचाव-राहत की जरूरत और उसकी क्षमता का अच्छे से अच्छा मेल कराया जा सके। 
हमारी निजी जानकारी यह है कि गांव-गांव तक फैली हुई तरह-तरह की मशीनों वाली गाडिय़ों, कस्बों तक फैले हुए अस्पतालों, और चारों तरफ मौजूद रक्तदानदाता, इन सबको लेकर ऐसी कोई योजना सरकार की नहीं है जिससे कि हादसे की जगह के सबसे करीब के साधनों को कम्प्यूटर की एक क्लिक से देख लिया जाए, और एक एसएमएस से किसी इलाके में खबर चली जाए, और अलग-अलग क्षमताओं के तबकों के समूह बनाकर उनसे मदद मांगी जाए। आज ऐसी तमाम सहूलियत मौजूद होते हुए भी आपदा प्रबंधन की योजनाओं से न तो जनता को जोड़ा गया है, और न ही जनता की ताकत, मदद की उसकी संभावना का नक्शा बनाया गया है, उसे ऐसे मौकों के लिए तैयार किया गया है। 
न सिर्फ भूकम्प, बल्कि देश के कई इलाकों में समुद्री तूफान आते हैं, केदारनाथ की पिछली बरस की तबाही सबकी देखी हुई है, कश्मीर में बाढ़ सबकी देखी हुई है, और असम की बाढ़ से लेकर भुज के भूकम्प तक का इतिहास लोगों को याद है। ऐसे में देश भर से अगर प्रशिक्षित और ताकतवर, समर्पित लोगों को किसी बचाव नेटवर्क से जोड़ा जा सके, और बोली, खूबी, के आधार पर देश भर से लोगों को जरूरत के मुताबिक किसी प्रदेश में भेजा जा सके, तो तबाही और मौतों को कुछ कम किया जा सकेगा। आज मोटे तौर पर केन्द्र और राज्य की सरकारें अपने खुद के बचाव-राहत कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मचारियों तक अपनी ताकत सीमित रखती हैं। जबकि देश भर की जनता के बीच मदद करने का हौसला रखने वाले करोड़ों लोग हैं, और उन सबको एक राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेटवर्क से जोडऩे की जरूरत है। 
देश के हर हिस्से में मौजूद बचाव और इलाज, मदद और राहत की क्षमता का नक्शा बनना चाहिए, और जिस तरह गूगल के अंतरिक्ष से उपग्रह से बनाए गए नक्शे में छोटे से छोटे हिस्से को देखा जा सकता है, उसी तरह का नक्शा राहत-बचाव के लिए बनना चाहिए, जिससे कि कोई भी पल भर में देख सके कि सबसे करीब की क्रेन कहां है, उसके मालिक या ड्राइवर के नाम-नंबर क्या हैं, सबसे करीब किस सुविधा वाला कौन सा अस्पताल है, आसपास रक्तदाता कौन हैं, वैकल्पिक सड़कें कौन सी हैं, इस किस्म की सैकड़ों बातों की तैयारी जो प्रदेश न करे, उसका आपदा प्रबंधन महज एक सरकारी खानापूरी रहेगा। आज भूकम्प कहीं और आया है, तो वहां मदद करने के साथ-साथ भारत के प्रदेशों को अपनी खुद की मदद की योजना बहुत बारीक बातों तक बनाना चाहिए। 

ये पिशाच और हैवान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही हैं...

संपादकीय
24 अप्रैल 2015

मुम्बई की एक दिल दहलाने वाली खबर कल वहां के एक अखबार में छपी और उससे बहुत अनमने ढंग से थोड़ा सा हिस्सा लेकर हम यहां लोगों का दिल दहलाने को बेबस हुए। वहां एक छोटी सी खोली में रहने वाले एक गरीब परिवार की दस-बारह बरस की दो बच्चियों के साथ उन्हीं के दो बालिग भाई बरसों से बलात्कार करते आ रहे हैं, और इसकी शिकायत करने पर उनकी मां ने ही बच्चियों को आग से दागा, और कहा कि भाई जैसा चाहते हैं, वैसा ही करें। एक कमरे के इस घर में मां की मौजूदगी में ही रोजाना यह हिंसा चलती रही, और मां ने बच्चियों को स्कूल से भी निकलवा दिया था ताकि वे स्कूल में किसी को यह बात न बता सकें। 
इस घटना को हिन्दुस्तान के अधिकतर लोग दरिंदगी, हैवानियत, और मानसिक बीमार परिवार जैसे लेबल लगाकर अनदेखा करना चाहेंगे कि दुनिया में ऐसे भी लोग होते हैं। लेकिन इस बात को कम ही लोग मानना चाहेंगे कि उनके आसपास भी, उनके बीच भी ऐसे लोग होते हैं। एक तरफ यह मामला नाबालिग बच्चियों के देह-शोषण का है और दूसरी तरफ यह मामला वर्जित संबंधों का भी है। भारत के अधिकतर हिस्से में, और दुनिया के भी अधिकतर समाजों में परिवार के भीतर जिन रिश्तों में देह संबंध वर्जित रहते हैं, उनमें भाई-बहन का संबंध सबसे ऊपर आता है। लेकिन यह सारी सामाजिक व्यवस्था, और ये प्रतिबंध इंसानी बदन बनने के करोड़ों बरस बाद हाल के हजार-दो हजार बरस के भीतर के हैं। प्रतिबंध सामाजिक हैं, और देह आदिम हैं। बदन और इंसान की सोच, उसकी देह की जरूरतें, इन सबका समाज व्यवस्था से अधिक लेना-देना नहीं रहता। जब तक किसी इंसान की बेबसी होती है, वे समाज व्यवस्था को मान लेते हैं, जब तक उनको ठीक लगता है, तब तक उसे मान लेते हैं। लेकिन जब इस व्यवस्था को तोड़कर, इससे परे जाकर अपने निजी सुख या फायदे की बात होती है तो लोग अपने-आपको सबसे पहले देखते हैं। 
मुम्बई की जिस खबर को लेकर हम आज यहां चर्चा कर रहे हैं, वह खबर जरूरत से कुछ अधिक भयानक जरूर है, लेकिन बहुत अनोखी नहीं है। छोटे पैमाने पर, दो-चार बार के देह-शोषण के मामले जगह-जगह परिवार के भीतर होते हैं। दो-चार दिन पहले ही खबर छपी है कि एक नाबालिग लड़की की शिकायत पर उसके पिता और चाचा को गिरफ्तार किया गया है जो कि रोज नशा करके उस बच्ची से बलात्कार करते थे, यह बरसों से चले आ रहा था। इस तरह देखें तो समाज में कोई भी वर्जित संबंध ऐसे नहीं हैं जिनको कि तोड़ा न जाता हो। समाज की व्यवस्था समाज की निगाहों के सामने तक कायम रह जाए, तो रह जाए। जहां समाज की निगाहों से परे की बात शुरू हुई, वहां समाज बनने के पहले का इंसानी मिजाज जागने लगता है। और हमारा मानना है कि हिंसा या जुर्म करने वाले लोगों को हैवान या पिशाच कहना नाजायज है, और निगाहें चुराना है। किसी ने न हैवान देखा है, न पिशाच देखा है। दरअसल लोगों को अपनी इंसानी बिरादरी की इतनी बुरी तस्वीर को हकीकत मानना बुरा लगता है, इसलिए लोग ऐसे कामों को इंसानियत मानने से मना कर देते हैं, और सिर्फ अच्छे कामों को इंसानियत मानते हैं। सच तो यह है कि बलात्कार से लेकर दूसरे हर किस्म के जुर्म तक, तमाम बातें इंसानियत का हिस्सा हैं। और जिस तरह लोग अपने चेहरे के बेहतर पहलू की तस्वीर खिंचवाना पसंद करते हैं, और बदशक्ल हिस्से को कैमरे के सामने नहीं आने देना चाहते, उसी तरह समाज और उसके इंसान महज अच्छी बातों को इंसानियत बताना चाहते हैं। 
जुर्म की कुछ बातें, कुछ खबरें बहुत तकलीफदेह होते हुए भी उनको थोड़ा सा जान लेना इसलिए ठीक होता है कि हमारा मन जिन बातों को इंसानी मानने को तैयार नहीं होता, वे तमाम बातें हाड़-मांस के इंसान ही किस तरह करते हैं, इसे देखना आईना देखने की तरह रहता है। समाज के भीतर, परिवार के भीतर, और दो लोगों के रिश्ते के भीतर, सिर्फ सावधानी ही एक गारंटी हो सकती है, और इसके अलावा इंसानी तन-मन से और कोई गारंटी नहीं मिल सकती। परिवारों के बीच वर्जित संबंधों को लेकर यह मान लेना निहायत गैरजिम्मेदारी और लापरवाही की बात होगी कि समाज के भीतर के नियम-कायदे सब जानते हैं, और वर्जित संबंधों के बारे में वे सोचेंगे भी नहीं। यह एक बड़ी खुशफहमी है, और जो समाज इसके तहत जितनी अधिक तसल्ली से जीता है, उसके बच्चे उतने ही अधिक हादसे झेलते हैं। आज जिन लोगों के साथ आपका जिंदगी भर का भरोसा हो, उनसे कभी अकेले में पूछकर देखें, कि क्या बच्चों का देह-शोषण, वर्जित संबंधों वाले जबर्दस्ती देह-संबंध क्या उन्होंने कभी देखे-सुने नहीं हैं, कभी भुगते नहीं हैं? तो शायद ईमानदार जवाब में हर किसी के कोई न कोई ऐसे तकलीफदेह तजुर्बे निकल आएंगे। 
हम मुम्बई के परिवार जितने खतरे की बात न करते हुए भी इतना तो कहना चाहते हैं कि हर परिवार को, अड़ोस-पड़ोस को, और समाज को इन बातों की तरफ से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि ये पिशाच, ये हैवान हमारे भीतर ही हैं, समाज की व्यवस्था में इनके गले में एक जंजीर डाल रखी है, और जहां जंजीर जरा ढीली हुई कि बहुत से लोगों के भीतर ऐसे पिशाच-हैवान उठ खड़े होते हैं। भारत में बच्चों की शिकायतों को अनसुना-अनदेखा करके उन्हें झिड़ककर चुप कर देने का मिजाज लोगों में है। ऐसी बातों को दबा देने में ही घर-परिवार और समाज सबकी सहूलियत दिखती है। लेकिन ऐसी पहली शिकायत को अनदेखा करने का मतलब होता है कि मुजरिम को आगे दौडऩे के लिए एक खुला मैदान मिल जाए, और जुर्म करने के लिए अनगिनत और बच्चे मिल जाएं। बच्चे हों, या बड़े हों, ऐसे शोषण से बचाने के लिए  सबको सावधान रहने की जरूरत है, आसपास भी सावधानी, और अपने भीतर भी सावधानी। 

पिछली सरकार हो, या मौजूदा किसानी-खुदकुशी जारी है...

