मौत के सौदागरों के मददगार सांसद

31 मार्च 2015
संपादकीय
भाजपा सांसद दिलीप गांधी की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने सरकार से 'गंभीरÓ मांग की है कि वह तंबाकू के पैकेट पर तस्वीरों में छपी चेतावनी का आकार 40 प्रतिशत से बढ़ाकार 85 प्रतिशत करने का अपना प्रस्ताव रोक ले। इस बारे में भाजपा सांसद का तर्क है कि सिगरेट से कैंसर का रिश्ता जोडऩे वाले सारे शोध दूसरे देशों में हुए हैं, और भारत में कोई भी नहीं। इस समिति ने सरकार से कहा है कि यह साबित करने वाला कोई भारतीय अनुसंधान नहीं है कि तंबाकू के सेवन से कैंसर होता है। कैंसर सिर्फ तंबाकू के कारण नहीं होता है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में  अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चार करोड़ लोगों की जीविका तेंदूपत्ता से बीड़ी बनाने से चलती है। 
देश में जो कारोबारी तबके सबसे अधिक दबदबा सरकार पर लगातार रखते हैं, उनमें सिगरेट-तंबाकू उद्योग सबसे अधिक जानलेवा है। हर बार तंबाकू मजदूरों की रोजी-रोटी गिनाई जाती है, और तंबाकू का इस्तेमाल हटाने की कोशिशों पर पानी फेर दिया जाता है। जबकि ऐसे मजदूरों की कमाई से सैकड़ों गुना अधिक खर्च केंद्र और राज्य सरकारों को तंबाकू के शिकार गरीबों के इलाज पर करना पड़ता है। और इस खर्च से भी सबकी जान बच जाती है, ऐसा नहीं है। तंबाकू से होने वाले नुकसान की भरपाई इलाज से हो ही नहीं पाती, और दूसरी तरफ इसकी वजह से आसपास के लोगों को भी कहीं धुआं झेलना पड़ता है, तो कहीं बच्चों पर इसका बुरा असर पड़ता है। यह सिलसिला पूरी तरह थमना चाहिए, और महज जागरूकता से लोगों का तंबाकू छूटने वाला नहीं है, इसके लिए कड़े कानून, कड़े अमल, और आक्रामक-असरदार प्रचार सबकी जरूरत है। 
भाजपा सांसद का यह कहना अपने-आपमें कुछ हंसी की बात भी है कि सिगरेट से कैंसर के रिश्ते पर शोध कार्य भारत में कुछ भी नहीं हुआ है। ऐसा कहकर वे अपने ही कई साथियों को निराश कर रहे हैं, जिनका मानना है कि हर मामले में पहला वैज्ञानिक शोध भारत में ही हुआ है। अब हजारों बरस से भारत में धूम्रपान चले आ रहा है, और अब तक इस पर यहां शोध कैसे नहीं हुआ था, यह बात वैदिक-विज्ञान के जानकारों से पूछनी चाहिए। दूसरी बात यह कि चिकित्सा विज्ञान की कोई शोध अगर दूसरे देशों में ही हुई है, और उसका कोई इस्तेमाल तब तक भारत में नहीं होना चाहिए, जब तक कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में भी रिसर्च न हो जाए, तो फिर भारत को आज की चिकित्सा की तकरीबन हर मशीन को, और हर ऐलोपैथिक दवाई को देश-निकाला दे देना पड़ेगा। यह एक बहुत ही खोखला तर्क है कि भारत में कोई शोध जब सिगरेट और कैंसर का रिश्ता कायम करेगा, तब ही भारत को ऐसे खतरे को मानने की जरूरत होगी। यह एक बहुत ही अवैज्ञानिक सोच है, और यह एक कारोबार को मौत बेचने की छूट देकर जनता को मौत खरीदने के लिए बढ़ावा देने जैसी बात है। 
हम तंबाकू से जुड़े रोजगार का हवाला देकर मौत बढ़ाने के खिलाफ हैं। यह केंद्र और राज्य सरकारों की मिली-जुली और अलग-अलग जिम्मेदारी है कि जानलेवा खेती और जानलेवा कारोबार को खत्म करके उनमें लगे हुए मजदूरों के लिए किसी और रोजगार का इंतजाम करे। यह काम बहुत मुश्किल और नामुमकिन नहीं है, और चौथाई सदी से चले आ रहा यह तर्क अब और जिंदगियां खाने के लिए नहीं बढ़ाना चाहिए।
भारत में हर साल करीब 9 लाख लोग तंबाकू से पैदा बीमारियों के कारण अपनी जान गंवा देते हैं। और यह संख्या चीन के बाद दुनिया में दूसरे नंबर पर है। जानकारों का मानना है कि इस दशक के अंत तक यह आंकड़ा 15 लाख तक पहुंच जाएगा। और भारत की इस संसदीय समिति को अगर यह खतरनाक नहीं लग रहा है, और उसे लग रहा है कि कोई भारतीय शोध इसे साबित करे, तब तक सिगरेट के पैकेटों पर खतरनाक तस्वीरों की जरूरत नहीं है, तो जनता ऐसे रूख के पीछे कारोबार से दोस्ती का शक जरूर करेगी।

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