कायर संसद-अदालत, और कायर समाज के चलते समलैंगिकों को बस मौत

संपादकीय
20 अप्रैल 15

कल दिल्ली में एम्स की एक महिला डॉक्टर की खुदकुशी की खबर आई। उसकी बड़ी तकलीफ यह थी कि उसका डॉक्टर पति समलैंगिक था। उसने बहुत खुलासे से अपने फेसबुक पेज पर इसके बारे में लिखा और यह भी लिखा कि पति-पत्नी के बीच किस तरह कोई देह संबंध नहीं बन पाए थे। खुदकुशी की वजहों में उसने पति की बदसलूकी भी गिनाई, और ये तमाम बातें पोस्ट करने के बाद उसने जाकर एक होटल में कमरा लिया और हाथ की नसें काटकर जान दे दी। एक दूसरी खबर दो-चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ के महासमुंद से आई थी कि किस तरह वहां दो लड़कियों ने एक पहाड़ी से कूदकर जान दे दी, और उन्होंने अपने आपको साथ में बांध रखा था, वे आपस में शादी करना चाहती थीं, लेकिन घरवालों ने साथ जीने नहीं दिया, तो वे साथ मर गईं। 
भारत में समाज से लेकर सरकार तक, और सुप्रीम कोर्ट तक का नजरिया समलैंगिक लोगों के लिए बहुत ही दकियानूसी और अवैज्ञानिक हैं। समलैंगिकता को एक अपराध करार दिया गया है, और दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले बरस जो फैसला दिया था, उसे पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध ही मान लिया है। भारत का समाज बहुत सी दूसरी बातों की तरह समलैंगिकता को भी कभी पश्चिम से जोड़ लेता है, कभी यहां के हिन्दू आंदोलनकारी इसे एक ईसाई बुराई मान लेते हैं, और हमेशा ही इसे एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है। नतीजा यह होता है कि भारत में समलैंगिक जोड़ों की शादी तो मुमकिन है ही नहीं, उनका साथ रहना भी आसान नहीं होता है, और लोग उन्हें नीची निगाह से देखते हैं। 
आज जब पूरी दुनिया में वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो चुका है कि लोगों की यौन प्राथमिकताएं उनके जींस से चली आती हैं, और बहुत से लोगों के लिए यह मुमकिन या आसान नहीं होता कि वे इस प्राथमिकता को बदल सकें। हालांकि आज विज्ञान से अनजान कई धर्मान्ध और कट्टर नेता और मंत्री ऐसे बयान देते हैं कि समलैंगिक लोगों को सामान्य बनाने के लिए परामर्श केन्द्र खोले जाने चाहिए, और उनका इलाज किया जाना चाहिए। ऐसे में समाज में समलैंगिकों के लिए हिंसा कई तरह से सामने आती है। ऐसे जोड़ों या लोगों को लोग मकान किराए पर नहीं देते, काम पर नहीं रखते, और अधिकतर लोग उन्हें मानसिक बीमार, अस्वाभाविक, और अप्राकृतिक मानकर चलते हैं। अगर एक मोटे अंदाज को मानें, तो आबादी का पांच-सात फीसदी हिस्सा समलैंगिक होता है, और इतने लोगों को पूरी जिंदगी अगर अपनी पसंद और प्राथमिकता को छुपाकर एक मुखौटा लगाकर जीना पड़े, तो क्या होता होगा? और भारत में तो अधिकतर समलैंगिक लोगों को समाज की निगाहों से बचाने के लिए उनके मां-बाप शादी की तरफ धकेल भी देते हैं, जिससे जाहिर है कि उनके जीवनसाथी को भी यह बेमेल जीवन झेलना पड़ता है। 
भारत के सुप्रीम कोर्ट के सामने इस मामले पर फैसला देते हुए यह मौका आया था कि वह एक वैज्ञानिक और प्रगतिशील, सुधारवादी और साहसी नजरिया अपनाकर समलैंगिकता को जुर्म के दायरे से बाहर करता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जज जिस पीढ़ी के होते हैं, जिस समाज से आते हैं, जिस तरह की धारणाओं के साथ बड़े होकर यहां तक पहुंचते हैं, और देश-समाज की सोच का जो दबाव उन पर रहता है, उनके चलते सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता पर एक बहुत ही तंग और आदिम नजरिया सामने रखा। उसने दुनिया के विज्ञान के विश्लेषण और निष्कर्ष को पूरी तरह अनदेखा किया, और भारत के इस यौन-अल्पसंख्यक वर्ग के हकों को कुचल दिया। 
कोई भी देश अपनी महिलाओं की आधी आबादी को कुचलकर, देश के अल्पसख्यक तबकों को दहशत में रखकर, देश की आधी गरीब आबादी को आगे बढऩे के बराबरी के मौके न देकर, अपने समाज के यौन-अल्पसंख्यक तबकों को कुचलकर आगे नहीं बढ़ सकता। आज भारत की तरक्की के आंकड़े जिन लोगों को सुहाते हैं, उनको यह दिखाई नहीं पड़ता कि इस देश में धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग, यौन-प्राथमिकता, इन सबसे देश को आजाद करने के बाद उसकी तरक्की की संभावनाएं और कितनी अधिक होतीं। जब देश के अलग-अलग बहुत से तबके, करोड़ों लोग, अलग-अलग वजहों से समाज में दबे-सहमे रहते हैं, तो उनकी उत्पादकता देश को नहीं मिल पाती। समलैंगिकता के खिलाफ इस देश की बहुसंख्यक-आबादी का जो हिंसक रूख है, वह वैज्ञानिक सोच के अभाव से उपजा है। और आज भारत में तरह-तरह के साम्प्रदायिक और धर्मान्ध मुद्दों को उठाकर जिस तरह की अवैज्ञानिक सोच बढ़ाई जा रही है, उसके चलते समलैंगिकता के सामने छुपकर रहना, या जान दे देने का ही रास्ता बचा रहता है। देश के सबसे बड़े अस्पताल एम्स की एक डॉक्टर जिसने कि आत्महत्या कर ली, उसके सामने अपने समलैंगिक पति से अलग होने का रास्ता बचा था, लेकिन उसने आत्महत्या बेहतर समझी। यह समाज में महिला की कमजोर हालत का सुबूत है। 
सुप्रीम कोर्ट को समलैंगिकता के खिलाफ भारतीय कट्टरता को बढ़ावा देने के बजाय, जारी रखने के बजाय, नागरिक के बुनियादी हकों के तहत समलैंगिकता को एक बुनियादी हक मानना था, और इसके खिलाफ कानून को खारिज करना था। लेकिन ऐसा लगता है कि कायर संसद, कायर अदालत, और कायर समाज के चलते इस देश में समलैंगिक लोग कई दशक तक मर-मरकर ही जीने को मजबूर रहेंगे, या हौसला जुटाकर या हौसला खोकर जान देने को मजबूर होंगे। 

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