23 अपै्रल 2015
संपादकीय

किसानों की आत्महत्या बहुत बुरी तरह खबरों में है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहे पूरी दुनिया में अपनी वाहवाही करवाकर आ जाएं, घर पर जो शर्मिंदगी रास्ता देख रही है, उससे पीछा छुड़ाना नामुमकिन है। लेकिन मोदी को अभी साल भर के भीतर ही प्रधानमंत्री बने हैं, किसानों की आत्महत्या तो उनके आने के पहले से, और उनकी पार्टी के राज के बाहर भी जगह-जगह बरसों से चली आ रही है। लगातार कांगे्रस राज वाले महाराष्ट्र में जितने बड़े पैमाने पर आए दिन एक गांव या दूसरे कस्बे में किसान आत्महत्या करते आए हैं, उससे तो मनमोहन सिंह तक की खासी बदनामी हो रही थी कि देश पर उनका राज, और महाराष्ट्र पर उनकी पार्टी का राज, और उसके बाद भी मौतों के थमने का नाम नहीं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ जैसा राज्य है जिसने पिछले कुछ बरसों से किसानों की आत्महत्या, और किसानी से जुड़ी हुई वजहों की वजह से आत्महत्या में पुलिस-रिकॉर्ड के स्तर पर अब बरसों से एक भी किसान की आत्महत्या दर्ज नहीं हुई है, यह एक अलग बात है कि किसानी से जुड़े मुद्दे पर आत्महत्या की खबर छत्तीसगढ़ में आती भी नहीं है।
लेकिन महाराष्ट्र और आंध्र जैसे राज्य जहां पर बड़े पैमाने पर किसान खुदकुशी कर रहे हैं, खेती के कर्ज को लेकर, कुदरत की मार से खेती खराब होने को लेकर खुदकुशी हो रही है, वहां पर सरकार भी ऐसे हादसों की खबरों को फर्जी नहीं बता रही है, और वहां मुसीबतजदा किसानों को बचाना आज पूरे देश की समस्या है। और जिस तरह भारत की खेती की अर्थव्यवस्था है, उसमें जितना भरोसा किसी फसल के अच्छे या बुरे होने का होता है, उतना ही भरोसा किसान की जिंदगी का रहता है। केंद्र सरकार चाहे वह कांगे्रस की रही हो, चाहे आज भाजपा की हो, उसकी झोली में सिर्फ कारखानेदारों और कारोबारियों के लिए रियायतें हैं। किसानों के लिए तो न वाजिब दाम है, और न ही किसानी के लिए वैसी छूट हैं, जैसे कि फौलादी कारखानों को मिलती हैं। नतीजा यह है कि इस देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने वाला किसान-तबका मौत की कगार पर जीता है, और अगर मौसम की मार न हुई, कीड़ों का हमला न हुआ, तो उसे मानो एक बरस और जिंदगी मिल जाती है।
देश में लोगों का नजरिया यह है कि कारें तो पांच लाख के बजाय दस लाख की ली जाएं, टीवी तो बीस इंच के बजाय चालीस इंच का लिया जाए, स्मार्ट फोन पच्चीस हजार के बजाय पचास हजार का लिया जाए, और हर बरस बदल भी लिया जाए, लेकिन किसान की उपज का दाम अगर बढ़ता है, तो उस महंगाई की आग में ताकतवर तबके भी सुलगने लगते हैं, झुलसने लगते हैं। सरकारें खेती को मिलने वाली बड़ी छोटी-छोटी सी रियायतों को खत्म करने की कोशिशों में लगी रहती हैं, और देश में फिजूलखर्ची बाकी तमाम गैरजरूरी मोर्चों पर जारी रहती है। किसान के लिए सरकार और समाज दोनों के नजरिए में मौत इसलिए है कि दोनों ही यह समझते हैं कि किसान के बिना काम चल सकता है, बड़े पैमाने पर अनाज का आयात करने में सत्ता के दर्जनों लोग अरबपति-खरबपति बन जाते हैं। देश में अपनी जरूरत की खेती हो, या न हो, इसका बोझ किसान पर इस तरह डाल दिया जाता है कि हरितक्रांति में कुर्बानी देना अकेले किसान की जिम्मेदारी है। और पिछली मनमोहन सरकार से लेकर आज की मोदी सरकार तक इन सबकी प्राथमिकता में खेतों की जगह कारखाने हैं और ऐसी आर्थिक सोच में किसान राह के रोड़े के अलावा और कुछ नहीं है। किसानों का मुद्दा एक राजनीतिक मुद्दा बना लिया गया है, जबकि यह देश का आर्थिक मुद्दा रहना चाहिए। बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि आज धीरे-धीरे करके भारत में पोल्ट्री, मछली, और गोश्त का कारोबार अनाज की उपज को पार कर गया है। बहुत से जानकारों को ऐसी आशंका है कि भूमि अधिग्रहण का नया कानून शायद बाकी किसानों को भी जगह-जगह मौत की तरफ धकेलेगा।

बकवासियों को मुखवास देने की बड़ी जरूरत है

संपादकीय
22 अप्रैल 2015

लोकसभा में कल मोदी के मंत्री गिरिराज सिंह ने सोनिया गांधी के खिलाफ कही भद्दी बात के लिए माफी मांगी और उसके बाद वहां का कांग्रेसी-हंगामा बंद हुआ। लेकिन मानो मीडिया का पेट भरने के लिए शाम होते-होते एक दूसरे केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने कांग्रेस या राहुल गांधी को लेकर शैतान शब्द का इस्तेमाल किया, और मानो मधुमक्खी के छत्ते पर यह दूसरा पत्थर पड़ा। देश इसी तरह की बातों में उलझकर खत्म हुए जा रहा है। संसद के भीतर, विधानसभाओं के भीतर, या फिर सड़क पर, कैमरों के सामने, मंच और माईक पर, लोग बेकाबू होकर इस तरह की गंदी बातें कर रहे हैं कि मानो फिल्म के पर्दे पर शाहिद कपूर नाच-नाचकर गंदी बात-गंदी बात गाना गा रहा है। 
अब एक सवाल यह भी उठता है कि ऐसी बातों को लेकर टीवी के स्टूडियो या अखबार के दफ्तर तक दौड़ जाने वाले मीडिया के लोगों को क्या कहा जाए, जो कि आग को आगे बढ़ाने के बजाय तर्कहीन और अवैज्ञानिक आरोपों पर यह सवाल भी नहीं उठाते कि ऐसा आरोप लगाने के लिए उनके पास कौन से तथ्य हैं, कौन से सुबूत हैं। अब दो दिन पहले दो महीने के अज्ञातवास से लौटे हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस के विशाल किसान सम्मेलन में यह कहा कि लोकसभा चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी ने उद्योगपतियों से हजारों करोड़ का कर्ज लिया था, और उसे चुकाने के लिए किसानों की जमीन लेकर वे उद्योगपतियों को दे रहे हैं। अब यह बात भी बिना किसी सुबूत और बुनियाद के थी। अभी महाराष्ट्र की एक अदालत में राहुल गांधी इस बात पर रियायत पाकर कटघरे के बाहर-बाहर चल रहे हैं, जिसमें उनके एक बयान को लेकर मुकदमा दर्ज किया गया है। राहुल गांधी ने गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था, संघ को हत्यारा कहा था, और उसे लेकर संघ के समर्थकों ने उन्हें अदालत में घसीटा है। अब लोग बिना सुबूत अगर एक दूसरे को शैतान कहें, हत्यारा कहें, रंगभेदी और नस्लभेदी बात करें, एक दूसरे को भ्रष्ट कहें, तो देश का कितना समय इसमें बर्बाद हो रहा है। दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ तक यह सिलसिला चल रहा है कि बिना सुबूत एक-दूसरे के खिलाफ बहुत से भारी-भरकम आरोप लगाए जा रहे हैं और जब तक मामले अदालत में नहीं जाते हैं, तब तक किसी को कोई खतरा नहीं लगता है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से लेकर प्रशांत भूषण तक, और गडकरी से लेकर कितने ही दूसरे नेताओं तक उनके बयानों के लिए मुकदमे दर्ज हैं, और अदालतों में चल रहे हैं। 
लेकिन मीडिया ने गंदी बातों को, बेबुनियाद बातों को आगे बढ़ाने का काम इस तरह की गैरजिम्मेदारी के साथ शुरू किया है कि मानो वह ऐसा पोस्ट ऑफिस है जिसे कि लिफाफे के भीतर की चि_ी को पढऩा ही नहीं है। अगर गंदी बातें सामने न आएं, तो अखबारों को पन्ने भरना, टीवी चैनलों को बुलेटिन भरना मुश्किल होने लगे, और ऐसे बकवासियों के विरोधियों को जवाब देने के मौकों का टोटा पड़ जाए। आज भारतीय राजनीति में बकवासियों को मुखवास देने की जरूरत है, ताकि बदबूदार बातें मुंह से निकलना कुछ कम हो, या जो बातें निकल रही हैं, उनकी बदबू कुछ कम हो।

आधा ज्ञान, दुगुना भरोसा, आज का खतरनाक चलन

21 अपै्रल 2015
संपादकीय
मीडिया और इंटरनेट पर रोजाना ही कई खबरें आती हैं कि क्या खाने से कितना फायदा होता है, क्या करने से सेहत कितनी अच्छी रहती है। फिर खाने से परे अलग-अलग किस्म की चीजों को कब और कैसे, किस उम्र में और किस तरह पकाकर खाने से फायदा होता है ऐसी खबरें भी रोज अखबारों से लेकर सोशल मीडिया तक छाई रहती हैं। और इनमें से भी टुकड़े-टुकड़े में जानकारी को लेकर लोग आगे बढ़ाते रहते हैं। लेकिन इसमें से बहुत सी बातें ऐसा आधा सच रहती हैं जो कि झूठ से भी अधिक खतरनाक हो सकती हैं। और फिर लोग हैं कि बिना जांचे-परखे ऐसी बातों को आगे बढ़ाते रहते हैं। 
अब इसी बात को लेकर जानकार लोगों में भी भारी मतभेद चलते रहते हैं कि एक इंसान को दिन भर में कम से कम या अधिक से अधिक कितना पानी पीना चाहिए। बहुत से लोग यह मानते हैं कि इंसानी किडनी हर दिन दर्जनों लीटर पानी को निपटा सकती है, इसलिए अधिक से अधिक पीना चाहिए, जो कि पांच-दस लीटर से अधिक नहीं हो सकता। लेकिन कुछ दूसरे चिकित्सा वैज्ञानिक यह मानते हैं कि बहुत अधिक पानी पीने से जान भी जा सकती है, और बदन के भीतर के बहुत से दूसरे तत्व जरूरत से अधिक पानी पीने से उसके साथ बह निकलते हैं, और उनकी कमी बदन में हो सकती है। यह तो सादे पानी की बात हो गई, लेकिन इससे परे जब खाने-पीने की दूसरी चीजों पर जाएं, तो वैज्ञानिक निष्कर्षों में बहुत किस्म की विविधताएं हैं। 
अलग-अलग रिसर्च से निकाले गए ऐसे निष्कर्ष इतने किस्म की खास स्थितियों पर लागू होते हैं कि उनको दूसरी स्थितियों पर ज्यों का त्यों लागू करना ठीक नहीं होता, लेकिन लोग आधी-अधूरी जानकारी को दुगुने आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल भी कर लेते हैं, और बांट भी देते हैं। कल तक तो लोग किसी पुरानी किताब के पन्ने को देखकर बात को पुरानी मानकर उस पर भरोसा कर लेते थे, लेकिन आज तो फोन और सोशल मीडिया के चलते हुए गांधी और बुद्ध के नाम से भी जो चाहे वह लिखकर बांटा जा सकता है, और बांटा जा रहा है। इसलिए यह समय किसी भी बात पर भरोसा करने के लिए, और उस भरोसे का खुद या दूसरों पर इस्तेमाल करने के लिए, बड़ा खतरनाक है। 
लोगों को सेहत से जुड़ी बातों के इस्तेमाल के लिए बड़ी जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए। निर्विवाद रूप से जो वैज्ञानिक बातें हैं, उनमें भी एक-दूसरे से बहुत सा विरोधाभास हमेशा से रहते आया है। आयुर्वेद और एलोपैथी, होम्योपैथी, और यूनानी, भारतीय प्राकृतिक चिकित्सा, और दूसरे किसी देश की कोई और चिकित्सा शैली, इन सबमें खान-पान को लेकर, बचाव को लेकर, इलाज को लेकर एक-दूसरे से परस्पर विरोधी बातें हैं। और ऐसे में अगर लोग इन पद्धतियों के टुकड़े-टुकड़े को संपूर्ण ज्ञान मानकर इस्तेमाल करने लगेंगे, तो वह बहुत खतरनाक बात होगी। चाहे मजाक में ही सही, अभी कुछ दिनों पहले इंटरनेट पर एक डॉक्टर के क्लीनिक के एक नोटिस की तस्वीर छपी थी, जिस पर लिखा था-इंटरनेट पर देखकर अपनी बीमारी समझकर आने वाले मरीजों से दुगुनी फीस ली जाएगी।

