प्राकृतिक संसाधनों के मुद्दे पर पाकिस्तान में थोक में कत्ल...

संपादकीय
11 अप्रैल 2015
पाकिस्तान में हिंसा से गुजर रहे बलूचिस्तान प्रांत में आतंकियों ने एक बांध पर काम कर रहे मजदूरों की बस्ती पर हमला किया जिसमें 20 पंजाबी और सिंधी मजदूर मारे गए। सोए हुए मजदूरों पर अंधाधुंध गोलीबारी की यह वारदात अपने किस्म की नई नहीं है, इसके पहले भी बलूच आतंकी हमले करते रहे हैं क्योंकि उनका यह मानना है कि पंजाब प्रांत के ताकतवर लोग बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण करते हैं। भारत से बहुत दूर और एक अलग किस्म की यह हिंसा एक दूसरी तरफ ध्यान खींचती है कि भारत में भी खदानों वाले जो प्रदेश हैं उनमें से आधा दर्जन में नक्सल हिंसा के पीछे एक तर्क यह भी है कि वहां पर खदानों और जंगलों, जमीन और पानी का शोषण हो रहा है, और कारखानेदार और खदान चलाने वाले लोग आदिवासियों का, ग्रामीणों का शोषण करते हैं। सरकार के साथ लगातार एक टकराव जंगल और सड़कों से लेकर अदालतों तक चले आ रहा है। 
इस किस्म के टकराव पूरी दुनिया में प्राकृतिक साधनों से संपन्न देश-प्रदेशों में बिखरे हुए हैं और धरती से परे की कल्पना वाली हॉलीवुड की फिल्म अवतार में भी यही कहानी थी कि किस तरह इस धरती के लोग दूसरे ग्रह पर जाकर वहां के प्राकृतिक साधनों के लिए वहां की जनता के साथ हिंसा करते हैं। भारत में भी बनी एक फिल्म सरकार राज में यही कहानी थी कि सरकार और कारोबार मिलकर किस तरह लोगों को बेदखल करते हैं, और खदान-कारखानों का काम करते हैं। और ऐसी बातें महज फिल्मों में हों ऐसा भी नहीं है, असल जिंदगी में भी यही देखने मिल रहा है, और इसलिए नक्सलियों से लेकर अन्ना हजारे तक, और कांग्रेस से लेकर आम आदमी पार्टी तक इन मुद्दों को लेकर सड़क पर हैं। यह एक अलग बात है कि कांग्रेस आज  विपक्ष में हाशिए पर होने की वजह से इस मुद्दे को उठा रही है वरना कल तक वह भी जमीनों और खदानों की बंदरबांट के धंधे में लगी हुई थी। 
आज जिस रफ्तार से भारत जैसे लोकतंत्र में आर्थिक विकास के नाम पर सारे प्राकृतिक संसाधनों को रफ्तार से बांटा जा रहा है, वैसा आर्थिक विकास आम जनता की जिंदगी में न तो उस रफ्तार से जरूरी है, और न ही उसकी जिंदगी में वैसा कोई विकास आने जा रहा है। विकास के सकल राष्ट्रीय उत्पादन के आंकड़े, प्रति व्यक्ति औसत आय के आंकड़े बुरी तरह फर्जी तस्वीर पेश करते हैं। देश के बड़े कुछ सौ उद्योगपतियों की कमाई के आंकड़ों को गरीबी के रेखा के नीचे के लोगों की कमाई के साथ जोड़कर जब एक औसत कमाई बताई जाती है, तो वह एक कद्दू और एक अंगूर की मिलवा सब्जी जैसी होती है। आर्थिक विकास की जरूरत और आंकड़ों को दिखा-दिखाकर देश की तमाम सरकारें रफ्तार से अपने कार्यकाल के चलते-चलते सब कुछ बांट देना चाहती हैं। एक वक्त रियासतें और जमींदारियां हुआ करती थीं, आज केन्द्र और राज्य सरकारें कारखानेदारों को नए जमींदार बनाने पर आमादा हैं, और ऐसे में एक सामाजिक तनाव, टकराव और हिंसा के बढऩे का खतरा भी है। 
पाकिस्तान के बलूचिस्तान से लेकर छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, और बिहार में जिस तरह से हिंसा की वारदातें होती हैं, वे अलग-अलग वजहों से भी हो सकती हैं, लेकिन उनके बीच प्राकृतिक साधनों के तेज रफ्तार शोषण की बात एक सरीखी दिख रही है। उन दोनों मिसालों में बहुत से बातें अलग भी होंगी, और दो उदाहरणों की तुलना करना एक खतरनाक काम होता है, क्योंकि उनके बीच फर्क अधिक बड़ा हो सकता है और समानता छोटी। लेकिन फिर भी दुनिया की तस्वीर को देखने के लिए हमको किसी एक मिसाल से ऊपर उठकर सोचना होता है, और बलूचिस्तान में जो हुआ है, उससे यह याद आता है कि छत्तीसगढ़ में कुछ-कुछ दिनों में कारोबार या सरकार के काम में लगे हुए लोगों को नक्सली उठा ले जाते हैं, या मारते हैं। 

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