नेताजी की जासूसी का नेहरू पर आरोप जांच और बहस के लायक

संपादकीय
10 अप्रैल 2015
आज सुबह से भारतीय मीडिया इस सनसनीखेज खबर से भरा हुआ है कि इंटेलीजेंस ब्यूरो की अब उजागर हुई फाइलों के मुताबिक नेहरू ने अपने पूरे कार्यकाल सुभाषचंद्र बोस और उनके परिवार की खुफिया निगरानी करवाई। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और नेताजी के बीच आजादी के बहुत पहले से कांग्रेस की राजनीतिक भीतर गहरे मतभेद रहे, और संगठन के भीतर उनका गहरा मुकाबला भी रहा। लोग गांधी को इस बात की तोहमत भी देते आए हैं कि उन्होंने कांग्रेस की लीडरशिप के मामले में बोस को किनारे करके नेहरू को गलत तरीके से आगे बढ़ाया। खैर, वह सब पुरानी बातें हैं जिनके बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है, लेकिन जो नई बात अभी सामने आई है, वह कुछ लोगों को चांैका सकती है, और अधिकतर लोगों को पहले से चली आ रही उनकी धारणा मजबूत करने का एक मौका देती है कि नेहरू ने बोस के साथ इंसाफ नहीं किया। 
भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास को देखें, तो उसमें कई अलग-अलग विचारधाराएं काम करती थीं। गांधी ने भगत सिंह की फांसी को रोकने के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि उन्होंने साफ-साफ मना कर दिया था कि अंग्रेज सरकार पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके वे इन क्रांतिकारियों की फांसी रूकवाने की कोशिश करें। इसी तरह सुभाषचंद्र बोस का आजादी पाने का तरीका अलग था, और उसके लिए वे जर्मनी जाकर हिटलर से भी मिले थे, और वह एक लंबा इतिहास है। बाद में जब नेताजी की एक विमान दुर्घटना में मौत की खबर आई, तो लंबे समय तक यह विवाद चलते रहा कि वे उस हादसे में सचमुच गुजरे थे, या कि वे जिंदा हैं, और किसी वजह से लोगों से दूर हैं। आजादी के वक्त से लेकर अब तक यह विवाद खत्म ही नहीं होता है। 
लेकिन इतिहास पर लिखना आज का मकसद नहीं है। सरकार के काम करने के तरीके कैसे-कैसे हो सकते हैं, इस पर यह ताजा खबर सोचने को मजबूर करती है। केन्द्र सरकार हो, या कि राज्य सरकारें, खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल करके राजनीतिक जासूसी तो आम बात है ही, निजी जिंदगी में तांक-झांक भी कोई नई बात नहीं है। सुभाषचंद्र बोस का मामला आजादी के तुरंत बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक संवेदनशील मामला था, क्योंकि सोवियत संघ से नेहरू का घरोबा, और हिटलर से बाकी तमाम दुनिया की नफरत के चलते हुए न सिर्फ कांग्रेस की राजनीति के लिए, बल्कि भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के लिए भी नेताजी के मामले को सुलझाना या समझना जरूरी रहा होगा। अब नेहरू की जो तस्वीर पिछली आधी सदी के इतिहास में बनी है या बनाई गई है उसमें एक तरफ उनकी महानता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके ऊंचे कद की बात है, और दूसरी तरफ उनसे नफरत करने वाले लोग उन दो-चार तस्वीरों से अब तक चिपके हुए हैं जिसमें वे किसी महिला के साथ सिगरेट पीते दिख रहे हैं, या जिन बातों से उनके एडविना माउंटबेटन के साथ अंतरंग संबंध स्थापित होते हैं। 
हमारा मानना है कि नेहरू वैसे ही इंसान थे जैसे कि गांधी थे, या सुभाष बाबू थे, या कि नेहरू के आलोचक हैं। इतिहास हर महान की कमजोरियों को भी दर्ज करता है, और जब सरकारी गोपनीय कागजात बाहर आते हैं, तो किसी की भी महानता या कामयाबी-नाकामयाबी के मूल्यांकन का एक मौका मिलता है। हम इसे किसी भी तरह नेहरू का चरित्रहनन नहीं मानते, और इस तरह का विश्लेषण हर बड़े और महान व्यक्ति का होना ही चाहिए। सार्वजनिक जीवन में एवरेस्ट जैसी ऊंचाई पर पहुंचने वाले लोग अपने सार्वजनिक कामकाज को लेकर किसी तरह की गोपनीयता का दावा नहीं कर सकते। देश का कानून जब तक किसी बात को गोपनीय बनाए रखना जरूरी समझता है, उसके तुरंत बाद ऐसे तमाम दस्तावेज लेकर इतिहास के पुनर्लेखन का काम होना चाहिए, क्योंकि इतिहास लिखना कभी इतिहास नहीं होता, नए तथ्यों के सामने आने के बाद इतिहास भी फिर से लिखा जाता है, लिखा भी जाना चाहिए। 
सरकार नेहरू चलाए, मोदी चलाए, या किसी राज्य का मुख्यमंत्री चलाए, सरकार चलाते हुए निगरानी के जो अधिकार रहते हैं, शायद ही कोई उनका लालच छोड़ पाते हों। यही नतीजा है कि वक्त गुजर जाने के बाद जासूसी और निगरानी की ऐसी बातें साबित होती हैं, और इतिहास में दर्ज लोगों की महानता की लंबाई-चौड़ाई के नाप को फिर से दर्ज किया जाता है। नेहरू ने अगर जासूसी करवाई होगी, तो वह सरकार की एक आम बात रही होगी, और आज भी है। वह जायज थी, या नाजायज थी, इस पर बहस हो सकती है। और अगर ये ताजा दस्तावेज गलत हैं, तो उन पर भी भारत के सार्वजनिक जीवन में जांच-परख हो सकती है, और बहस भी हो सकती है। हम इसे एक अच्छी बात मानते हैं कि जो बातें अब राष्ट्रीय सुरक्षा के हिसाब से नाजुक नहीं रह गई हैं, वे कानूनी रूप से उजागर हों, और इतिहास का एक बार फिर से मूल्यांकन हो। दुनिया के जो विकसित लोकतंत्र हैं, उनमें ऐसी पारदर्शिता का सम्मान होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें