पड़ोसी के काम आना बुनियादी जिम्मेदारी, वाहवाही कैसी?

29 अपै्रल 2015
संपादकीय

देश में जब एक उग्र राष्ट्रवाद छाया हुआ रहता है, तो लोग छोटी-छोटी बातों पर दूसरे देशों से अपनी तुलना करने लगते हैं, और चुनिंदा तथ्यों को लेकर एक गौरव का अनुभव करने लगते हैं। यमन से हिंदुस्तानियों को निकाला गया, और अब नेपाल से हजारों भारतीय वापिस लाए जा रहे हैं, तो इसे लेकर भारतीय सेनाओं, और भारतीय नेताओं के गौरव के गीत गाए जा रहे हैं। कुछ ऐसी तस्वीर बनाई जा रही है कि भारतीय सेनाओं ने बहुत बड़ी बहादुरी का काम किया है। 
जो लोग सेना के काम और उनकी जिम्मेदारियों को नहीं जानते हैं, वे ही ऐसा सोच सकते हैं। दरअसल सेना जिस किस्म की जंग के लिए तैयार की जाती है, और तैयार रहती है, उसमें जान का खतरा इससे भी हजार गुना अधिक रहता है। लेकिन देश के भीतर, और देश के बाहर मुसीबत के वक्त सेनाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे राहत और बचाव के काम के लिए सरकार के निर्देश पर पहुंचें, और जिंदगियां बचाने का काम करें। बहुत से देशों की सेना, अद्र्धसैनिक बल, प्रदेशों में पुलिस ऐसा काम हमेशा ही करती हैं। यह काम अपनी जान को अपनी जिम्मेदारी के मुकाबले अधिक बड़े खतरे में डालकर दूसरी जान बचाने का हो, तो वह उल्लेखनीय होना चाहिए। लेकिन जब किसी बड़े खतरे के बिना अपने काम को ही लोग करते हैं, उसे लेकर एक गैरजरूरी गौरव ठीक नहीं है। 
बहुत से लोग अपने नियमित कामकाज के लिए वाहवाही और ईनाम की उम्मीद करते हैं। बहुत से देश जरा-जरा सी बात में एक झूठे आत्मगौरव का शिकार हो जाते हैं। ऐसे में लोगों को अपना रोज का न्यूनतम काम भी दूसरों पर अहसान लगने लगता है। जिस तरह सरकारी सेवा में किसी के ईमानदार रहने पर बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि वे देश-प्रदेश पर कोई अहसान कर रहे हैं, उसी तरह लोग मामूली कामों को बहादुरी करार देने को देशभक्ति मान लेते हैं। गौरव के लायक कौन सी बातें हैं, और किन बातों के लिए लोग तनख्वाह पाकर काम करते हैं इनके बीच फर्क करना जरूरी है। ऐसा न होने पर गौरव का महत्व हट जाता है। 
नेपाल में आज जो खबरें आ रही हैं, वे वहां की अखबारों में छपी ऐसी जानकारी है जो कि भारत के आत्मगौरव का वजन कम करने वाली हैं। वहां के अधिकारियों का कहना है कि भारत से पहुंचे बचाव दल जितना योगदान दे रहे हैं, उससे कई गुना अधिक योगदान देने का प्रचार कर रहे हैं। इस विवाद की बारीकियों में गए बिना यह याद रखना चाहिए कि पुराने जमाने से एक नसीहत चली आ रही है कि नेकी कर, दरिया में डाल। मतलब यह कि अपने किए किसी अच्छे काम के लिए वाहवाही की उम्मीद में नहीं पडऩा चाहिए। पड़ोसी के काम आना एक बुनियादी जिम्मेदारी होनी चाहिए, और अपने नागरिकों को बचाना तो एक बुनियादी जिम्मेदारी तो है ही। इसके लिए तारीफ की कोशिश करने से जिम्मेदारी का महत्व भी घट जाता है।

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