किसी और को लगी ठोकर से बाकी को सबक लेना चाहिए

संपादकीय
25 अप्रैल 2015

नेपाल से शुरू हुआ भूकम्प भारत के दर्जन भर राज्यों तक फैल गया और कुछ घंटों से बस भूकम्प ही चर्चा में है। रिक्टर पैमाने पर भूकम्प खासा तेज था, लेकिन तबाही के अब तक आने वाले आंकड़े राहत के हैं, और अधिक मौतें अब तक खबरों में नहीं आई हैं। भारत पड़ोसी नेपाल की मदद के लिए यहां से सुरक्षा बलों, राहत कर्मियों को भेजने की बात कर रहा है। लेकिन इससे बहुत अधिक तबाही वाले भूकम्प भारत खुद झेल चुका है, और आने वाली जिंदगी न सिर्फ भारत के लिए बल्कि और देशों के लिए भी कई किस्म की कुदरती तबाही लेकर आ सकती है। नेपाल से खासे दूर बसे हुए छत्तीसगढ़ में भी मंत्रालय सहित प्रदेश के बहुत से शहरों में बहुत सी इमारतें हिलीं, और लोग बाहर निकले। 
इस मौके पर हम अपनी एक पुरानी राय दुहरा रहे हैं कि ऐसे कुदरती हादसों से लेकर आधुनिक जीवन की टेक्नालॉजी के हादसों तक के लिए हर देश-प्रदेश, और हर शहर के कैसे तैयार रहना चाहिए। वैसे तो आपदा प्रबंधन की योजना केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक हर किसी के एजेंडा में है, लेकिन हकीकत यह है कि बुरी नौबतों को सोचकर अच्छी-खासी तैयारी की योजना भी कागज पर नहीं है। आज जब सड़कों का आल-जाल चारों तरफ फैला हुआ है, और हिन्दुस्तान का तकरीबन हर हिस्सा किसी न किसी किस्म की संचार तकनीक की पहुंच में है, और बचाव-राहत की कई किस्म की क्षमता चारों तरफ बिखरी हुई है, तो सरकारों को इनका एक ऐसा इंटरएक्टिव नक्शा बनाना चाहिए जिससे कि बचाव-राहत की जरूरत और उसकी क्षमता का अच्छे से अच्छा मेल कराया जा सके। 
हमारी निजी जानकारी यह है कि गांव-गांव तक फैली हुई तरह-तरह की मशीनों वाली गाडिय़ों, कस्बों तक फैले हुए अस्पतालों, और चारों तरफ मौजूद रक्तदानदाता, इन सबको लेकर ऐसी कोई योजना सरकार की नहीं है जिससे कि हादसे की जगह के सबसे करीब के साधनों को कम्प्यूटर की एक क्लिक से देख लिया जाए, और एक एसएमएस से किसी इलाके में खबर चली जाए, और अलग-अलग क्षमताओं के तबकों के समूह बनाकर उनसे मदद मांगी जाए। आज ऐसी तमाम सहूलियत मौजूद होते हुए भी आपदा प्रबंधन की योजनाओं से न तो जनता को जोड़ा गया है, और न ही जनता की ताकत, मदद की उसकी संभावना का नक्शा बनाया गया है, उसे ऐसे मौकों के लिए तैयार किया गया है। 
न सिर्फ भूकम्प, बल्कि देश के कई इलाकों में समुद्री तूफान आते हैं, केदारनाथ की पिछली बरस की तबाही सबकी देखी हुई है, कश्मीर में बाढ़ सबकी देखी हुई है, और असम की बाढ़ से लेकर भुज के भूकम्प तक का इतिहास लोगों को याद है। ऐसे में देश भर से अगर प्रशिक्षित और ताकतवर, समर्पित लोगों को किसी बचाव नेटवर्क से जोड़ा जा सके, और बोली, खूबी, के आधार पर देश भर से लोगों को जरूरत के मुताबिक किसी प्रदेश में भेजा जा सके, तो तबाही और मौतों को कुछ कम किया जा सकेगा। आज मोटे तौर पर केन्द्र और राज्य की सरकारें अपने खुद के बचाव-राहत कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मचारियों तक अपनी ताकत सीमित रखती हैं। जबकि देश भर की जनता के बीच मदद करने का हौसला रखने वाले करोड़ों लोग हैं, और उन सबको एक राष्ट्रीय और प्रादेशिक नेटवर्क से जोडऩे की जरूरत है। 
देश के हर हिस्से में मौजूद बचाव और इलाज, मदद और राहत की क्षमता का नक्शा बनना चाहिए, और जिस तरह गूगल के अंतरिक्ष से उपग्रह से बनाए गए नक्शे में छोटे से छोटे हिस्से को देखा जा सकता है, उसी तरह का नक्शा राहत-बचाव के लिए बनना चाहिए, जिससे कि कोई भी पल भर में देख सके कि सबसे करीब की क्रेन कहां है, उसके मालिक या ड्राइवर के नाम-नंबर क्या हैं, सबसे करीब किस सुविधा वाला कौन सा अस्पताल है, आसपास रक्तदाता कौन हैं, वैकल्पिक सड़कें कौन सी हैं, इस किस्म की सैकड़ों बातों की तैयारी जो प्रदेश न करे, उसका आपदा प्रबंधन महज एक सरकारी खानापूरी रहेगा। आज भूकम्प कहीं और आया है, तो वहां मदद करने के साथ-साथ भारत के प्रदेशों को अपनी खुद की मदद की योजना बहुत बारीक बातों तक बनाना चाहिए। 

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