कायर संसद-अदालत, और कायर समाज के चलते समलैंगिकों को बस मौत

संपादकीय
20 अप्रैल 15

कल दिल्ली में एम्स की एक महिला डॉक्टर की खुदकुशी की खबर आई। उसकी बड़ी तकलीफ यह थी कि उसका डॉक्टर पति समलैंगिक था। उसने बहुत खुलासे से अपने फेसबुक पेज पर इसके बारे में लिखा और यह भी लिखा कि पति-पत्नी के बीच किस तरह कोई देह संबंध नहीं बन पाए थे। खुदकुशी की वजहों में उसने पति की बदसलूकी भी गिनाई, और ये तमाम बातें पोस्ट करने के बाद उसने जाकर एक होटल में कमरा लिया और हाथ की नसें काटकर जान दे दी। एक दूसरी खबर दो-चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के महासमुंद से आई थी कि किस तरह वहां दो लड़कियों ने एक पहाड़ी से कूदकर जान दे दी, और उन्होंने अपने आपको साथ में बांध रखा था, वे आपस में शादी करना चाहती थीं, लेकिन घरवालों ने साथ जीने नहीं दिया, तो वे साथ मर गईं। 
भारत में समाज से लेकर सरकार तक, और सुप्रीम कोर्ट तक का नजरिया समलैंगिक लोगों के लिए बहुत ही दकियानूसी और अवैज्ञानिक हैं। समलैंगिकता को एक अपराध करार दिया गया है, और दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले बरस जो फैसला दिया था, उसे पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध ही मान लिया है। भारत का समाज बहुत सी दूसरी बातों की तरह समलैंगिकता को भी कभी पश्चिम से जोड़ लेता है, कभी यहां के हिन्दू आंदोलनकारी इसे एक ईसाई बुराई मान लेते हैं, और हमेशा ही इसे एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। नतीजा यह होता है कि भारत में समलैंगिक जोड़ों की शादी तो मुमकिन है ही नहीं, उनका साथ रहना भी आसान नहीं होता है, और लोग उन्हें नीची निगाह से देखते हैं। 
आज जब पूरी दुनिया में वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि लोगों की यौन प्राथमिकताएं उनके जींस से चली आती हैं, और बहुत से लोगों के लिए यह मुमकिन या आसान नहीं होता कि वे इस प्राथमिकता को बदल सकें। हालांकि आज विज्ञान से अनजान कई धर्मान्ध और कट्टर नेता और मंत्री ऐसे बयान देते हैं कि समलैंगिक लोगों को सामान्य बनाने के लिए परामर्श केन्द्र खोले जाने चाहिए, और उनका इलाज किया जाना चाहिए। ऐसे में समाज में समलैंगिकों के लिए हिंसा कई तरह से सामने आती है। ऐसे जोड़ों या लोगों को लोग मकान किराए पर नहीं देते, काम पर नहीं रखते, और अधिकतर लोग उन्हें मानसिक बीमार, अस्वाभाविक, और अप्राकृतिक मानकर चलते हैं। अगर एक मोटे अंदाज को मानें, तो आबादी का पांच-सात फीसदी हिस्सा समलैंगिक होता है, और इतने लोगों को पूरी जिंदगी अगर अपनी पसंद और प्राथमिकता को छुपाकर एक मुखौटा लगाकर जीना पड़े, तो क्या होता होगा? और भारत में तो अधिकतर समलैंगिक लोगों को समाज की निगाहों से बचाने के लिए उनके मां-बाप शादी की तरफ धकेल भी देते हैं, जिससे जाहिर है कि उनके जीवनसाथी को भी यह बेमेल जीवन झेलना पड़ता है। 
भारत के सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले पर फैसला देते हुए यह मौका आया था कि वह एक वैज्ञानिक और प्रगतिशील, सुधारवादी और साहसी नजरिया अपनाकर समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज जिस पीढ़ी के होते हैं, जिस समाज से आते हैं, जिस तरह की धारणाओं के साथ बड़े होकर यहां तक पहुंचते हैं, और देश-समाज की सोच का जो दबाव उन पर रहता है, उनके चलते सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर एक बहुत ही तंग और आदिम नजरिया सामने रखा। उसने दुनिया के विज्ञान के विश्लेषण और निष्कर्ष को पूरी तरह अनदेखा किया, और भारत के इस यौन-अल्पसंख्यक वर्ग के हकों को कुचल दिया। 
कोई भी देश अपनी महिलाओं की आधी आबादी को कुचलकर, देश के अल्पसख्यक तबकों को दहशत में रखकर, देश की आधी गरीब आबादी को आगे बढऩे के बराबरी के मौके न देकर, अपने समाज के यौन-अल्पसंख्यक तबकों को कुचलकर आगे नहीं बढ़ सकता। आज भारत की तरक्की के आंकड़े जिन लोगों को सुहाते हैं, उनको यह दिखाई नहीं पड़ता कि इस देश में धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग, यौन-प्राथमिकता, इन सबसे देश को आजाद करने के बाद उसकी तरक्की की संभावनाएं और कितनी अधिक होतीं। जब देश के अलग-अलग बहुत से तबके, करोड़ों लोग, अलग-अलग वजहों से समाज में दबे-सहमे रहते हैं, तो उनकी उत्पादकता देश को नहीं मिल पाती। समलैंगिकता के खिलाफ इस देश की बहुसंख्यक-आबादी का जो हिंसक रूख है, वह वैज्ञानिक सोच के अभाव से उपजा है। और आज भारत में तरह-तरह के साम्प्रदायिक और धर्मान्ध मुद्दों को उठाकर जिस तरह की अवैज्ञानिक सोच बढ़ाई जा रही है, उसके चलते समलैंगिकता के सामने छुपकर रहना, या जान दे देने का ही रास्ता बचा रहता है। देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स की एक डॉक्टर जिसने कि आत्महत्या कर ली, उसके सामने अपने समलैंगिक पति से अलग होने का रास्ता बचा था, लेकिन उसने आत्महत्या बेहतर समझी। यह समाज में महिला की कमजोर हालत का सुबूत है। 
सुप्रीम कोर्ट को समलैंगिकता के खिलाफ भारतीय कट्टरता को बढ़ावा देने के बजाय, जारी रखने के बजाय, नागरिक के बुनियादी हकों के तहत समलैंगिकता को एक बुनियादी हक मानना था, और इसके खिलाफ कानून को खारिज करना था। लेकिन ऐसा लगता है कि कायर संसद, कायर अदालत, और कायर समाज के चलते इस देश में समलैंगिक लोग कई दशक तक मर-मरकर ही जीने को मजबूर रहेंगे, या हौसला जुटाकर या हौसला खोकर जान देने को मजबूर होंगे। 

सच के बस हिज्जे ही सरल हैं

संपादकीय
19 अप्रैल 15

कनाडा की एक टेनिस खिलाड़ी यूगेनी एक अजीब बात के लिए खबरों में है। टेनिस मुकाबले शुरू होने के पहले यह एक पारंपरिक शिष्टाचार रहता है कि दोनों तरफ के खिलाड़ी एक दूसरे से हाथ मिलाकर शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन यूगेनी ने शुरू से लेकर अब तक हर मुकाबले के लिए अपनी यह नीति बनाकर रखी है कि वे सामने के खिलाड़ी को जीत के लिए शुभकामनाएं देने का काम नहीं करतीं। उनका मानना है कि इसके पीछे कोई दुर्भावना नहीं है, लेकिन वे इस बात पर भरोसा नहीं करतीं कि जिसके खिलाफ मुकाबला है उसे ही शुभकामना देना। वे कहती हैं कि वे मैच के बाद नतीजे चाहे जो हो, प्रतिद्वंदी से हाथ मिलाते हैं। हालांकि कनाडा की टेनिस-टीम के बाकी खिलाड़ी कुछ अलग सोचते हैं, और वे सामने के खिलाडिय़ों से हाथ मिलाने से परहेज नहीं करते।
ये बात जरा सी है, लेकिन आज की चर्चा के लायक इसलिए है कि भारत में लंबे समय से नैतिकता और ईमानदारी के ऊंचे पैमाने के बारे में यह कहा जाता है कि मन, वचन, और कर्म एक रहने चाहिए। जो मन में है वही कहा जाए, और जो कहा जाए, वही किया जाए। लोगों को कई बार यह सुनने या पढऩे मिलता है कि किसी की कथनी और करनी में फर्क है। ऐसे में कनाडा की इस खिलाड़ी का यह व्यक्तिगत फैसला दिलचस्प है, और एक किस्म की ईमानदारी है। 
जिंदगी में ऐसे कड़े फैसले बड़े मुश्किल होते हैं। साफगोई के नुकसान होते हैं, क्योंकि जब कोई ऐसा सच कहते हैं, जो कि दूसरों को पसंद न आए, तो उनके खिलाफ एक तनाव खड़ा होता है, और हिन्दुस्तान की आज की हवा देखें, तो उनके खिलाफ हिंसा और खतरा भी खड़े हो जाते हैं। फिर किसी संगठन या किसी दफ्तर की बात करें, तो वहां पर सच कहना चापलूसी के नर्म पुलाव के बीच कंकड़ की तरह खटकता है, और उसके नुकसान खासे बड़े होते हैं। किसी ढांचे में ऊपर पहुंचने के लिए चापलूसी को उसी किस्म से जरूरी माना जाता है, जिस किस्म से सरकारी दफ्तरों में फाईलों को आगे बढ़वाने के लिए हाथों पर चिकनाई लगाने की बात कही जाती है। यह माना जाता है कि सरकारी ढांचे के चक्के ऐसी चिकनाई की वजह से ही घूम पाते हैं, और इसके न रहने पर काम रूक जाता है। सच कहने की बात सुनने में अच्छी लगती है, बुद्ध से लेकर कबीर तक और गांधी तक भी सच की महिमा बार-बार कही गई है, लेकिन गांधी एक बहुत ही दुनियादार-व्यवहारिक थे, और उन्होंने सच पर जिद के साथ-साथ यह भी कहा था कि सच तो कहो, पर कड़वा सच मत कहो। 
अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई सच कहना ही तय कर ले, तो फिर बात मीठी हो, या कड़वी, उसे कैसे न कहा जाए? और मीठी बात तो आमतौर पर चापलूसी की होती है, दिल में नफरत लिए हुए भी दो देशों के नेता गले मिल लेते हैं, और मिठाई से लेकर बिरयानी तक खाना-खिलाना हो जाता है, एक-दूसरे को शॉल का तोहफा देना हो जाता है, और इसके पीछे गांधी की नसीहत का वह आधा हिस्सा रहता है कि कड़वा सच न कहो। अब ऐसे में मन, वचन, और कर्म, इन तीनों के बीच एक ईमानदार तालमेल कैसे हो सकता है? जब दिल से लेकर जुबान तक कुनैन जैसी कड़वाहट भरी हुई हो, तो कोई महज मीठा-मीठा सच कैसे कह सकते हैं? कोई गांधी के बारे में, या नेहरू के बारे में, या गोडसे के बारे में महज अच्छा-अच्छा कहते हुए ईमानदार विश्लेषण कैसे कर सकते हैं? 
दरअसल, इंसान का मिजाज, और समाज का ढांचा पूरे सच के लायक बना हुआ नहीं है। एक परिवार का ढांचा भी पूरे सच के लायक नहीं है, और दो लोगों के बीच के निजी रिश्ते भी खालिस सच की आंच को नहीं झेल सकते। लोगों के मन में बाकी लोगों के बारे में जो है, वह अगर उजागर हो जाए, तो पल भर में दुनिया के शायद आधे या चौथाई रिश्ते टूट जाएं, अनगिनत सौदे टूट जाएं, समझौते चौपट हो जाएं। खालिस सच कुछ उसी किस्म का रहता है जैसे कि विकीलीक्स पर दुनिया के देशों के आपसी और गोपनीय संदेश का भांडाफोड़ हो गया, और लोगों के मन में हमेशा के लिए एक-दूसरे के लिए एक खटास पड़ गई। सच अधिकतर मामलों में दूध में पड़े दही के छींटे जैसा रहता है जो कि दिलों को दूध की तरह फाड़कर रख देता है। बहुत छोटे-छोटे से सच बहुत बड़ी-बड़ी जिंदगियों को खत्म कर सकते हैं, और दुनिया के बड़े-बड़े ढांचों को भूकम्प की तरह हिला सकते हैं, गिरा सकते हैं। खालिस सच को पचाना मुश्किल रहता है, और वक्त ऐसा है, इंसानी मिजाज ऐसा है कि एक खिलाड़ी मुकाबले में दूसरे को जीत के लिए शुभकामना देने का फर्जी काम न करे, तो भी वह खटकने लगती है। ऐसे में सच के बस हिज्जे ही सरल हैं।

