इतने बड़े बजट में जख्मी शहीदों को बचाने एक अस्पताल नहीं !

संपादकीय
13 अप्रैल 2015

छत्तीसगढ़ के बस्तर में हर कुछ हफ्तों में नक्सल हमलों में राज्य या केन्द्र के सुरक्षा कर्मी मारे जाते हैं। वहां पर तैनात हेलीकॉप्टरों से अधिक जख्मी लोगों को राजधानी रायपुर के बड़े निजी अस्पताल में लाया जाता है, और उनकी जान बचाने की कोशिश होती है। नक्सल हिंसा अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से चली आ रही है, और बीच के बरसों में वह बहुत अधिक थी, हर बरस सैकड़ों लोग मारे जा रहे थे, और अभी भी हर बरस दर्जनों लोग शिकार हो ही रहे हैं। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि साठ हजार करोड़ से अधिक सालाना बजट वाले इस राज्य में लगातार शहीद होने वाले लोगों के लिए राज्य बनने के डेढ़ दशक बाद भी जगदलपुर में एक ऐसा अस्पताल क्यों नहीं बन पाया है जहां कि जख्मियों की जान बचाने की बेहतर कोशिश तुरंत हो सके? यह जाहिर है कि चिकित्सा विज्ञान में अधिक जख्मी लोगों को जरूरी इलाज मिलने के पहले अगर कोई वक्त खराब होता है, तो उसे गोल्डन अवर का नुकसान कहा जाता है। जिंदगी और मौत के बीच इस एक घंटे का बहुत महत्व होता है, और जाहिर है कि बस्तर से सैकड़ों किलोमीटर दूर राजधानी रायपुर तक हेलीकॉप्टर से भी लाने में, और फिर अस्पताल के रास्ते का सड़क-समय मिलाकर यह घंटे भर से अधिक का तो होता ही है। 
यह बात तकलीफदेह है कि जिस प्रदेश में साज-सज्जा के लिए, शहरी विकास के लिए, सड़कों को चौड़ा करने के लिए हर बरस हजारों करोड़ खर्च हो रहे हैं, वहां पर शहीदों को जिंदा बचाने की कोशिश के लिए सौ-दो सौ करोड़ का ऐसा अस्पताल बस्तर में डेढ़ दशक में भी नहीं बनाया गया जहां कि सबसे अच्छे इलाज का इंतजाम हो, और घायलों को दम तोड़ते हुए सैकड़ों किलोमीटर दूर के अस्पताल तक न लाना पड़े। हमारा मानना है कि इस प्रदेश और इस लोकतंत्र को बचाने के लिए जो लोग मोर्चों पर तैनात हैं, छत्तीसगढ़ के गांव-गांव से गए हैं, देश के अलग-अलग प्रदेशों से केन्द्रीय सुरक्षा बलों के रास्ते आकर बस्तर में तैनात हैं, उनको बचाने के लिए कुछ सौ करोड़ का ऐसा आधुनिक अस्पताल राज्य सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है। ऐसा न करना उन लोगों की जिंदगी को खतरे में छोड़ देना है जो कि घर-बार से दूर लोकतंत्र को बचाने के लिए नक्सल मोर्चों पर धमाकों के बीच जीते हैं, और जिनको अपनी खुद की जिंदगी का कोई अंदाज नहीं रहता कि वे कब तक जिंदा रहेंगे। 
राज्य की बाकी चिकित्सा सेवा की जो बदहाली है, वह तो जाहिर है, और उसी किस्म का इंतजाम जगदलपुर के अस्पताल या मेडिकल कॉलेज का होगा इसमें कोई शक नहीं। लेकिन नक्सल मोर्चे पर शहादत को प्रदेश की बाकी इलाज से अलग रखने की जरूरत है, और छत्तीसगढ़ से सबक लेकर केन्द्र सरकार नक्सल प्रभावित बाकी इलाकों में भी ऐसे इंतजाम कर सकती है। आज भी हमारा ख्याल है कि हेलीकॉप्टरों से घायलों को लेकर आने, और लंबा निजी इलाज करवाने का सिलसिला कोई सस्ता नहीं पड़ता होगा। लेकिन इससे भी अधिक जरूरी बात है जिंदगी और मौत के बीच के समय को घटाने की। छत्तीसगढ़ को चाहिए कि बिना देर किए हुए बस्तर में एक ऐसा अस्पताल खड़ा करे जो कि बहादुर सुरक्षा कर्मचारियों को बचाने के काम आ सके। शहरों में बैठे हुए लोग यह नहीं समझ सकते कि नक्सल मोर्चां पर तैनात लोग और उनके परिवार किस तरह के तनाव में जीते होंगे। राज्य को अपनी सुरक्षा करने वालों को उनकी जिंदगी के लिए सुरक्षा देने का काम करना चाहिए, और हमारा ख्याल है कि यह राज्य बहुत आसानी से सौ-दो सौ करोड़ में ही बस्तर में ऐसा अस्पताल खड़ा कर सकता है जिसके बाद किसी जख्मी को बाहर लाने की जरूरत न पड़े। ऐसा अगर होता है तो वह देर से सही, एक सही फैसला होगा, और इसके बाद ही सरकार एक जिम्मेदार सरकार कही जा सकेगी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें