मोदी ने भारतीय मानवश्रम के बारे में जो कहा, वह हम लिखते आ रहे हैं...

16 अप्रैल 2015
संपादकीय
कनाडा गए हुए भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वहां के भारतवंशियों के बीच एक विशाल कार्यक्रम में कहा कि भारत की सबसे बड़ी निधि उसके युवा हैं और उनका लक्ष्य उन्हें रोजगार सृजित करने वालों के रूप में देखना है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, 80 करोड़ की युवा आबादी, 80 करोड़ सपने, 160 करोड़ मजबूत हाथ। ऐसा क्या है जो हम हासिल नहीं कर सकते, उन्होंने कहा कि वह युवाओं को रोजगार की तलाश करने वाले नहीं बल्कि रोजगार सृजित करने वाले लोगों के रूप में देखना चाहते हैं। उन्होंने भारत के लोगों के काम करने की अपार संभावना को गिनाते हुए कहा कि आज भारत को यह सर्वे करने की जरूरत है कि दुनिया के किस-किस देश में किस-किस हुनर वाले भारतीय के लिए काम की गुंजाइश निकलेगी। 
हमारे पाठकों को याद होगा कि हम हर बरस इस मुद्दे पर लिखते आए हैं कि किस तरह छत्तीसगढ़ और बाकी हिंदुस्तान को यह अध्ययन करवाना चाहिए कि भविष्य में कितने बरस बाद किस देश को किस हुनर के लोगों की जरूरत रहेगी, और भारत के लोगों को उस शून्य को भरने के लिए तैयार करना चाहिए, और हुनर के साथ-साथ विदेशी भाषा सिखानी चाहिए, और विदेशी संस्कृति-सभ्यता के तौर-तरीकों से वाकिफ भी करवाना चाहिए। हमारा हमेशा से यह मानना रहा है कि भारत की विशाल आबादी इस देश पर बोझ नहीं है, बल्कि इस देश की ताकत है, और इसे बोझ वे ही लोग मानते हैं जो कि सत्ता हांकते हुए भी इस ताकत के लिए योजना नहीं बना पाते। 
यहां पर हम कई महीनों पहले इसी मुद्दे पर लिखे गए अपने विचार फिर से दे रहे हैं। 
इस बारे में आंकड़े बताते हैं कि अगले पंद्रह बरस में भारत चीन की आबादी को पार कर दुनिया का सबसे अधिक लोगों वाला देश हो जाएगा। उस वक्त दोनों देशों की आबादी करीब एक अरब पैंतालीस करोड़ होगी, और उसके बाद भारत इससे आगे बढऩे लगेगा। एक दूसरा अंदाज बतलाता है कि 2060 तक जाकर भारत की आबादी बढऩा रूकेगा, और सन् 2100 तक आबादी में गिरावट आना शुरू होगी। लेकिन इसके पहले भारत करीब एक अरब पैंसठ करोड़ तक पहुंच जाएगा। 
महज आबादी के आंकड़े अपने आपमें आंकड़े होते हैं, और उनसे निकाला जाने वाला मतलब सोचा-समझा या अनजाना सफेद झूठ भी हो सकता है। एक खबर है कि भारत में तीस फीसदी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे है, और वह रोजाना 30-35 रूपये से कम पर जिंदा है। एक दूसरी खबर यह है कि इराक, यमन, अफगानिस्तान जैसे हिंसाग्रस्त देशों से हजारों हिन्दुस्तानियों को निकालकर वापिस भारत लाया जा रहा है, लेकिन वहां के रोजगार से उनको जो कमाई हो रही थी उसके चलते हजारों हिन्दुस्तानी गृहयुद्ध से गुजर रहे ऐसे देशों में भी रहना चाहते हैं। 