सामंती परंपराएं जनता पर बोझ, खत्म होनी चाहिए

18 अपै्रल 15
संपादकीय

महाराष्ट्र सरकार ने अंगे्रजों के समय से चली आ रही एक परंपरा को खत्म किया है कि मंत्रियों और बड़े अफसरों के जिलों में जाने का वहां उन्हें सलामी गारद द्वारा सलामी दी जाए। इसे एक फिजूलखर्ची मानते हुए सादगीपसंद मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कहा है कि साधनों की ऐसी बर्बादी का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने हाल ही में तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में भी कटौती की है। 
यह बात, और इस तरह की कई दूसरी बातों को पूरे देश में लागू करने की जरूरत है। कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आए, और कई घंटों तक कई सड़कों को उनके लिए बंद कर दिया गया, और कोई वैकल्पिक रास्ता भी तय नहीं किया गया। ऐसे में जनता भरी धूप तले बेहाल हो गई। अभी कुछ हफ्ते पहले ही मध्यप्रदेश में एक जुलूस के चलते रास्ते बंद थे और अस्पताल पहुंच पाने के पहले ही इस टै्रफिक जाम में फंसे हुए एक इंजीनियर ने दम तोड़ दिया। अब इसके खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका लगाई गई है और हाईकोर्ट में सरकार और पुलिस से इस पर जवाब मांगा है। 
भारत में संवैधानिक संस्थाओं और उन पर काबिज लोगों को लेकर सरकार और उन लोगों का खुद का भी नजरिया सामंतवाद से बाहर नहीं निकल पा रहा है। सलामी गारद तो एक किस्म की बर्बादी है, हम राज्यपाल के कार्यक्रम में राष्ट्रधुन बजाने के लिए बस पर लदकर आते-जाते पुलिस बैंड को देखते हैं जिसके दर्जन भर से अधिक लोग सिर्फ यही काम करने के लिए रखे गए हैं। राजभवनों और राष्ट्रपति भवन का तामझाम जरूरत से कई गुना अधिक रहता है, और राष्ट्रपति के अंगरक्षकों का घुड़सवार दस्ता भाले लेकर कुछ इस तरह ठुमकते हुए चलता है कि मानो वह अकबर की रक्षा कर रहा हो। अंगे्रज चले गए, और शोषण-बर्बादी की ये परंपराएं हिंदुस्तानियों के लिए छोड़ गए जो कि आज तक उन्हें ढो रहे हैं। अंगे्रजी सामंत का आतंक इतना है कि इस गर्म देश में जजों और वकीलों, रेलवे के टिकट निरीक्षक और गार्डों के बदन पर से काला कोट हटाते हुए हिंदुस्तान डरता है कि मलिका विक्टोरिया कहीं नाराज न हो जाए। 
देश में जगह-जगह जनहित याचिकाएं लगाने की जरूरत है, कि कुपोषण के शिकार बच्चों वाले इस देश में इस तरह की बर्बादी एक बड़ी हिंसा है, जिसका मजा कार्यपालिका, न्यायपालिक, और विधायिका, सभी पर सवार लोग लेते हैं। गाडिय़ों के काफिले, सायरन और लालबत्तियां, इन सबका सिलसिला खत्म करना चाहिए। ताकतवर ओहदों के बंगलों पर पुलिस के लोग चपरासियों जैसा काम करने में जोत दिए जाते हैं, जो कि उनके मनोबल के लिए भी खराब है, और विभाग की क्षमता की बर्बादी भी है। ऐसा करने वाले लोगों को राजघाट और गांधी प्रतिमा पर फूल चढ़ाने का हक भी नहीं रहना चाहिए। 
प्रणब मुखर्जी ने अपने नाम के साथ महामहिम लिखवाना बंद करवाया, तो उन्हें देखकर राज्यपालों ने भी ऐसा किया। अब छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने अपने लिए ट्रैफिक को रोकने पर नाराजगी दिखाई, जनता से माफी मांगी, तो इसका असर नीचे भी जाना चाहिए। इसके अलावा दूसरी गैरजरूरी सामंती परंपराएं खत्म भी होनी चाहिए जो कि जनता पर बोझ  हैं। 

विरासत ढोने के लिए वारिस तैयार होना भी जरूरी होता है

संपादकीय
17 अप्रैल 15

राहुल गांधी करीब दो महीने बाहर रहकर लौटे, तो देश के लोगों का एक इंतजार खत्म हुआ। लेकिन यह रहस्य अभी तक बना हुआ है कि वे कहां गए थे, क्या कर रहे थे, और किस वजह से इस बात का खुलासा नहीं किया गया था। यह हो सकता है कि सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राहुल के पते-ठिकाने को गोपनीय रखा गया हो, लेकिन यह दौर कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती का दौर है, और अलग-अलग तबकों की बातों को देखें तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं के बीच मां-बेटे को लेकर एक खींचतान चल रही है कि कौन पार्टी को सम्हाले। ऐसे में एक लंबी गैरमौजूदगी निजी तो हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में निजी बातों की एक सीमा भी होती है। आम लोग तो बरसों तक बिना कुछ कहे मर्जी की जिंदगी जी सकते हैं, लेकिन जिस आदमी से इस देश को सम्हालने की उम्मीद उसके समर्थक करते हैं, जो कि देश की एक सबसे बड़ी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, जो कि संसद सदस्य है, उससे देश के लोगों को कुछ अधिक जानने का हक भी है। सुरक्षा के अलावा बाकी बातों को कांग्रेस पार्टी को देश को उजागर करना था, उसके बिना यह पार्टी अपने को और अपने नेता को हाशिए की तरफ धकेलती है। देश के लिए जो लोग अहमियत रखते हैं, वे लोग देश के प्रति जवाबदेह भी रहने चाहिए। महत्व और अनदेखी एक साथ नहीं चल सकते। अब आने वाले दिन बताएंगे कि राहुल गांधी ऐसे आड़े वक्त पर, चौपट हो चुकी अपनी पार्टी को छोड़कर, संसद के महत्वपूर्ण सत्र को छोड़कर, इस तरह दो महीने क्यों गायब रहे। 
खैर, इससे परे कि एक बात यह भी है कि आने वाले दिनों में राहुल गांधी और सोनिया गांधी में से पार्टी को सम्हालने की अधिक संभावना कौन रखते हैं। वैसे तो यह इस घरेलू पार्टी का निहायत ही घरेलू मामला है, लेकिन यह सार्वजनिक चर्चा में है, इसलिए इस पर  कुछ चर्चा हम भी कर सकते हैं। सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी को बहुत ही कठिन मौके पर सम्हाला था और प्रधानमंत्री की कुर्सी का प्रस्ताव छोड़कर भी उन्होंने कांग्रेस को एक गौरवशाली चुनावी-ऊंचाई तक पहुंचाया था। लोकसभा के दो-दो चुनाव लगातार पार्टी ने सोनिया की वजह से ही जीते थे, यह और बात है कि पार्टी की सरकार के कुकर्मों के चलते कांग्रेस ने अपने साथ यूपीए गठबंधन की संभावनाओं को खत्म कर दिया। अब पिछले लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस की कोई भी संभावना बची नहीं थी, तब एक गलत मौके पर राहुल गांधी को एक ऐसे नरेन्द्र मोदी के मुकाबले जनता के सामने पेश किया गया जिस मोदी का कोई विकल्प दिख नहीं रहा था। राहुल गांधी को उस मुकाबले में पूरी तरह नाकामयाब होना ही था, और वह आशंका से कुछ बढ़कर हुआ। 
अब कांग्रेस पार्टी को मिट्टी से उठकर फिर खड़ा होना है। अब तक राहुल गांधी की जितनी खूबियां सामने आई हैं, उन सबको मिलाकर भी वे लोगों के बीच कोई भरोसा खड़ा करते दिखते नहीं हैं। दूसरी तरफ सोनिया गांधी इस तमाम हार के बावजूद कांग्रेस के भीतर एक सर्वमान्य नेता हैं, और ऐसा लगता है कि वक्त के साथ-साथ वे कांग्रेस को इस बदहाली से कम या अधिक हद तक उबार पाएंगी। शीला दीक्षित जैसे बहुत से लोगों ने यह राय सामने रखी है कि सोनिया गांधी पार्टी की अगुवाई जारी रखना चाहिए। हमको भी दूर बैठे यही एक बात सही लगती है कि यह वक्त राहुल गांधी के कमजोर कंधों पर बड़ा वजन डालने का नहीं है, और सोनिया गांधी का कांग्रेस के भीतर वे फिलहाल तो कोई विकल्प नहीं बन सकते। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है कि 45-50 बरस का यह अधेड़ नौजवान अब तक काबिल नहीं बन पाया है, लेकिन इंदिरा गांधी के बाद अगर इस नेहरू-गांधी परिवार को देखें, तो राजीव, सोनिया, और राहुल, ये सब वक्त की पैदाइश हैं, और इनके बीच अनिवार्य रूप से न तो कोई लीडरशिप की खूबी थी, और न ही कोई बड़ी हसरत ही दिखती थी। ऐसे में हादसों ने एक के बाद दूसरे को पार्टी सम्हालने को मजबूर किया, लेकिन इन तीनों के ही साथ काम सम्हालते समय कोई तजुर्बा नहीं था। राहुल गांधी को अभी लंबी ट्रेनिंग और लंबी सीख की जरूरत है, उसके पहले उनको कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना उनके खुद के साथ बेइंसाफी होगी। यह जरूर हो सकता है कि उनकी ताजपोशी करके कुछ लोग अपने खुद के नंबर बढ़वा सकें, लेकिन उससे कांग्रेस का कोई भला नहीं होगा। विरासत को ढोने के लिए वारिस का तैयार होना भी जरूरी होता है, वरना इस देश ने अंग्रेज राज में हिन्दुस्तानी राजकुमारों के अंग्रेज पालक देखे हुए हैं, कांग्रेस के भीतर ऐसी नौबत ठीक नहीं होगी।

मोदी ने भारतीय मानवश्रम के बारे में जो कहा, वह हम लिखते आ रहे हैं...

16 अप्रैल 2015
संपादकीय
कनाडा गए हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां के भारतवंशियों के बीच एक विशाल कार्यक्रम में कहा कि भारत की सबसे बड़ी निधि उसके युवा हैं और उनका लक्ष्य उन्हें रोजगार सृजित करने वालों के रूप में देखना है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 80 करोड़ की युवा आबादी, 80 करोड़ सपने, 160 करोड़ मजबूत हाथ। ऐसा क्या है जो हम हासिल नहीं कर सकते, उन्होंने कहा कि वह युवाओं को रोजगार की तलाश करने वाले नहीं बल्कि रोजगार सृजित करने वाले लोगों के रूप में देखना चाहते हैं। उन्होंने भारत के लोगों के काम करने की अपार संभावना को गिनाते हुए कहा कि आज भारत को यह सर्वे करने की जरूरत है कि दुनिया के किस-किस देश में किस-किस हुनर वाले भारतीय के लिए काम की गुंजाइश निकलेगी। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम हर बरस इस मुद्दे पर लिखते आए हैं कि किस तरह छत्तीसगढ़ और बाकी हिंदुस्तान को यह अध्ययन करवाना चाहिए कि भविष्य में कितने बरस बाद किस देश को किस हुनर के लोगों की जरूरत रहेगी, और भारत के लोगों को उस शून्य को भरने के लिए तैयार करना चाहिए, और हुनर के साथ-साथ विदेशी भाषा सिखानी चाहिए, और विदेशी संस्कृति-सभ्यता के तौर-तरीकों से वाकिफ भी करवाना चाहिए। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि भारत की विशाल आबादी इस देश पर बोझ नहीं है, बल्कि इस देश की ताकत है, और इसे बोझ वे ही लोग मानते हैं जो कि सत्ता हांकते हुए भी इस ताकत के लिए योजना नहीं बना पाते। 
यहां पर हम कई महीनों पहले इसी मुद्दे पर लिखे गए अपने विचार फिर से दे रहे हैं। 
इस बारे में आंकड़े बताते हैं कि अगले पंद्रह बरस में भारत चीन की आबादी को पार कर दुनिया का सबसे अधिक लोगों वाला देश हो जाएगा। उस वक्त दोनों देशों की आबादी करीब एक अरब पैंतालीस करोड़ होगी, और उसके बाद भारत इससे आगे बढऩे लगेगा। एक दूसरा अंदाज बतलाता है कि 2060 तक जाकर भारत की आबादी बढऩा रूकेगा, और सन् 2100 तक आबादी में गिरावट आना शुरू होगी। लेकिन इसके पहले भारत करीब एक अरब पैंसठ करोड़ तक पहुंच जाएगा। 
महज आबादी के आंकड़े अपने आपमें आंकड़े होते हैं, और उनसे निकाला जाने वाला मतलब सोचा-समझा या अनजाना सफेद झूठ भी हो सकता है। एक खबर है कि भारत में तीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और वह रोजाना 30-35 रूपये से कम पर जिंदा है। एक दूसरी खबर यह है कि इराक, यमन, अफगानिस्तान जैसे हिंसाग्रस्त देशों से हजारों हिन्दुस्तानियों को निकालकर वापिस भारत लाया जा रहा है, लेकिन वहां के रोजगार से उनको जो कमाई हो रही थी उसके चलते हजारों हिन्दुस्तानी गृहयुद्ध से गुजर रहे ऐसे देशों में भी रहना चाहते हैं। 
इन बातों को जोड़कर देखने की जरूरत इसलिए है कि हिन्दुस्तान की बढ़ती आबादी को जंगल की आग की तरह फैलते हुए खतरे बताने वाले लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी गरीब की खपत क्या है। एक तिहाई आबादी जो रोज 30-35 रूपये पर जिंदा है, उसकी खपत सिर्फ अनाज, पानी, शायद जरा सी बिजली, और शायद महीने भर में सौ रूपये के सामान, बस इतनी ही है। इस एक तिहाई आबादी की कुल खपत को अगर देखें, तो यह देश की ऊपर की एक तिहाई आबादी की खपत के मुकाबले एक फीसदी भी नहीं है। ऊपर की यह एक तिहाई आबादी मकानों वाली है, कारों वाली है, एयरकंडीशनरों या एयरकूलरों वाली है, टीवी और कम्प्यूटर वाली है, फ्रिज और गैस वाली है, पेट्रोल, डीजल, बिजली खर्च करने वाली है, जरूरत से अधिक खाने वाली है, और फिर पसीना बहाने को बिजली खर्च करने वाली है। इस आबादी को पंप और टंकी से पानी मिलता है, इसके घर में लॉन, बगीचा, और बंगले हैं, नहानी में फौव्वारा है। इस एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत मुकाबले नीचे की एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत एक फीसदी भी नहीं है। 
न सिर्फ इराक, बल्कि खाड़ी के तमाम देशों, अमरीका और आस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे अनगिनत देशों में हिन्दुस्तानी मजदूर, कामगार, और खूबियों वाले विशेषज्ञ-जानकार जाकर काम कर रहे हैं, कमा रहे हैं, वापिस हिन्दुस्तान पैसे भेज रहे हैं। और दुनिया के देशों में जैसे-जैसे उनकी स्थानीय संपन्नता बढ़ती जा रही है, उनको मेहनत और मजदूरी वाले, कई बेहतर किस्मों वाले दूसरे कामगार भी लगते हैं, और यह बाकी गरीब देशों पर निर्भर करता है कि वे किस तरह अपने लोगों को सिखा-पढ़ाकर इन संपन्न देशों में काम के लायक बना सकते हैं। 
इस तरह भारत में अगर लोगों को दुनिया में मौजूद और बढ़ते हुए रोजगार के लिए तैयार किया जाता है, तो भारत के इंसानी बदन भारत की धरती पर बोझ नहीं रहेंगे, वे भारत की ताकत बनेंगे। इसलिए सबसे गरीब एक तिहाई आबादी की गरीबी को बढ़ती आबादी के बोझ का नतीजा बताने की यह साजिश इस देश की सत्ता ने सोच-समझकर बनाई है, क्योंकि इन गरीबों को देश के लिए उत्पादक बनाने की जिम्मेदारी को सत्ता पूरा नहीं कर पाई, और अब अपनी नालायकी को छुपाने के लिए वह आबादी को बोझ बता रही है। भारत की सामाजिक हकीकत बताती है कि गरीबों के बीच बच्चों की गिनती इसलिए भी अधिक रहती है कि उन्हें यह भरोसा नहीं रहता कि भूख, कुपोषण, और बीमारी के चलते उनके कितने बच्चे जिंदा बचेंगे। इसलिए भी गरीब परिवारों में बच्चे अधिक होते हैं। और आर्थिक हकीकत यह है कि जैसे-जैसे शिक्षा और संपन्नता बढ़ती हैं, वैसे-वैसे लोग परिवार छोटा रखने लगते हैं। इस तरह देश की आबादी को गरीब रखने के लिए जिम्मेदार सत्ता ही आबादी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।
आज भी शायद विज्ञान और टेक्नालॉजी ने मिलकर भारत के गरीब इंसानों जितनी सस्ती और उत्पादक कोई मशीन नहीं बनाई है, जो 30-35 रूपये रोज की खपत में आठ घंटे रोज पसीना बहाए। इसलिए भारत की आबादी को बोझ मानने के पहले यहां की मानवशक्ति की संभावनाओं को टटोलने की जरूरत है, जो कि सामने खड़ी हुई हैं, और देश के योजनाकारों, और यहां की सत्ता हांकने वालों को चुनौती दे रही हैं कि  हिन्दुस्तानी जनता की ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करें, बजाय उन्हें बोझ साबित करने के।  

