नक्सलगढ़ से लोक सुराज की शुरुआत के साथ-साथ समाधान का लंबा सफर

विशेष संपादकीय
सुनील कुमार
छत्तीसगढ़ में जनता से संपर्क का सालाना अभियान इस बार लोक सुराज नाम से शुरू हुआ है। कल पहले ही दिन मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को राजनांदगांव और कवर्धा जिलों में कहीं जाना था, लेकिन उन्होंने अभूतपूर्व नक्सल हिंसा के लगातार तीसरे दिन अपना यह दौरा बस्तर के नक्सल प्रभावित नारायणपुर जिले से शुरू किया। अभी बस्तर में हालात जगह-जगह काबू के बाहर दिख रहे हैं, और नक्सली सुरक्षा बलों पर गंभीर हमले कर रहे हैं। ऐसे में डॉ. रमन सिंह को वहां न जाने की नसीहत सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों ने दी थी, लेकिन उन्होंने वहीं से दौरा शुरू किया। 
जिस बस्तर में लगातार नक्सल हमलों में जवान मारे जा रहे हैं, वहां अगर सरकार के बड़े लोग भी जाने से कतराएंगे, तो सुरक्षा बलों का हौसला और पस्त होगा। फिर यह बात अलग है कि बड़े लोगों का वहां जाना काफी नहीं है, और कोई असरदार-कामयाब रास्ता भी सोचना जरूरी है, लेकिन मोर्चों पर मुखिया के जाने का अलग असर होता है। इससे वर्दीधारी सरकारी बंदूकों की ताकत नहीं बढ़ती, लेकिन उनका हौसला बढ़ता है, और अभी बस्तर में इसकी कमी लगातार दिख रही है। 
लोगों को याद होगा कि अफगानिस्तान और इराक में जहां-जहां अमरीकी सेनाएं तैनात रहीं, वहां-वहां समय-समय पर अमरीकी विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, और अमरीकी राष्ट्रपति अचानक पहुंचते रहे हैं, और अपने लोगों का हौसला बढ़ाते रहे हैं। भारत में भी कारगिल जैसे कठिन मोर्चे पर भारतीय रक्षा मंत्री जाते रहे हैं। ऐसे दौरों का एक भावनात्मक असर होता है, और मौत के खतरे तले काम करने वाले सुरक्षाकर्मी कुछ उम्मीद पाते हैं। 
एक तरफ तो मुख्यमंत्री ने अचानक नक्सलगढ़ में जाना तय किया, पहुंचे, और दूसरी तरफ पिछले बरसों में उन्होंने लगातार नक्सलियों से बातचीत की पेशकश भी की है। उन्होंने विधानसभा के भीतर और विधानसभा के बाहर कई बार यह बात कही कि अगर नक्सली उनसे बातचीत करके हिंसा बंद कर सकते हैं, तो वे आधी रात भी जंगल में अकेले जाकर बातचीत को तैयार हैं। यह सारी स्थिति अब गेंद को नक्सलियों के पाले में डालती है, जिनके साथ शहरों के बहुत से पढ़े-लिखे और लिखने-पढऩे वाले लोग भी सैद्धांतिक रूप से मुद्दों पर जुड़े हुए हैं। यह पूरी नौबत अब नक्सलियों से बातचीत का रिश्ता रखने वाले उन अहिंसक लोगों पर भी एक दबाव बनाती है कि वे इस हिंसा का विरोध करें, और बातचीत का रास्ता बनाने में मदद करें। बस्तर में तीन दिनों की इस हिंसा को लेकर मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल ने भी इसकी कड़ी आलोचना करते हुए बयान जारी किया है। कुछ बरस पहले इस संगठन की नीति ऐसे बयानों की नहीं थी, लेकिन अब नक्सल हिंसा पर चुप रहना बहुत से मानवाधिकारवादियों को मुश्किल पडऩे लगा है, और लोग हिंसा पर उनके नजरिए को पूछने लगे हैं। 
नक्सलियों से किसी भी तरह का संपर्क रखने वाला लोगों में से जिनको लोकतंत्र पर भरोसा है, उन लोगों को अपने असर का इस्तेमाल नक्सलियों पर करना पड़ेगा, करना चाहिए, और इस अंधाधुंध हिंसा को रुकवाना चाहिए जिससे कि उन इलाकों में अब कोई काम भी नहीं हो पा रहे हैं। जिन इलाकों और वहां के लोगों के हक के मुद्दे पर नक्सली एक हथियारबंद संघर्ष कर रहे हैं, उन इलाकों का और वहां के लोगों का सबसे बड़ा नुकसान आज वहां हो रही हिंसा है। देश के बहुत से हिस्सों में लंबे उग्रवादी या आतंकी आंदोलनों को बातचीत से निपटाने का लंबा इतिहास रहा है। छत्तीसगढ़ और नक्सल-प्रभावित दूसरे प्रदेशों में भी केन्द्र और राज्य सरकार को बातचीत की पहल करनी होगी, करनी चाहिए।
हम लगे हाथों भाजपा के एक केन्द्रीय (राज्य) मंत्री और भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष वी.के.सिंह के कल के उस बयान की चर्चा करना चाहेंगे जो कि उन्होंने रायपुर में दिया है। उसमें उन्होंने नक्सल हिंसा से निपटने के लिए उन इलाकों में जनता को जीतने की बात भी कही है। उन्होंने कहा कि लोगों को भरोसे में लेकर उन तक विकास पहुंचाना होगा। आदिवासियों को जल-जंगल और जमीन लौटाने की जरूरत है। उनकी बहुत सी बातें वर्दीधारी फौजी रूख से अलग एक सामाजिक सोच वाले नेता की थीं, और सोचने-बुझने वाले अधिकतर लोगों का यह मानना रहता है कि बंदूकों से हिंसा से मुठभेड़ तो की जा सकती है, लेकिन समस्या का समाधान नहीं ढूंढा जा सकता। 
आज प्रदेश में लोक सुराज अभियान की शुरुआत नक्सल हिंसा की खबरों तले कुछ दब सी गई है। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री पहले से तय दौरे पर नांदगांव-कवर्धा गए होते, तो उससे वह बात नहीं बनती जो कि उनके नक्सल कब्जों के इलाकों में जाने से बनी है। हम पिछले दो दिनों में इसी से जुड़े हुए मुद्दों पर लिख रहे हैं, और राज्य सरकार को नक्सल इलाकों में एक बेहतर तैयारी की जरूरत है जो कि इस आतंकी हिंसा में जवानों की शहादत रोक सके। दूसरी बात इन इलाकों में एक बेहतर शासन-प्रशासन देने की भी जरूरत है। और तीसरी बात, जो कि जनरल वी.के.सिंह ने भी कही है, आदिवासियों को जल-जंगल-जमीन पर उनका अनंतकाल से चले आ रहा हक लौटाना होगा, इसके बिना जमीनी बेचैनी बनी रहेगी। हर नक्सल हिंसा के बाद हम यहां इन्हीं तमाम मुद्दों को नहीं दुहरा सकते, इसलिए कुछ-कुछ महीनों के बाद हम नक्सलियों को भी यह याद दिलाते हैं कि भारत जितने विशाल लोकतंत्र में बंदूक की नली से निकला राज मुमकिन नहीं है, उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में आकर जनता की दिक्कतों का एक असल रास्ता निकालना चाहिए। और सरकार की यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है कि वह बातचीत के लिए कोशिश करे, क्योंकि बातचीत नक्सल-एजेंडा में चाहे न हो, लोकतंत्र के एजेंडा में तो हमेशा ही रहेगी। 

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