बुरा वक्त चि_ी लिख नहीं आता अच्छे वक्त में तैयारी ही समझदारी

संपादकीय
30 मार्च 2015
कश्मीर एक बार फिर बाढ़ से घिरा है और श्रीनगर से लेकर जम्मू तक अलग-अलग कई जगहों पर बाजार और बस्तियां डूबे हुए हैं। गर्मियों के इस मौसम में जब कश्मीर को कुछ महीने पहले की बाढ़ का कुछ सैलानी-मुआवजा मिलने का आसार था, कश्मीर फिर बाढ़ का शिकार हो गया। कुछ हिस्सों में सड़कें बर्फ से बंद हैं, कई शहर बाढ़ में अगली बर्बादी की कगार पर हैं। इससे बिल्कुल अलग कुछ अलग-अलग और खबरें भी हैं। मुम्बई में एक बड़े अस्पताल में एक गर्भवती महिला ने चार दिन पहले अपना बच्चा खोया, और वह अस्पताल के बिस्तर पर ही थी कि कल उसके सिर पर छत का पंखा गिर गया। उत्तरप्रदेश में गाज गिरी और कुछ लोग मौके पर ही मारे गए, कुछ लोग झुलस गए। दुनिया के कुछ और देशों में सुनामी की चेतावनी सुनाई पड़ रही है। और साल के हर दिन हर पल कहीं न कहीं हादसों में लोगों की जान ऐसे जाते रहती है, ऐसे नुकसान होते रहते हैं जिनके बारे में उन्होंने कुछ पल पहले भी सोचा नहीं होगा। 
दूसरी तरफ इंसानों से दूर, शहरी पढ़ाई-लिखाई से नावाकिफ चीटियां बारिश के जिस मौसम में बाहर खाना नहीं पा सकतीं, वैसे आड़े वक्त के लिए वे एक पूरे समुदाय के रूप में खाना इक_ा करके रखती हैं, ताकि भूखों मरने की नौबत न आए। लेकिन अगर हम सोचें कि इंसानों में कितने लोग बुरे वक्त की सोचकर, अपने अच्छे वक्त में कुछ किफायत और कुछ कटौती करके मुसीबत से जूझने की कुछ तैयारी करके रखते हैं, तो हम आईना देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकते। कम ही लोग ऐसे रहते हैं जो कि किसी मुसीबत का अंदाज लगाकर वक्त रहते कुछ बचत करें, कुछ बीमा करवाएं, और किफायत में काम चलाएं। यह बात सही है कि हमारी इस मसीहाई नसीहत का सलीब ढोने की गुंजाइश आज के थके हुए और लदे हुए मध्यमवर्गीय या निम्न आय वर्ग के लोगों के कंधों में बची नहीं है। लोग आज का काम ही बड़ी मुश्किल से चला पाते हैं। लेकिन अगर चीटियों सहित कुछ और समझदार नस्लों से सबक लें, तो अच्छे वक्त में थोड़ा सा वक्त बुरे के हिसाब से भी अलग रखना चाहिए। मुसीबत की मार के वक्त तो कुछ भी नहीं सूझता, कुछ भी नहीं बचता। महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में हम देखते हैं कि कर्ज से लदे किसान जब थोक में खुदकुशी करते हैं, तो यह जाहिर रहता है कि एक फसल की बर्बादी भी वे झेल नहीं पाते। लेकिन यह बात भी सच है कि आत्महत्या के पहले की कई बरसों में फसलों से उनका कुछ न कुछ काम चल रहा था, और उस वक्त कुछ अधिक तकलीफें झेलकर कुछ अधिक बचत कर ली होती, तो आज इतनी बुरी नौबत न आती कि जान देना ही अकेला रास्ता बचता। 
हम कोई नई बात नहीं कह रहे, और न ही कोई बहुत मौलिक बात। हम तो दुनिया के सयाने लोगों की हमेशा की दी गई नसीहत को दुहरा रहे हैं, ताकि जिन लोगों को इसे पढ़कर आज से ही कुछ बचत और कुछ किफायत सूझ सके, उन लोगों को आज मामूली तकलीफ झेलकर भी ऐसा करना चाहिए, ताकि आड़े वक्त पर भी वे खड़े रह सकें। गाज गिरने से घर के कमाऊ लोग अगर एकदम से चले जाते हैं, तो घर-परिवार का क्या होगा, यह भी सोचने की बात है। केन्द्र सरकार ने गरीबों के लिए एक बहुत ही रियायती बीमा का इंतजाम किया है, और यह मदद पाने के हकदार वे ही लोग रहेंगे जो कि इसके कागज-पत्तर पूरे कर चुके रहेंगे। घर बैठे, बिना हाथ हिलाए कुछ भी नहीं मिलता। इसलिए इस तरह के बीमे और बाकी हक की सरकारी रियायतें पाने के लिए लोगों को औपचारिकताएं पूरी करके रखना चाहिए। इसके बाद यह भी कि बीमारी, हादसे, या किसी और बुरे वक्त के हिसाब से लोगों को कुछ न कुछ बचत जरूर करनी चाहिए। धरती का स्वर्ग जिस कश्मीर को कहते हैं वहां कुछ महीने पहले की बाढ़ में जिंदगी ऐसी तबाह हुई थी कि अब तक पैरों पर खड़ी नहीं हो पाई है, और अब फिर बाढ़ है। ऐसे में बीमा और बचत ये ही लोगों के काम आ सकते हैं। ठोकर दूसरों लगती है, उसे देखकर बाकी लोग अगर सम्हल जाएं, तो उसी में समझदारी है। 

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