नक्सलगढ़ से लोक सुराज की शुरुआत के साथ-साथ समाधान का लंबा सफर

विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ में जनता से संपर्क का सालाना अभियान इस बार लोक सुराज नाम से शुरू हुआ है। कल पहले ही दिन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को राजनांदगांव और कवर्धा जिलों में कहीं जाना था, लेकिन उन्होंने अभूतपूर्व नक्सल हिंसा के लगातार तीसरे दिन अपना यह दौरा बस्तर के नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले से शुरू किया। अभी बस्तर में हालात जगह-जगह काबू के बाहर दिख रहे हैं, और नक्सली सुरक्षा बलों पर गंभीर हमले कर रहे हैं। ऐसे में डॉ. रमन सिंह को वहां न जाने की नसीहत सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने दी थी, लेकिन उन्होंने वहीं से दौरा शुरू किया। 
जिस बस्तर में लगातार नक्सल हमलों में जवान मारे जा रहे हैं, वहां अगर सरकार के बड़े लोग भी जाने से कतराएंगे, तो सुरक्षा बलों का हौसला और पस्त होगा। फिर यह बात अलग है कि बड़े लोगों का वहां जाना काफी नहीं है, और कोई असरदार-कामयाब रास्ता भी सोचना जरूरी है, लेकिन मोर्चों पर मुखिया के जाने का अलग असर होता है। इससे वर्दीधारी सरकारी बंदूकों की ताकत नहीं बढ़ती, लेकिन उनका हौसला बढ़ता है, और अभी बस्तर में इसकी कमी लगातार दिख रही है। 
लोगों को याद होगा कि अफगानिस्तान और इराक में जहां-जहां अमरीकी सेनाएं तैनात रहीं, वहां-वहां समय-समय पर अमरीकी विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, और अमरीकी राष्ट्रपति अचानक पहुंचते रहे हैं, और अपने लोगों का हौसला बढ़ाते रहे हैं। भारत में भी कारगिल जैसे कठिन मोर्चे पर भारतीय रक्षा मंत्री जाते रहे हैं। ऐसे दौरों का एक भावनात्मक असर होता है, और मौत के खतरे तले काम करने वाले सुरक्षाकर्मी कुछ उम्मीद पाते हैं। 
एक तरफ तो मुख्यमंत्री ने अचानक नक्सलगढ़ में जाना तय किया, पहुंचे, और दूसरी तरफ पिछले बरसों में उन्होंने लगातार नक्सलियों से बातचीत की पेशकश भी की है। उन्होंने विधानसभा के भीतर और विधानसभा के बाहर कई बार यह बात कही कि अगर नक्सली उनसे बातचीत करके हिंसा बंद कर सकते हैं, तो वे आधी रात भी जंगल में अकेले जाकर बातचीत को तैयार हैं। यह सारी स्थिति अब गेंद को नक्सलियों के पाले में डालती है, जिनके साथ शहरों के बहुत से पढ़े-लिखे और लिखने-पढऩे वाले लोग भी सैद्धांतिक रूप से मुद्दों पर जुड़े हुए हैं। यह पूरी नौबत अब नक्सलियों से बातचीत का रिश्ता रखने वाले उन अहिंसक लोगों पर भी एक दबाव बनाती है कि वे इस हिंसा का विरोध करें, और बातचीत का रास्ता बनाने में मदद करें। बस्तर में तीन दिनों की इस हिंसा को लेकर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने भी इसकी कड़ी आलोचना करते हुए बयान जारी किया है। कुछ बरस पहले इस संगठन की नीति ऐसे बयानों की नहीं थी, लेकिन अब नक्सल हिंसा पर चुप रहना बहुत से मानवाधिकारवादियों को मुश्किल पडऩे लगा है, और लोग हिंसा पर उनके नजरिए को पूछने लगे हैं। 
नक्सलियों से किसी भी तरह का संपर्क रखने वाला लोगों में से जिनको लोकतंत्र पर भरोसा है, उन लोगों को अपने असर का इस्तेमाल नक्सलियों पर करना पड़ेगा, करना चाहिए, और इस अंधाधुंध हिंसा को रुकवाना चाहिए जिससे कि उन इलाकों में अब कोई काम भी नहीं हो पा रहे हैं। जिन इलाकों और वहां के लोगों के हक के मुद्दे पर नक्सली एक हथियारबंद संघर्ष कर रहे हैं, उन इलाकों का और वहां के लोगों का सबसे बड़ा नुकसान आज वहां हो रही हिंसा है। देश के बहुत से हिस्सों में लंबे उग्रवादी या आतंकी आंदोलनों को बातचीत से निपटाने का लंबा इतिहास रहा है। छत्तीसगढ़ और नक्सल-प्रभावित दूसरे प्रदेशों में भी केन्द्र और राज्य सरकार को बातचीत की पहल करनी होगी, करनी चाहिए।
हम लगे हाथों भाजपा के एक केन्द्रीय (राज्य) मंत्री और भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष वी.के.सिंह के कल के उस बयान की चर्चा करना चाहेंगे जो कि उन्होंने रायपुर में दिया है। उसमें उन्होंने नक्सल हिंसा से निपटने के लिए उन इलाकों में जनता को जीतने की बात भी कही है। उन्होंने कहा कि लोगों को भरोसे में लेकर उन तक विकास पहुंचाना होगा। आदिवासियों को जल-जंगल और जमीन लौटाने की जरूरत है। उनकी बहुत सी बातें वर्दीधारी फौजी रूख से अलग एक सामाजिक सोच वाले नेता की थीं, और सोचने-बुझने वाले अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि बंदूकों से हिंसा से मुठभेड़ तो की जा सकती है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता। 
आज प्रदेश में लोक सुराज अभियान की शुरुआत नक्सल हिंसा की खबरों तले कुछ दब सी गई है। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री पहले से तय दौरे पर नांदगांव-कवर्धा गए होते, तो उससे वह बात नहीं बनती जो कि उनके नक्सल कब्जों के इलाकों में जाने से बनी है। हम पिछले दो दिनों में इसी से जुड़े हुए मुद्दों पर लिख रहे हैं, और राज्य सरकार को नक्सल इलाकों में एक बेहतर तैयारी की जरूरत है जो कि इस आतंकी हिंसा में जवानों की शहादत रोक सके। दूसरी बात इन इलाकों में एक बेहतर शासन-प्रशासन देने की भी जरूरत है। और तीसरी बात, जो कि जनरल वी.के.सिंह ने भी कही है, आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन पर उनका अनंतकाल से चले आ रहा हक लौटाना होगा, इसके बिना जमीनी बेचैनी बनी रहेगी। हर नक्सल हिंसा के बाद हम यहां इन्हीं तमाम मुद्दों को नहीं दुहरा सकते, इसलिए कुछ-कुछ महीनों के बाद हम नक्सलियों को भी यह याद दिलाते हैं कि भारत जितने विशाल लोकतंत्र में बंदूक की नली से निकला राज मुमकिन नहीं है, उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में आकर जनता की दिक्कतों का एक असल रास्ता निकालना चाहिए। और सरकार की यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वह बातचीत के लिए कोशिश करे, क्योंकि बातचीत नक्सल-एजेंडा में चाहे न हो, लोकतंत्र के एजेंडा में तो हमेशा ही रहेगी। 

नक्सल हिंसा, बातचीत के बिना लोकतंत्र में कोई रास्ता नहीं

संपादकीय 
14 अप्रैल, 2015 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक बार फिर जिस बड़े पैमाने पर तीन-चार दिनों में ही नक्सल वारदातें हुईं हैं, उनसे एक बार फिर यह मुद्दा लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। आमतौर पर खबरों में हिंसा के आंकड़ों और तस्वीरों के अलावा इतना भर आ पाता है कि खुफिया एजेंसियों की नाकामी कहां रही, और केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों के बीच तालमेल की कमी कहां रही। लेकिन दशकों से चले आ रहे इस नक्सल मोर्चे को लेकर कई बातों पर अब चर्चा बंद सरीखी हो गई है, और लोगों को अब यह एक पुलिसिया समस्या लगने लगी है। लेकिन बस्तर और नक्सल समस्या को जानने वाले लोग इस बुनियादी खामी को आसानी से समझते हैं, कि एक राजनीतिक चर्चा के बिना इसे खत्म करना नामुमकिन चाहे न हो, खासा मुश्किल जरूर होगा, और अभी तो इन दशकों में नक्सल हिंसा पर काबू के कोई आसार पैदा होते दिख नहीं रहे हैं। 
दरअसल राजधानियों से दूर जंगलों में इतने छोटे-छोटे सिपाहियों की मौतें होती हैं कि मानो शतरंज की बिसात पर प्यादे शहीद हो रहे हों। और शतरंज के खेल में आखिरी तक बचने वाले बड़े लोग बेअसर रह रहे हों। ऐसे में मुठभेड़, हत्या, शहादत, श्रद्धांजलि का सिलसिला ऐसे चले आ रहा है कि शहरों में महफूज रहने वाले लोग इन खबरों में आंकड़ों को देखकर बाकी बातों को छोड़ ही देते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि नौकरी के लिए बेबस लोग वर्दी पहनकर, बंदूक लेकर, केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों में शामिल होकर ऐसे मोर्चों पर चले तो जाते हैं, लेकिन वह जिंदा रहने की बेबसी अधिक होती है। और हर कुछ दिनों में वर्दियां लहूलुहान होती हैं, और केंद्रीय सुरक्षा बलों के ताबूत देश के कई राज्यों तक चले जाते हैं। 
हम नक्सल प्रभावित राज्यों और केंद्र सरकार के ऐसे रूख को सही नहीं मानते हैं जो कि किसी दीर्घकालीन समाधान को सोचे बिना रोज के रोज मोर्चे तक सीमित सोच वाला है। सरकारों को यह सोचना होगा कि राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक शोषण की वजह से उपजे हुए नक्सलवाद पर सरकार इन दशकों में कहां पहुंच पाई है? और दूसरी दिक्कत यह भी है कि जब सरकारी सुरक्षा कर्मचारी बहुत लंबे अर्से तक ऐसे इलाकों में मौत तले तैनात रहते हैं, तो कहीं वे आत्महत्या करते हैं, तो कहीं वे हत्या करते हैं। स्थानीय जनता के साथ उनके रिश्ते खराब होते चलते हैं, और मानवाधिकार को कुचलना उनके लिए कोई गंभीर बात नहीं रह जाती। यह सामाजिक जुल्म लंबा नुकसान कर रहा है, और सरकार के साथ जनता के रिश्ते अच्छे होना तो दूर रहा, खाई बढ़ती जा रही है। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को बंदूकों के मुकाबले बंदूकें तैनात करने के बजाए राजनीतिक बातचीत से नक्सल हिंसा खत्म करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बंदूकों का काम खासा महंगा है, और इसने हर बरस सैकड़ों जिंदगियां ली ही हैं, कोई इलाज पैदा नहीं किया है। हमारा साफ मानना है कि बातचीत के बिना लोकतंत्र में कोई आसान रास्ता नहीं है। 

इतने बड़े बजट में जख्मी शहीदों को बचाने एक अस्पताल नहीं !

