ऐसा वीआईपी दर्जा किस काम का जिसमें और खतरे में पड़ते रहें...

संपादकीय
8 अप्रैल 2015

केन्द्रीय विमान मंत्री ने एक साधारण बातचीत में यह कहकर सनसनी फैला दी कि वे अपनी जेब में माचिस लेकर विमान में आते-जाते हैं, लेकिन मंत्री होने की वजह से अब उनकी तलाशी नहीं होती। उन्होंने अपने आपको चेन स्मोकर बताते हुए कहा है कि वे इसी वजह से जेब में हमेशा माचिस रखते हैं। साथ ही उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि माचिस से कोई विमान अपहरण तो कर नहीं सकता। 
अभी देश रॉबर्ट वाड्रा के खास सुरक्षा दर्जे से उबर भी नहीं पाया है, और पूरे देश में वीआईपी शब्द बुरी तरह से बदनाम हो रहा है, और उस बीच में एक केन्द्रीय मंत्री का यह कहना बहुत किस्म के सवाल उठाता है। रॉबर्ट वाड्रा के लिए पूरे देश के विमानतलों पर यह लिखा हुआ था कि जब भी वे प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ सफर करेंगे, उनकी सुरक्षा जांच नहीं होगी। लोग विमानतलों पर लगातार देखते हैं कि बड़े नेताओं और बड़े अफसरों को सुरक्षा जांच से किस तरह अघोषित छूट भी दे दी जाती है। और छूट का दर्जा प्राप्त लोग भी बहुत से हैं, सरकारी और संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए दर्जनों लोगों को सुरक्षा जांच से घोषित छूट मिली हुई है, और इन ओहदों वाले लोग अलग-अलग वक्त पर जुर्म करते भी पकड़ाए हैं, जेल भी गए हैं, और आज भी कटघरों में हैं। ऐसे में इनको सुरक्षा जांच से छूट देने पर कुछ सवाल खड़े होते हैं कि सार्वजनिक विमान में बाकी मुसाफिरों की जिंदगी भी दांव पर लगी रहती है, और किसी को भी ऐसे में छूट की इजाजत क्यों मिलनी चाहिए? दूसरी बात यह कि अगर ऐसे बड़े लोग सार्वजनिक विमानों से चलने के बजाय सरकारी विमानों से चलते हैं, तो भी वह तो जनता के पैसों का ही विमान होता है, और सुरक्षा जांच छूट के चक्कर में उनके साथ कोई ऐसा सामान भी रख सकते हैं जिससे विमान को नुकसान पहुंचाया जा सके। किसी को भी न तो जनता के साथ सफर करते हुए, न ही जनता के पैसों के विमान पर सफर करते हुए ऐसी कोई छूट दी जा सकती है। और ऐसी छूट सीधे-सीधे आम जनता के हक के खिलाफ है। 
दूसरी बात यह कि भारत की वीआईपी संस्कृति अंग्रेजों के वक्त के सामंती इंतजाम का बचा हुआ कचरा है। अक्सर ऐसे लोग किसी उड़ान में लेट पहुंचते हैं, रेल्वे स्टेशनों पर इनके लिए प्लेटफॉर्म बदले जाते हैं, सड़कों पर इनके लिए ट्रैफिक को रोका जाता है, सार्वजनिक जगहों पर इनकी गाडिय़ों के काफिले रोककर बाकी लोगों के लिए दिक्कतें खड़ी की जाती हैं। इस देश में और इसके प्रदेशों में इस पर रोक इसलिए नहीं लग पा रही है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी ऐसी ही तमाम वीआईपी सुविधाओं का इस्तेमाल करते हैं, और यह बात भारतीय संविधान के समानता के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है। इसके खिलाफ पूरे देश में एक ऐसे जनमत को खड़े करने की जरूरत है जिससे कि वोटों के मोहताज नेता भी हिल जाएं, और अदालतों पर भी जनमत का असर हो। 

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