इन बातों को जोड़कर देखने की जरूरत इसलिए है कि हिन्दुस्तान की बढ़ती आबादी को जंगल की आग की तरह फैलते हुए खतरे बताने वाले लोगों को यह समझने की जरूरत है कि हिन्दुस्तानी गरीब की खपत क्या है। एक तिहाई आबादी जो रोज 30-35 रूपये पर जिंदा है, उसकी खपत सिर्फ अनाज, पानी, शायद जरा सी बिजली, और शायद महीने भर में सौ रूपये के सामान, बस इतनी ही है। इस एक तिहाई आबादी की कुल खपत को अगर देखें, तो यह देश की ऊपर की एक तिहाई आबादी की खपत के मुकाबले एक फीसदी भी नहीं है। ऊपर की यह एक तिहाई आबादी मकानों वाली है, कारों वाली है, एयरकंडीशनरों या एयरकूलरों वाली है, टीवी और कम्प्यूटर वाली है, फ्रिज और गैस वाली है, पेट्रोल, डीजल, बिजली खर्च करने वाली है, जरूरत से अधिक खाने वाली है, और फिर पसीना बहाने को बिजली खर्च करने वाली है। इस आबादी को पंप और टंकी से पानी मिलता है, इसके घर में लॉन, बगीचा, और बंगले हैं, नहानी में फौव्वारा है। इस एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत मुकाबले नीचे की एक तिहाई आबादी की प्रति व्यक्ति औसत खपत एक फीसदी भी नहीं है। 
न सिर्फ इराक, बल्कि खाड़ी के तमाम देशों, अमरीका और आस्ट्रेलिया, कनाडा और ब्रिटेन जैसे अनगिनत देशों में हिन्दुस्तानी मजदूर, कामगार, और खूबियों वाले विशेषज्ञ-जानकार जाकर काम कर रहे हैं, कमा रहे हैं, वापिस हिन्दुस्तान पैसे भेज रहे हैं। और दुनिया के देशों में जैसे-जैसे उनकी स्थानीय संपन्नता बढ़ती जा रही है, उनको मेहनत और मजदूरी वाले, कई बेहतर किस्मों वाले दूसरे कामगार भी लगते हैं, और यह बाकी गरीब देशों पर निर्भर करता है कि वे किस तरह अपने लोगों को सिखा-पढ़ाकर इन संपन्न देशों में काम के लायक बना सकते हैं। 
इस तरह भारत में अगर लोगों को दुनिया में मौजूद और बढ़ते हुए रोजगार के लिए तैयार किया जाता है, तो भारत के इंसानी बदन भारत की धरती पर बोझ नहीं रहेंगे, वे भारत की ताकत बनेंगे। इसलिए सबसे गरीब एक तिहाई आबादी की गरीबी को बढ़ती आबादी के बोझ का नतीजा बताने की यह साजिश इस देश की सत्ता ने सोच-समझकर बनाई है, क्योंकि इन गरीबों को देश के लिए उत्पादक बनाने की जिम्मेदारी को सत्ता पूरा नहीं कर पाई, और अब अपनी नालायकी को छुपाने के लिए वह आबादी को बोझ बता रही है। भारत की सामाजिक हकीकत बताती है कि गरीबों के बीच बच्चों की गिनती इसलिए भी अधिक रहती है कि उन्हें यह भरोसा नहीं रहता कि भूख, कुपोषण, और बीमारी के चलते उनके कितने बच्चे जिंदा बचेंगे। इसलिए भी गरीब परिवारों में बच्चे अधिक होते हैं। और आर्थिक हकीकत यह है कि जैसे-जैसे शिक्षा और संपन्नता बढ़ती हैं, वैसे-वैसे लोग परिवार छोटा रखने लगते हैं। इस तरह देश की आबादी को गरीब रखने के लिए जिम्मेदार सत्ता ही आबादी बढ़ाने के लिए जिम्मेदार है।
आज भी शायद विज्ञान और टेक्नालॉजी ने मिलकर भारत के गरीब इंसानों जितनी सस्ती और उत्पादक कोई मशीन नहीं बनाई है, जो 30-35 रूपये रोज की खपत में आठ घंटे रोज पसीना बहाए। इसलिए भारत की आबादी को बोझ मानने के पहले यहां की मानवशक्ति की संभावनाओं को टटोलने की जरूरत है, जो कि सामने खड़ी हुई हैं, और देश के योजनाकारों, और यहां की सत्ता हांकने वालों को चुनौती दे रही हैं कि  हिन्दुस्तानी जनता की ताकत और क्षमता का इस्तेमाल करें, बजाय उन्हें बोझ साबित करने के।  

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