बेकसूरों की ऐसी थोक-हत्याओं के खिलाफ ही आतंक को जगह-जगह जमीन मिलती है

संपादकीय
9 अप्रैल 2015

आन्ध्र-तेलंगाना से दो दिनों में दो खबरें आई हैं। वहां जंगलों से चंदन की कटाई रोकने के लिए बनाए गए खास हथियारबंद दस्ते ने एक ही रात दो मुठभेड़ों में बीस लोगों को मार गिराया जिन पर लाल चंदन के पेड़ों की कटाई का आरोप था। पुलिस के इस दस्ते ने इसे आत्मरक्षा में की गई कार्रवाई कहा, हालांकि इस मुठभेड़ में किसी पुलिस की मौत की कोई खबर नहीं है। इस मामले में एक गवाह सामने आया है जिसका कहना है कि पुलिस ने एक बस में जा रहे तमिलनाडू के सात लोगों को बंदूक की नोंक पर उतारा और जंगल से मिली लाशों में ये लोग भी शामिल हैं। यह गवाह बस में एक महिला के बगल में बैठा था और शायद पुलिस ने उसे उसका पति समझकर नहीं उतारा। दूसरी घटना तेलंगाना की है जिसमें पुलिस ने सिमी के आतंकी होने के आरोप में गिरफ्तार लोगों को जेल से अदालत ले जाते हुए रास्ते में मार गिराया, और उन पर यह आरोप लगा है कि वे भागने की कोशिश कर रहे थे। इस मामले में सारे आरोपी हथकडिय़ों में जकड़े हुए थे, और ऐसे पांच लोगों के लिए साथ में सत्रह हथियारबंद पुलिस थी। हथकडिय़ों में पांच लोग सत्रह हथियारबंद पुलिस पर कैसे कब्जा कर सकते थे, यह सवाल उठता है। 
लेकिन दो ही दिन पहले छत्तीसगढ़ में एक न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट आई है जिसमें नक्सली होने के आरोप में एक नाबालिग लड़की मीना खलखो की मौत की जांच पर निष्कर्ष यह है कि उसे पुलिस ने मारा था। अब बरसों बाद आई इस जांच रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार ने उसी सीआईडी को यह जांच सौंपने का फैसला लिया है जिस पर मीना खलखो के परिवार पर मौत के वक्त दबाव डालने का आरोप चले आ रहा था। लेकिन यह अकेला ऐसा मामला नहीं है और नक्सल प्रभावित बस्तर में पुलिस की ज्यादती के दर्जनों मामले हर बरस सामने आते हैं, जिनकी जांच करना भी मीडिया के लिए मुश्किल होता है, और सरकार हर बार पुलिस या सुरक्षा बलों के साथ खड़ी हुई दिखती है। यही हाल कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में सुरक्षा बलों, सेना और पुलिस के हाथों हुई मुठभेड़-मौतों को लेकर चलते रहता है। 
दरअसल वर्दीधारी सुरक्षा बलों की ज्यादती और जुर्म के अधिकतर मामलों को सरकार में बैठे हुए निर्वाचित लोग इसलिए बर्दाश्त करते हैं क्योंकि वे खुद वर्दियों से गलत काम करवाते हैं। ऐसे में गलत काम इन दो तबकों के बीच एक मजबूत जोड़ का काम करते हैं, और आपसी जरूरत की खड़ी की गई ऐसी नौबत से इन दोनों के बीच गहरे रिश्ते चले चलते हैं। जिन निर्वाचित लोगों पर जनता के प्रति जवाबदेही का जिम्मा भी रहता है, वे भी जानते हैं कि बरसों तक चलने वाली एक जांच के बाद फिर बरसों तक चलने वाली दूसरी जांच के बाद कई-कई बरस चलने वाले एक-एक मुकदमे के चलते हुए जब तक गुनाह किसी के माथे चिपकता है, तब तक कई चुनाव निपट चुके रहते हैं, और जुर्म की मंजूरी देने वाली सरकारें, सत्तारूढ़ पार्टियां, या नेता बड़ा लंबा राजनीतिक सफर तय कर चुके रहते हैं। बरसों बाद या दशकों बाद आने वाले आखिरी फैसले तक हिंसा और जुर्म की यादें इतनी धुंधली हो चुकी रहती हैं कि उनका कोई मतलब नहीं रह जाता। 
इस नौबत के लिए हम एक बड़ी जवाबदेही उन संवैधानिक संस्थाओं की भी मानते हैं जिन्हें भारतीय लोकतंत्र में सरकार से परे जनता के हितों के लिए बनाया गया है। प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग या बाल कल्याण परिषद जैसे बहुत से संवैधानिक ढांचे हैं जिनसे उम्मीद की जाती है कि वे जनता पर होने वाले जुल्म और जुर्म पर नजर रखें, खुद होकर जांच करें, और सरकारी हिंसा को रोकने का काम करें। लेकिन इन कुर्सियों पर सत्ता अपने तोता-मैना बिठा-बिठाकर इनको सरकार का एक मातहत अमला बना देती है, और सुविधाओं,  वेतन-भत्तों, सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते ये लोग सरकारी हिंसा को अनदेखा करने या उसे बेकसूरी का सर्टिफिकेट देने से अधिक कुछ काम नहीं करते। केन्द्र और राज्य में एक पार्टी के मनोनीत लोगों को जब किसी दूसरी पार्टी के राज में हुई सरकारी हिंसा पर कार्रवाई का मौका मिलता है, तो मानो उनमें एकाएक जिम्मेदारी जाग उठती है।
कुल मिलाकर आज हम यह कहना चाहते हैं कि अगर सत्ता चलाने वाले निर्वाचित नेता अपनी गलत नीयत और वर्दियों के गलत इस्तेमाल के चक्कर में न रहें, तो वर्दियों की हिंसा जारी रहने की कोई वजह नहीं हो सकती। देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग वक्त पर खादी और खाकी की यह गिरोहबंदी बेकसूर और बेजुबान जिंदगियों को खत्म करने का काम करती है, और पिछले दो-तीन दिनों में जो मामले सामने आए हैं वे यह बताते हैं कि यह लोकतंत्र उन्हीं के लिए है जिनके पास अपने आपको, अपने-आपके जुर्म को बचाने की ताकत है, और दूसरों को मारने की भी। ऐसे लोकतंत्र और बेकसूरों की थोक में ऐसी हत्याओं के खिलाफ ही नक्सलियों को जगह-जगह जगह मिलती है।

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