संपादकीय
13 अप्रैल 2015

छत्तीसगढ़ के बस्तर में हर कुछ हफ्तों में नक्सल हमलों में राज्य या केन्द्र के सुरक्षा कर्मी मारे जाते हैं। वहां पर तैनात हेलीकॉप्टरों से अधिक जख्मी लोगों को राजधानी रायपुर के बड़े निजी अस्पताल में लाया जाता है, और उनकी जान बचाने की कोशिश होती है। नक्सल हिंसा अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से चली आ रही है, और बीच के बरसों में वह बहुत अधिक थी, हर बरस सैकड़ों लोग मारे जा रहे थे, और अभी भी हर बरस दर्जनों लोग शिकार हो ही रहे हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि साठ हजार करोड़ से अधिक सालाना बजट वाले इस राज्य में लगातार शहीद होने वाले लोगों के लिए राज्य बनने के डेढ़ दशक बाद भी जगदलपुर में एक ऐसा अस्पताल क्यों नहीं बन पाया है जहां कि जख्मियों की जान बचाने की बेहतर कोशिश तुरंत हो सके? यह जाहिर है कि चिकित्सा विज्ञान में अधिक जख्मी लोगों को जरूरी इलाज मिलने के पहले अगर कोई वक्त खराब होता है, तो उसे गोल्डन अवर का नुकसान कहा जाता है। जिंदगी और मौत के बीच इस एक घंटे का बहुत महत्व होता है, और जाहिर है कि बस्तर से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर तक हेलीकॉप्टर से भी लाने में, और फिर अस्पताल के रास्ते का सड़क-समय मिलाकर यह घंटे भर से अधिक का तो होता ही है। 
यह बात तकलीफदेह है कि जिस प्रदेश में साज-सज्जा के लिए, शहरी विकास के लिए, सड़कों को चौड़ा करने के लिए हर बरस हजारों करोड़ खर्च हो रहे हैं, वहां पर शहीदों को जिंदा बचाने की कोशिश के लिए सौ-दो सौ करोड़ का ऐसा अस्पताल बस्तर में डेढ़ दशक में भी नहीं बनाया गया जहां कि सबसे अच्छे इलाज का इंतजाम हो, और घायलों को दम तोड़ते हुए सैकड़ों किलोमीटर दूर के अस्पताल तक न लाना पड़े। हमारा मानना है कि इस प्रदेश और इस लोकतंत्र को बचाने के लिए जो लोग मोर्चों पर तैनात हैं, छत्तीसगढ़ के गांव-गांव से गए हैं, देश के अलग-अलग प्रदेशों से केन्द्रीय सुरक्षा बलों के रास्ते आकर बस्तर में तैनात हैं, उनको बचाने के लिए कुछ सौ करोड़ का ऐसा आधुनिक अस्पताल राज्य सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है। ऐसा न करना उन लोगों की जिंदगी को खतरे में छोड़ देना है जो कि घर-बार से दूर लोकतंत्र को बचाने के लिए नक्सल मोर्चों पर धमाकों के बीच जीते हैं, और जिनको अपनी खुद की जिंदगी का कोई अंदाज नहीं रहता कि वे कब तक जिंदा रहेंगे। 
राज्य की बाकी चिकित्सा सेवा की जो बदहाली है, वह तो जाहिर है, और उसी किस्म का इंतजाम जगदलपुर के अस्पताल या मेडिकल कॉलेज का होगा इसमें कोई शक नहीं। लेकिन नक्सल मोर्चे पर शहादत को प्रदेश की बाकी इलाज से अलग रखने की जरूरत है, और छत्तीसगढ़ से सबक लेकर केन्द्र सरकार नक्सल प्रभावित बाकी इलाकों में भी ऐसे इंतजाम कर सकती है। आज भी हमारा ख्याल है कि हेलीकॉप्टरों से घायलों को लेकर आने, और लंबा निजी इलाज करवाने का सिलसिला कोई सस्ता नहीं पड़ता होगा। लेकिन इससे भी अधिक जरूरी बात है जिंदगी और मौत के बीच के समय को घटाने की। छत्तीसगढ़ को चाहिए कि बिना देर किए हुए बस्तर में एक ऐसा अस्पताल खड़ा करे जो कि बहादुर सुरक्षा कर्मचारियों को बचाने के काम आ सके। शहरों में बैठे हुए लोग यह नहीं समझ सकते कि नक्सल मोर्चां पर तैनात लोग और उनके परिवार किस तरह के तनाव में जीते होंगे। राज्य को अपनी सुरक्षा करने वालों को उनकी जिंदगी के लिए सुरक्षा देने का काम करना चाहिए, और हमारा ख्याल है कि यह राज्य बहुत आसानी से सौ-दो सौ करोड़ में ही बस्तर में ऐसा अस्पताल खड़ा कर सकता है जिसके बाद किसी जख्मी को बाहर लाने की जरूरत न पड़े। ऐसा अगर होता है तो वह देर से सही, एक सही फैसला होगा, और इसके बाद ही सरकार एक जिम्मेदार सरकार कही जा सकेगी।

कश्मीरी पंडितों की घरवापिसी, और बाकी देश का माहौल...

संपादकीय
12 अप्रैल 2015

जम्मू कश्मीर सरकार के सामने, और केन्द्र की मोदी सरकार के सामने भी यह एक बड़ी चुनौती है कि कश्मीर से बेदखल किए गए कश्मीरी पंडितों को वहां पर किस तरह वापिस बसाया जा सके। एक विचार यह चल रहा है कि उनके लिए अलग से एक बस्ती बनाई जाए, और दूसरा रास्ता यह तो है ही कि जिस तरह वे पहले कश्मीर की बाकी मुस्लिम आबादी के साथ घुले-मिले रहते थे, उसी तरह उनको वहां फिर से बसाया जाए। करीब 25 बरस से वहां के लाखों कश्मीरी पंडित प्रदेश के बाहर रहने को मजबूर हैं, और देश की राजधानी दिल्ली में उनके लिए शरणार्थी बस्तियां बसाई गई थीं। तब से लेकर अब तक वे अपने ही देश में शरणार्थी हैं, और पिछली पूरी पीढ़ी ने अपनी जमीन को देखा ही नहीं है, हो सकता है कि सैलानी बनकर वहां आए-गए हों। 
1985 से 1995 के बीच कश्मीर में जिन जिहादियों की बंदूकें बोलती थीं, उन्होंने लाउडस्पीकरों पर धमकियां दे-देकर कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोडऩे पर मजबूर किया था। इसके बाद उनके घर-बार कहीं जला दिए गए, कहीं कब्जा कर लिए गए, और कुछ लोगों को सरकार से उसका मुआवजा भी मिला। लेकिन अभी भी कश्मीर की राजधानी श्रीनगर जाएं तो कोई भी टैक्सी वाला यह बताते चलता है कि कौन-कौन सी उजाड़ इमारत कश्मीरी पंडित की थी, और कौन-कौन सी सपाट जगह पर वैसी कौन सी इमारत जला दी गई थी। इस बारे में हम लिख जरूर रहे हैं, लेकिन इसका कोई आसान रास्ता है नहीं। जम्मू-कश्मीर में आज भाजपा-पीडीपी की जो गठबंधन सरकार है उसके न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत भी इसका कोई रास्ता निकलते नहीं दिखता है, और कश्मीरी पंडितों की बस्ती बसाने की एक चर्चा शुरू होने पर ही श्रीनगर में अलगाववादियों ने कल बंद करवा दिया था। 
कश्मीर के मामले में हिन्दू, मुस्लिम एक मुद्दा है, भारत या पाकिस्तान के साथ हमदर्दी दूसरा मुद्दा है, और लोकतंत्र या आतंक, यह तीसरा मुद्दा है। और इनमें से हर मुद्दा अपने आपमें काफी जटिल है, और जब ये तीनों मिल जाते हैं तो इतना अंधेरा खड़ा कर देते हैं, कि कोई राह नहीं सूझती। फिर इसके ऊपर एक जटिलता और भी है, केन्द्र और राज्य के संबंधों की। कश्मीर का जब भारत में विलय हुआ था, तो संविधान में उसे जो विशेष दर्जा दिया गया था, उसे जो खास रियायतें दी गई थीं, उनके खिलाफ जनसंघ के जमाने से भाजपा लगातार आंदोलन करते आई है। अब आज इस राज्य में सत्ता में हिस्सेदारी के लिए भाजपा ने अपने बुनियादी सिद्धांतों के साथ जो तात्कालिक समझौता किया है, वह अपने आपमें एक बड़ी विसंगति है, और भाजपा की दीर्घकालीन नीतियों को देखें, तो वह एक बड़ा आंतरिक विरोधाभास है। ऐसे में कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापिसी के अलावा भी दूसरी गुत्थियां आपस में दोनों पार्टियां सुलझा नहीं पा रही हैं, और यह तो एक बहुत बड़ा मुद्दा है। 
आज कश्मीरी पंडितों के बिना भी वहां पर आतंकी मुस्लिम दूसरे मुस्लिमों को मार रहे हैं, सरहद पार से आए हुए लोग, या वहां के अलगाववादी वहीं के मुस्लिमों के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, और वैसे में कश्मीरी पंडितों को वापिस बसाने का काम बड़ा ही मुश्किल लगता है, लेकिन उतना ही जरूरी भी है। लेकिन ऐसी किसी भी जटिलता से परे हमारा यह साफ मानना है कि कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश के भीतर आंतरिक विस्थापित लोगों की तरह रहने की तकलीफ से उबारने की जरूरत है, और कश्मीर के भीतर राष्ट्रीय सोच इतनी विकसित करने की जरूरत है कि धर्म से परे लोग एक कश्मीरियत को अहमियत दें, और दोनों तबके वहां पर मिलकर रह सकें। 
आज कश्मीर में हिन्दू पंडितों की वापिसी के लिए देश में जैसे राष्ट्रीय वातावरण की जरूरत है, उसे तबाह करने का काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ के लोग, उनके हमख्याल लोग बड़ी तेजी से कर रहे हैं। साधू-साध्वियों से लेकर शिवसेना और धर्मसेना तक, विश्व हिन्दू परिषद तक जिस तरह की मुस्लिम विरोधी बातें कर रहे हैं, वे तमाम बातें कश्मीरी पंडितों के भविष्य के खिलाफ भी जा रही हैं। यह भी हो सकता है कि ऐसे संगठन कश्मीरी पंडितों को पूरी जिंदगी, हमेशा के लिए, शरणार्थी ही बनाकर रखना चाहें, ताकि नफरत को रोज खाना खिलाया जा सके। लेकिन इन तमाम संगठनों के भविष्य से परे देश का इतिहास यह देखेगा, और यह लिखेगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने देश की ऐसी बड़ी समस्याओं का क्या समाधान निकाला। देश में चारों तरफ नफरत की बात करते हुए कश्मीर के भीतर कश्मीरी पंडितों को वापिस बसाना एक बड़ी दिक्कत है, और बड़ा खतरा है। देश के भीतर जब तक माहौल अच्छा नहीं रहेगा, मोदी कोई इतिहास नहीं रच सकेंगे। 

प्राकृतिक संसाधनों के मुद्दे पर पाकिस्तान में थोक में कत्ल...

