नक्सल हिंसा, बातचीत के बिना लोकतंत्र में कोई रास्ता नहीं

संपादकीय 
14 अप्रैल, 2015 

छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक बार फिर जिस बड़े पैमाने पर तीन-चार दिनों में ही नक्सल वारदातें हुईं हैं, उनसे एक बार फिर यह मुद्दा लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। आमतौर पर खबरों में हिंसा के आंकड़ों और तस्वीरों के अलावा इतना भर आ पाता है कि खुफिया एजेंसियों की नाकामी कहां रही, और केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों के बीच तालमेल की कमी कहां रही। लेकिन दशकों से चले आ रहे इस नक्सल मोर्चे को लेकर कई बातों पर अब चर्चा बंद सरीखी हो गई है, और लोगों को अब यह एक पुलिसिया समस्या लगने लगी है। लेकिन बस्तर और नक्सल समस्या को जानने वाले लोग इस बुनियादी खामी को आसानी से समझते हैं, कि एक राजनीतिक चर्चा के बिना इसे खत्म करना नामुमकिन चाहे न हो, खासा मुश्किल जरूर होगा, और अभी तो इन दशकों में नक्सल हिंसा पर काबू के कोई आसार पैदा होते दिख नहीं रहे हैं। 
दरअसल राजधानियों से दूर जंगलों में इतने छोटे-छोटे सिपाहियों की मौतें होती हैं कि मानो शतरंज की बिसात पर प्यादे शहीद हो रहे हों। और शतरंज के खेल में आखिरी तक बचने वाले बड़े लोग बेअसर रह रहे हों। ऐसे में मुठभेड़, हत्या, शहादत, श्रद्धांजलि का सिलसिला ऐसे चले आ रहा है कि शहरों में महफूज रहने वाले लोग इन खबरों में आंकड़ों को देखकर बाकी बातों को छोड़ ही देते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि नौकरी के लिए बेबस लोग वर्दी पहनकर, बंदूक लेकर, केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों में शामिल होकर ऐसे मोर्चों पर चले तो जाते हैं, लेकिन वह जिंदा रहने की बेबसी अधिक होती है। और हर कुछ दिनों में वर्दियां लहूलुहान होती हैं, और केंद्रीय सुरक्षा बलों के ताबूत देश के कई राज्यों तक चले जाते हैं। 
हम नक्सल प्रभावित राज्यों और केंद्र सरकार के ऐसे रूख को सही नहीं मानते हैं जो कि किसी दीर्घकालीन समाधान को सोचे बिना रोज के रोज मोर्चे तक सीमित सोच वाला है। सरकारों को यह सोचना होगा कि राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक शोषण की वजह से उपजे हुए नक्सलवाद पर सरकार इन दशकों में कहां पहुंच पाई है? और दूसरी दिक्कत यह भी है कि जब सरकारी सुरक्षा कर्मचारी बहुत लंबे अर्से तक ऐसे इलाकों में मौत तले तैनात रहते हैं, तो कहीं वे आत्महत्या करते हैं, तो कहीं वे हत्या करते हैं। स्थानीय जनता के साथ उनके रिश्ते खराब होते चलते हैं, और मानवाधिकार को कुचलना उनके लिए कोई गंभीर बात नहीं रह जाती। यह सामाजिक जुल्म लंबा नुकसान कर रहा है, और सरकार के साथ जनता के रिश्ते अच्छे होना तो दूर रहा, खाई बढ़ती जा रही है। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को बंदूकों के मुकाबले बंदूकें तैनात करने के बजाए राजनीतिक बातचीत से नक्सल हिंसा खत्म करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बंदूकों का काम खासा महंगा है, और इसने हर बरस सैकड़ों जिंदगियां ली ही हैं, कोई इलाज पैदा नहीं किया है। हमारा साफ मानना है कि बातचीत के बिना लोकतंत्र में कोई आसान रास्ता नहीं है। 

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