सोशल मीडिया पर साजिश के तहत फैलते झूठ उजागर करें

संपादकीय
28 अप्रैल 2015
सोशल मीडिया की मेहरबानी से अब हर इंसान के लिए यह आसान हो गया है कि वे झूठ फैला सकें। इसके लिए सिर्फ इंटरनेट तक खुद की या उधारी की पहुंच, कम्प्यूटर या मोबाइल फोन, और दिल में बदनीयत होना काफी है। इसकी ताजा मिसाल है गुजरात भूकम्प के वक्त की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की मदद की तस्वीरों को आज नेपाल के राहत कार्य के जिक्र के साथ दुबारा पोस्ट करना, और यह लिखना कि संघ के बीस हजार स्वयं सेवक नेपाल पहुंच रहे हैं। खुद आरएसएस ने इस जानकारी को गलत बताया और कहा कि ये तस्वीरें पुरानी हैं। लेकिन इस बीच झांसे में आकर भाजपा के ही कुछ बड़े नेताओं ने इस झूठ को आगे बढ़ा दिया कि इतने स्वयं सेवक नेपाल जा रहे हैं। आरएसएस ने तो तुरंत ही उसके बारे में फैलाए झूठ को उजागर कर दिया, लेकिन बहुत से आम लोग ऐसे रहते हैं जो कि यह जानते भी नहीं कि उनके बारे में फैलाया गया झूठ कहां-कहां तक पहुंचा है, और उसे कैसे दुरूस्त किया जा सकता है। 
लोगों को याद होगा कि दो बरस पहले जब उत्तराखंड में कुदरत की मार हुई थी, और दस-बीस हजार लोग मारे गए थे, तब सोशल मीडिया पर एक बात को फैलाया गया था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसा दावा किया है कि वे अपने विमान और गाडिय़ों के काफिले लेकर देहरादून पहुंचे थे और दसियों हजार गुजरातियों को वहां से निकाल ले गए थे। इंटरनेट पर बारीकी से जांच करने पर आसानी से यह पता लग जाता था कि ऐसा कोई दावा मोदी ने नहीं किया था, बल्कि किसी पत्रकार ने किसी लेख में ऐसी बात लिखी थी, और उसी बात को मोदी के दावे की शक्ल में पहले फैलाया गया, और फिर उसकी निंदा की गई। आज कम्प्यूटर पर तस्वीरों से छेडख़ानी करना इतना आसान हो चुका है कि कोई भी तस्वीर बनाकर पहले किसी के दावे की तरह उसके समर्थन में लगती हुई फैलाई जाए, और फिर उसका एक साजिश के तहत बदनाम करने के लिए इस्तेमाल किया जाए कि किसी ने ऐसा दावा किया था। पहले एक झूठ, और फिर उस झूठ को झूठ बताते हुए दूसरा झूठ। 
आज आम लोगों को भी सावधान रहने की जरूरत है। इस अखबार के नंबरों पर हमें बहुत से समझदार लोगों के भी संदेश मिले कि अमरीकी अंतरिक्ष संस्था नासा ने यह भविष्यवाणी की है कि रात कितने बजे दुबारा भूकम्प आएगा। लोग झूठ और अफवाह को तुरंत आगे बढ़ा देते हैं, बिना यह सोचे कि उससे कितना नुकसान हो सकता है। और झूठ को विश्वसनीय बनाने के लिए बड़ी-बड़ी संस्थाओं और वैज्ञानिक संगठनों का नाम भी जोड़ दिया जाता है। भारतीयों को याद होगा कि इंटरनेट और टीवी के आने के पहले यहां पर कोई अफवाह फैलाने के लिए रेडियो बीबीसी के नाम का इस्तेमाल किया जाता था कि बीबीसी ने ऐसा कहा है। उस रेडियो की विश्वसनीयता इतनी थी कि वह अफवाहबाजों और साजिशबाजों के बड़े काम आती थी। लोगों ने गणेश को दूध पिलाने के लिए भी बीबीसी के नाम का इस्तेमाल किया था। 
सोशल मीडिया पर लोगों के किए हुए गलत काम को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों कानून और पुलिस के हाथ कुछ बांधे हैं। लेकिन ऐसे में समाज और लोगों पर यह जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे अपने पास आने वाली अफवाहों को पहले जांच-परख लें, और सही मिलने पर ही, जरूरी होने पर ही आगे बढ़ाएं। लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि जब वे किसी झूठ को आगे बढ़ाते हैं, तो वे एक जुर्म में हिस्सेदार तो हो ही जाते हैं, वे अपनी विश्वसनीयता भी खो बैठते हैं। आज किसी को बदनाम करना हो तो उसके नाम से बड़े-बड़े दावों को प्रचारित कर दिया जाए, और फिर उसे बदनाम किया जाए कि वह अपने बारे में झूठे दावे फैलाता है। आज सोशल मीडिया पर ऐसे जिम्मेदार और जागरूक लोगों की जरूरत है जो कि बदनीयत से फैलाए जाते ऐसे झूठ का खंडन भी करते चलें, और हकीकत भी बताते चलें, ताकि लोगों में जिम्मेदारी लौट सके। 

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