संपादकीय
11 अप्रैल 2015
पाकिस्तान में हिंसा से गुजर रहे बलूचिस्तान प्रांत में आतंकियों ने एक बांध पर काम कर रहे मजदूरों की बस्ती पर हमला किया जिसमें 20 पंजाबी और सिंधी मजदूर मारे गए। सोए हुए मजदूरों पर अंधाधुंध गोलीबारी की यह वारदात अपने किस्म की नई नहीं है, इसके पहले भी बलूच आतंकी हमले करते रहे हैं क्योंकि उनका यह मानना है कि पंजाब प्रांत के ताकतवर लोग बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करते हैं। भारत से बहुत दूर और एक अलग किस्म की यह हिंसा एक दूसरी तरफ ध्यान खींचती है कि भारत में भी खदानों वाले जो प्रदेश हैं उनमें से आधा दर्जन में नक्सल हिंसा के पीछे एक तर्क यह भी है कि वहां पर खदानों और जंगलों, जमीन और पानी का शोषण हो रहा है, और कारखानेदार और खदान चलाने वाले लोग आदिवासियों का, ग्रामीणों का शोषण करते हैं। सरकार के साथ लगातार एक टकराव जंगल और सड़कों से लेकर अदालतों तक चले आ रहा है। 
इस किस्म के टकराव पूरी दुनिया में प्राकृतिक साधनों से संपन्न देश-प्रदेशों में बिखरे हुए हैं और धरती से परे की कल्पना वाली हॉलीवुड की फिल्म अवतार में भी यही कहानी थी कि किस तरह इस धरती के लोग दूसरे ग्रह पर जाकर वहां के प्राकृतिक साधनों के लिए वहां की जनता के साथ हिंसा करते हैं। भारत में भी बनी एक फिल्म सरकार राज में यही कहानी थी कि सरकार और कारोबार मिलकर किस तरह लोगों को बेदखल करते हैं, और खदान-कारखानों का काम करते हैं। और ऐसी बातें महज फिल्मों में हों ऐसा भी नहीं है, असल जिंदगी में भी यही देखने मिल रहा है, और इसलिए नक्सलियों से लेकर अन्ना हजारे तक, और कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक इन मुद्दों को लेकर सड़क पर हैं। यह एक अलग बात है कि कांग्रेस आज  विपक्ष में हाशिए पर होने की वजह से इस मुद्दे को उठा रही है वरना कल तक वह भी जमीनों और खदानों की बंदरबांट के धंधे में लगी हुई थी। 
आज जिस रफ्तार से भारत जैसे लोकतंत्र में आर्थिक विकास के नाम पर सारे प्राकृतिक संसाधनों को रफ्तार से बांटा जा रहा है, वैसा आर्थिक विकास आम जनता की जिंदगी में न तो उस रफ्तार से जरूरी है, और न ही उसकी जिंदगी में वैसा कोई विकास आने जा रहा है। विकास के सकल राष्ट्रीय उत्पादन के आंकड़े, प्रति व्यक्ति औसत आय के आंकड़े बुरी तरह फर्जी तस्वीर पेश करते हैं। देश के बड़े कुछ सौ उद्योगपतियों की कमाई के आंकड़ों को गरीबी के रेखा के नीचे के लोगों की कमाई के साथ जोड़कर जब एक औसत कमाई बताई जाती है, तो वह एक कद्दू और एक अंगूर की मिलवा सब्जी जैसी होती है। आर्थिक विकास की जरूरत और आंकड़ों को दिखा-दिखाकर देश की तमाम सरकारें रफ्तार से अपने कार्यकाल के चलते-चलते सब कुछ बांट देना चाहती हैं। एक वक्त रियासतें और जमींदारियां हुआ करती थीं, आज केन्द्र और राज्य सरकारें कारखानेदारों को नए जमींदार बनाने पर आमादा हैं, और ऐसे में एक सामाजिक तनाव, टकराव और हिंसा के बढऩे का खतरा भी है। 
पाकिस्तान के बलूचिस्तान से लेकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, और बिहार में जिस तरह से हिंसा की वारदातें होती हैं, वे अलग-अलग वजहों से भी हो सकती हैं, लेकिन उनके बीच प्राकृतिक साधनों के तेज रफ्तार शोषण की बात एक सरीखी दिख रही है। उन दोनों मिसालों में बहुत से बातें अलग भी होंगी, और दो उदाहरणों की तुलना करना एक खतरनाक काम होता है, क्योंकि उनके बीच फर्क अधिक बड़ा हो सकता है और समानता छोटी। लेकिन फिर भी दुनिया की तस्वीर को देखने के लिए हमको किसी एक मिसाल से ऊपर उठकर सोचना होता है, और बलूचिस्तान में जो हुआ है, उससे यह याद आता है कि छत्तीसगढ़ में कुछ-कुछ दिनों में कारोबार या सरकार के काम में लगे हुए लोगों को नक्सली उठा ले जाते हैं, या मारते हैं। 

नेताजी की जासूसी का नेहरू पर आरोप जांच और बहस के लायक

संपादकीय
10 अप्रैल 2015
आज सुबह से भारतीय मीडिया इस सनसनीखेज खबर से भरा हुआ है कि इंटेलीजेंस ब्यूरो की अब उजागर हुई फाइलों के मुताबिक नेहरू ने अपने पूरे कार्यकाल सुभाषचंद्र बोस और उनके परिवार की खुफिया निगरानी करवाई। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और नेताजी के बीच आजादी के बहुत पहले से कांग्रेस की राजनीतिक भीतर गहरे मतभेद रहे, और संगठन के भीतर उनका गहरा मुकाबला भी रहा। लोग गांधी को इस बात की तोहमत भी देते आए हैं कि उन्होंने कांग्रेस की लीडरशिप के मामले में बोस को किनारे करके नेहरू को गलत तरीके से आगे बढ़ाया। खैर, वह सब पुरानी बातें हैं जिनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन जो नई बात अभी सामने आई है, वह कुछ लोगों को चांैका सकती है, और अधिकतर लोगों को पहले से चली आ रही उनकी धारणा मजबूत करने का एक मौका देती है कि नेहरू ने बोस के साथ इंसाफ नहीं किया। 
भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास को देखें, तो उसमें कई अलग-अलग विचारधाराएं काम करती थीं। गांधी ने भगत सिंह की फांसी को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि उन्होंने साफ-साफ मना कर दिया था कि अंग्रेज सरकार पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके वे इन क्रांतिकारियों की फांसी रूकवाने की कोशिश करें। इसी तरह सुभाषचंद्र बोस का आजादी पाने का तरीका अलग था, और उसके लिए वे जर्मनी जाकर हिटलर से भी मिले थे, और वह एक लंबा इतिहास है। बाद में जब नेताजी की एक विमान दुर्घटना में मौत की खबर आई, तो लंबे समय तक यह विवाद चलते रहा कि वे उस हादसे में सचमुच गुजरे थे, या कि वे जिंदा हैं, और किसी वजह से लोगों से दूर हैं। आजादी के वक्त से लेकर अब तक यह विवाद खत्म ही नहीं होता है। 
लेकिन इतिहास पर लिखना आज का मकसद नहीं है। सरकार के काम करने के तरीके कैसे-कैसे हो सकते हैं, इस पर यह ताजा खबर सोचने को मजबूर करती है। केन्द्र सरकार हो, या कि राज्य सरकारें, खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल करके राजनीतिक जासूसी तो आम बात है ही, निजी जिंदगी में तांक-झांक भी कोई नई बात नहीं है। सुभाषचंद्र बोस का मामला आजादी के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संवेदनशील मामला था, क्योंकि सोवियत संघ से नेहरू का घरोबा, और हिटलर से बाकी तमाम दुनिया की नफरत के चलते हुए न सिर्फ कांग्रेस की राजनीति के लिए, बल्कि भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए भी नेताजी के मामले को सुलझाना या समझना जरूरी रहा होगा। अब नेहरू की जो तस्वीर पिछली आधी सदी के इतिहास में बनी है या बनाई गई है उसमें एक तरफ उनकी महानता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके ऊंचे कद की बात है, और दूसरी तरफ उनसे नफरत करने वाले लोग उन दो-चार तस्वीरों से अब तक चिपके हुए हैं जिसमें वे किसी महिला के साथ सिगरेट पीते दिख रहे हैं, या जिन बातों से उनके एडविना माउंटबेटन के साथ अंतरंग संबंध स्थापित होते हैं। 
हमारा मानना है कि नेहरू वैसे ही इंसान थे जैसे कि गांधी थे, या सुभाष बाबू थे, या कि नेहरू के आलोचक हैं। इतिहास हर महान की कमजोरियों को भी दर्ज करता है, और जब सरकारी गोपनीय कागजात बाहर आते हैं, तो किसी की भी महानता या कामयाबी-नाकामयाबी के मूल्यांकन का एक मौका मिलता है। हम इसे किसी भी तरह नेहरू का चरित्रहनन नहीं मानते, और इस तरह का विश्लेषण हर बड़े और महान व्यक्ति का होना ही चाहिए। सार्वजनिक जीवन में एवरेस्ट जैसी ऊंचाई पर पहुंचने वाले लोग अपने सार्वजनिक कामकाज को लेकर किसी तरह की गोपनीयता का दावा नहीं कर सकते। देश का कानून जब तक किसी बात को गोपनीय बनाए रखना जरूरी समझता है, उसके तुरंत बाद ऐसे तमाम दस्तावेज लेकर इतिहास के पुनर्लेखन का काम होना चाहिए, क्योंकि इतिहास लिखना कभी इतिहास नहीं होता, नए तथ्यों के सामने आने के बाद इतिहास भी फिर से लिखा जाता है, लिखा भी जाना चाहिए। 
सरकार नेहरू चलाए, मोदी चलाए, या किसी राज्य का मुख्यमंत्री चलाए, सरकार चलाते हुए निगरानी के जो अधिकार रहते हैं, शायद ही कोई उनका लालच छोड़ पाते हों। यही नतीजा है कि वक्त गुजर जाने के बाद जासूसी और निगरानी की ऐसी बातें साबित होती हैं, और इतिहास में दर्ज लोगों की महानता की लंबाई-चौड़ाई के नाप को फिर से दर्ज किया जाता है। नेहरू ने अगर जासूसी करवाई होगी, तो वह सरकार की एक आम बात रही होगी, और आज भी है। वह जायज थी, या नाजायज थी, इस पर बहस हो सकती है। और अगर ये ताजा दस्तावेज गलत हैं, तो उन पर भी भारत के सार्वजनिक जीवन में जांच-परख हो सकती है, और बहस भी हो सकती है। हम इसे एक अच्छी बात मानते हैं कि जो बातें अब राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से नाजुक नहीं रह गई हैं, वे कानूनी रूप से उजागर हों, और इतिहास का एक बार फिर से मूल्यांकन हो। दुनिया के जो विकसित लोकतंत्र हैं, उनमें ऐसी पारदर्शिता का सम्मान होता है।

बेकसूरों की ऐसी थोक-हत्याओं के खिलाफ ही आतंक को जगह-जगह जमीन मिलती है

संपादकीय
9 अप्रैल 2015

आन्ध्र-तेलंगाना से दो दिनों में दो खबरें आई हैं। वहां जंगलों से चंदन की कटाई रोकने के लिए बनाए गए खास हथियारबंद दस्ते ने एक ही रात दो मुठभेड़ों में बीस लोगों को मार गिराया जिन पर लाल चंदन के पेड़ों की कटाई का आरोप था। पुलिस के इस दस्ते ने इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई कहा, हालांकि इस मुठभेड़ में किसी पुलिस की मौत की कोई खबर नहीं है। इस मामले में एक गवाह सामने आया है जिसका कहना है कि पुलिस ने एक बस में जा रहे तमिलनाडू के सात लोगों को बंदूक की नोंक पर उतारा और जंगल से मिली लाशों में ये लोग भी शामिल हैं। यह गवाह बस में एक महिला के बगल में बैठा था और शायद पुलिस ने उसे उसका पति समझकर नहीं उतारा। दूसरी घटना तेलंगाना की है जिसमें पुलिस ने सिमी के आतंकी होने के आरोप में गिरफ्तार लोगों को जेल से अदालत ले जाते हुए रास्ते में मार गिराया, और उन पर यह आरोप लगा है कि वे भागने की कोशिश कर रहे थे। इस मामले में सारे आरोपी हथकडिय़ों में जकड़े हुए थे, और ऐसे पांच लोगों के लिए साथ में सत्रह हथियारबंद पुलिस थी। हथकडिय़ों में पांच लोग सत्रह हथियारबंद पुलिस पर कैसे कब्जा कर सकते थे, यह सवाल उठता है। 
लेकिन दो ही दिन पहले छत्तीसगढ़ में एक न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट आई है जिसमें नक्सली होने के आरोप में एक नाबालिग लड़की मीना खलखो की मौत की जांच पर निष्कर्ष यह है कि उसे पुलिस ने मारा था। अब बरसों बाद आई इस जांच रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार ने उसी सीआईडी को यह जांच सौंपने का फैसला लिया है जिस पर मीना खलखो के परिवार पर मौत के वक्त दबाव डालने का आरोप चले आ रहा था। लेकिन यह अकेला ऐसा मामला नहीं है और नक्सल प्रभावित बस्तर में पुलिस की ज्यादती के दर्जनों मामले हर बरस सामने आते हैं, जिनकी जांच करना भी मीडिया के लिए मुश्किल होता है, और सरकार हर बार पुलिस या सुरक्षा बलों के साथ खड़ी हुई दिखती है। यही हाल कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में सुरक्षा बलों, सेना और पुलिस के हाथों हुई मुठभेड़-मौतों को लेकर चलते रहता है। 
दरअसल वर्दीधारी सुरक्षा बलों की ज्यादती और जुर्म के अधिकतर मामलों को सरकार में बैठे हुए निर्वाचित लोग इसलिए बर्दाश्त करते हैं क्योंकि वे खुद वर्दियों से गलत काम करवाते हैं। ऐसे में गलत काम इन दो तबकों के बीच एक मजबूत जोड़ का काम करते हैं, और आपसी जरूरत की खड़ी की गई ऐसी नौबत से इन दोनों के बीच गहरे रिश्ते चले चलते हैं। जिन निर्वाचित लोगों पर जनता के प्रति जवाबदेही का जिम्मा भी रहता है, वे भी जानते हैं कि बरसों तक चलने वाली एक जांच के बाद फिर बरसों तक चलने वाली दूसरी जांच के बाद कई-कई बरस चलने वाले एक-एक मुकदमे के चलते हुए जब तक गुनाह किसी के माथे चिपकता है, तब तक कई चुनाव निपट चुके रहते हैं, और जुर्म की मंजूरी देने वाली सरकारें, सत्तारूढ़ पार्टियां, या नेता बड़ा लंबा राजनीतिक सफर तय कर चुके रहते हैं। बरसों बाद या दशकों बाद आने वाले आखिरी फैसले तक हिंसा और जुर्म की यादें इतनी धुंधली हो चुकी रहती हैं कि उनका कोई मतलब नहीं रह जाता। 
इस नौबत के लिए हम एक बड़ी जवाबदेही उन संवैधानिक संस्थाओं की भी मानते हैं जिन्हें भारतीय लोकतंत्र में सरकार से परे जनता के हितों के लिए बनाया गया है। प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग या बाल कल्याण परिषद जैसे बहुत से संवैधानिक ढांचे हैं जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे जनता पर होने वाले जुल्म और जुर्म पर नजर रखें, खुद होकर जांच करें, और सरकारी हिंसा को रोकने का काम करें। लेकिन इन कुर्सियों पर सत्ता अपने तोता-मैना बिठा-बिठाकर इनको सरकार का एक मातहत अमला बना देती है, और सुविधाओं,  वेतन-भत्तों, सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते ये लोग सरकारी हिंसा को अनदेखा करने या उसे बेकसूरी का सर्टिफिकेट देने से अधिक कुछ काम नहीं करते। केन्द्र और राज्य में एक पार्टी के मनोनीत लोगों को जब किसी दूसरी पार्टी के राज में हुई सरकारी हिंसा पर कार्रवाई का मौका मिलता है, तो मानो उनमें एकाएक जिम्मेदारी जाग उठती है।
कुल मिलाकर आज हम यह कहना चाहते हैं कि अगर सत्ता चलाने वाले निर्वाचित नेता अपनी गलत नीयत और वर्दियों के गलत इस्तेमाल के चक्कर में न रहें, तो वर्दियों की हिंसा जारी रहने की कोई वजह नहीं हो सकती। देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वक्त पर खादी और खाकी की यह गिरोहबंदी बेकसूर और बेजुबान जिंदगियों को खत्म करने का काम करती है, और पिछले दो-तीन दिनों में जो मामले सामने आए हैं वे यह बताते हैं कि यह लोकतंत्र उन्हीं के लिए है जिनके पास अपने आपको, अपने-आपके जुर्म को बचाने की ताकत है, और दूसरों को मारने की भी। ऐसे लोकतंत्र और बेकसूरों की थोक में ऐसी हत्याओं के खिलाफ ही नक्सलियों को जगह-जगह जगह मिलती है।

ऐसा वीआईपी दर्जा किस काम का जिसमें और खतरे में पड़ते रहें...

संपादकीय
8 अप्रैल 2015

केन्द्रीय विमान मंत्री ने एक साधारण बातचीत में यह कहकर सनसनी फैला दी कि वे अपनी जेब में माचिस लेकर विमान में आते-जाते हैं, लेकिन मंत्री होने की वजह से अब उनकी तलाशी नहीं होती। उन्होंने अपने आपको चेन स्मोकर बताते हुए कहा है कि वे इसी वजह से जेब में हमेशा माचिस रखते हैं। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि माचिस से कोई विमान अपहरण तो कर नहीं सकता। 
अभी देश रॉबर्ट वाड्रा के खास सुरक्षा दर्जे से उबर भी नहीं पाया है, और पूरे देश में वीआईपी शब्द बुरी तरह से बदनाम हो रहा है, और उस बीच में एक केन्द्रीय मंत्री का यह कहना बहुत किस्म के सवाल उठाता है। रॉबर्ट वाड्रा के लिए पूरे देश के विमानतलों पर यह लिखा हुआ था कि जब भी वे प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ सफर करेंगे, उनकी सुरक्षा जांच नहीं होगी। लोग विमानतलों पर लगातार देखते हैं कि बड़े नेताओं और बड़े अफसरों को सुरक्षा जांच से किस तरह अघोषित छूट भी दे दी जाती है। और छूट का दर्जा प्राप्त लोग भी बहुत से हैं, सरकारी और संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए दर्जनों लोगों को सुरक्षा जांच से घोषित छूट मिली हुई है, और इन ओहदों वाले लोग अलग-अलग वक्त पर जुर्म करते भी पकड़ाए हैं, जेल भी गए हैं, और आज भी कटघरों में हैं। ऐसे में इनको सुरक्षा जांच से छूट देने पर कुछ सवाल खड़े होते हैं कि सार्वजनिक विमान में बाकी मुसाफिरों की जिंदगी भी दांव पर लगी रहती है, और किसी को भी ऐसे में छूट की इजाजत क्यों मिलनी चाहिए? दूसरी बात यह कि अगर ऐसे बड़े लोग सार्वजनिक विमानों से चलने के बजाय सरकारी विमानों से चलते हैं, तो भी वह तो जनता के पैसों का ही विमान होता है, और सुरक्षा जांच छूट के चक्कर में उनके साथ कोई ऐसा सामान भी रख सकते हैं जिससे विमान को नुकसान पहुंचाया जा सके। किसी को भी न तो जनता के साथ सफर करते हुए, न ही जनता के पैसों के विमान पर सफर करते हुए ऐसी कोई छूट दी जा सकती है। और ऐसी छूट सीधे-सीधे आम जनता के हक के खिलाफ है। 
दूसरी बात यह कि भारत की वीआईपी संस्कृति अंग्रेजों के वक्त के सामंती इंतजाम का बचा हुआ कचरा है। अक्सर ऐसे लोग किसी उड़ान में लेट पहुंचते हैं, रेल्वे स्टेशनों पर इनके लिए प्लेटफॉर्म बदले जाते हैं, सड़कों पर इनके लिए ट्रैफिक को रोका जाता है, सार्वजनिक जगहों पर इनकी गाडिय़ों के काफिले रोककर बाकी लोगों के लिए दिक्कतें खड़ी की जाती हैं। इस देश में और इसके प्रदेशों में इस पर रोक इसलिए नहीं लग पा रही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी ऐसी ही तमाम वीआईपी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं, और यह बात भारतीय संविधान के समानता के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है। इसके खिलाफ पूरे देश में एक ऐसे जनमत को खड़े करने की जरूरत है जिससे कि वोटों के मोहताज नेता भी हिल जाएं, और अदालतों पर भी जनमत का असर हो। 

एनडीए के भीतर शिवसेना घरेलू ऑडिटर सरीखी...

7 अपै्रल 2015
संपादकीय
महाराष्ट्र की शिवसेना वैसे तो बहुत से मुद्दों पर एक आक्रामक और उग्र मराठीवाद और महाराष्ट्रवाद को लेकर चलती है, और बाल ठाकरे के वक्त से मुस्लिमों के खिलाफ उसकी जो बातें रहते आई हैं, उनसे देश के समझदार और धर्मनिरपेक्ष तबके की सहमति की कोई गुंजाइश नहीं रहती। लेकिन एनडीए के भीतर भाजपा के एक भागीदार की हैसियत से, और महाराष्ट्र में सत्ता के गठबंधन की हिस्सेदार के रूप में जब वह भाजपा की रीति-नीति के खिलाफ खुलकर कहती है, अपनी पार्टी के अखबार में अकसर लिखती है, तो उसकी बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं। उसने पिछले कई महीनों में, या कि मोदी की सरकार बनने के पहले से लेकर अब तक मोदी से लेकर भाजपा के दूसरे नेताओं तक की जो आलोचना की है, वह भाजपा के लिए एक आत्ममंथन की बात रहते आई है। उसने महाराष्ट्र सरकार के कई फैसलों के खिलाफ भी लगातार लिखा है और कहा है। कल शिवसेना ने अपने अखबार में संपादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो झाड़ू लेकर गंदगी साफ करने के लिए निकले हैं, लेकिन उनकी पार्टी के नेता, सांसद और मंत्री अपने मुंह से जिस तरह की गंदगी फैला रहे हैं, वैसे मुंह वे कैसे साफ करेंगे? 
हमारे पाठकों को याद होगा कि मोदी के सत्ता में आने के बाद से हर हफ्ते-दो हफ्ते देश में मोदी के साथियों या उनके समर्थक संगठनों, या उनके मंत्री-सांसदों ने ऐसे भयानक बयान दिए हैं कि उनकी वजह से हमें भी नरेन्द्र मोदी और भाजपा को यह सलाह देनी पड़ी कि वे अपने लोगों को काबू करें। आज ही किसी एक बड़े अंगे्रजी अखबार में किसी का लेख है कि किस तरह बकवासी बयानों ने मोदी के इतने महीनों की उपलब्धियों को ढांककर रख दिया है। उनका सारा आर्थिक एजेंडा, और देश-विदेश में उनकी बनाई हुई कल्पना की तस्वीर पर आए दिन उनके साथ के लोग पीकते चलते हैं। यह सिलसिला उनको इसलिए खत्म करवाना चाहिए क्योंकि इससे उनकी पार्टी और उनकी अपनी छवि का चाहे जो नुकसान हो रहा हो, इससे देश के माहौल का भी एक बड़ा नुकसान हो रहा है। और जब विविधताओं वाले इस विशाल देश में एक निहायत गैरजरूरी और थोपी हुई साम्प्रदायिकता हावी रहेगी, तो यह जाहिर है कि सारे आर्थिक सपने धरे रह जाएंगे। जब राज्य साम्प्रदायिकता, कट्टरता, और अवैज्ञानिक मुद्दों से जूझते रहेंगे, तब केंद्र की मोदी सरकार भी अपने खुद के तय किए हुए लक्ष्य पूरे नहीं कर पाएगी। आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें जमीन पर गिर पड़ी हैं, इसलिए मोदी को देश में अधिक दिक्कत नहीं हो रही है। लेकिन अगर ये कीमतें कुछ बरस की तरह आसमान पर पहुंची हुई रहतीं, तो आज देश की जनता की बेचैनी मोदी को घायल भी करती।
मोदी और भाजपा को शिवसेना की कही हुई इस बात को अपने खुद के हित में गंभीरता से लेना चाहिए। देश के माहौल में आज अगर भाजपा मंत्री और नेता अठारहवीं सदी की कट्टरता को बढ़ावा देने में लगे हैं, अवैज्ञानिक बातों को फैलाने में लगे हैं, वैज्ञानिक तथ्यों को नकारने में लगे हैं, संसदीय समितियों में रहते हुए अपने खुद के तंबाकू कारोबारों को बढ़ाने में लगे हैं, तो यह सिलसिला थमना चाहिए। एनडीए के भीतर शिवसेना आज एक घरेलू ऑडिटर जैसा काम कर रही है। भाजपा को, और बाकी एनडीए को भी इसका फायदा उठाना चाहिए।