कश्मीरी पंडितों की घरवापिसी, और बाकी देश का माहौल...

संपादकीय
12 अप्रैल 2015

जम्मू कश्मीर सरकार के सामने, और केन्द्र की मोदी सरकार के सामने भी यह एक बड़ी चुनौती है कि कश्मीर से बेदखल किए गए कश्मीरी पंडितों को वहां पर किस तरह वापिस बसाया जा सके। एक विचार यह चल रहा है कि उनके लिए अलग से एक बस्ती बनाई जाए, और दूसरा रास्ता यह तो है ही कि जिस तरह वे पहले कश्मीर की बाकी मुस्लिम आबादी के साथ घुले-मिले रहते थे, उसी तरह उनको वहां फिर से बसाया जाए। करीब 25 बरस से वहां के लाखों कश्मीरी पंडित प्रदेश के बाहर रहने को मजबूर हैं, और देश की राजधानी दिल्ली में उनके लिए शरणार्थी बस्तियां बसाई गई थीं। तब से लेकर अब तक वे अपने ही देश में शरणार्थी हैं, और पिछली पूरी पीढ़ी ने अपनी जमीन को देखा ही नहीं है, हो सकता है कि सैलानी बनकर वहां आए-गए हों। 
1985 से 1995 के बीच कश्मीर में जिन जिहादियों की बंदूकें बोलती थीं, उन्होंने लाउडस्पीकरों पर धमकियां दे-देकर कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोडऩे पर मजबूर किया था। इसके बाद उनके घर-बार कहीं जला दिए गए, कहीं कब्जा कर लिए गए, और कुछ लोगों को सरकार से उसका मुआवजा भी मिला। लेकिन अभी भी कश्मीर की राजधानी श्रीनगर जाएं तो कोई भी टैक्सी वाला यह बताते चलता है कि कौन-कौन सी उजाड़ इमारत कश्मीरी पंडित की थी, और कौन-कौन सी सपाट जगह पर वैसी कौन सी इमारत जला दी गई थी। इस बारे में हम लिख जरूर रहे हैं, लेकिन इसका कोई आसान रास्ता है नहीं। जम्मू-कश्मीर में आज भाजपा-पीडीपी की जो गठबंधन सरकार है उसके न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत भी इसका कोई रास्ता निकलते नहीं दिखता है, और कश्मीरी पंडितों की बस्ती बसाने की एक चर्चा शुरू होने पर ही श्रीनगर में अलगाववादियों ने कल बंद करवा दिया था। 
कश्मीर के मामले में हिन्दू, मुस्लिम एक मुद्दा है, भारत या पाकिस्तान के साथ हमदर्दी दूसरा मुद्दा है, और लोकतंत्र या आतंक, यह तीसरा मुद्दा है। और इनमें से हर मुद्दा अपने आपमें काफी जटिल है, और जब ये तीनों मिल जाते हैं तो इतना अंधेरा खड़ा कर देते हैं, कि कोई राह नहीं सूझती। फिर इसके ऊपर एक जटिलता और भी है, केन्द्र और राज्य के संबंधों की। कश्मीर का जब भारत में विलय हुआ था, तो संविधान में उसे जो विशेष दर्जा दिया गया था, उसे जो खास रियायतें दी गई थीं, उनके खिलाफ जनसंघ के जमाने से भाजपा लगातार आंदोलन करते आई है। अब आज इस राज्य में सत्ता में हिस्सेदारी के लिए भाजपा ने अपने बुनियादी सिद्धांतों के साथ जो तात्कालिक समझौता किया है, वह अपने आपमें एक बड़ी विसंगति है, और भाजपा की दीर्घकालीन नीतियों को देखें, तो वह एक बड़ा आंतरिक विरोधाभास है। ऐसे में कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की वापिसी के अलावा भी दूसरी गुत्थियां आपस में दोनों पार्टियां सुलझा नहीं पा रही हैं, और यह तो एक बहुत बड़ा मुद्दा है। 
आज कश्मीरी पंडितों के बिना भी वहां पर आतंकी मुस्लिम दूसरे मुस्लिमों को मार रहे हैं, सरहद पार से आए हुए लोग, या वहां के अलगाववादी वहीं के मुस्लिमों के हितों के खिलाफ काम कर रहे हैं, और वैसे में कश्मीरी पंडितों को वापिस बसाने का काम बड़ा ही मुश्किल लगता है, लेकिन उतना ही जरूरी भी है। लेकिन ऐसी किसी भी जटिलता से परे हमारा यह साफ मानना है कि कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश के भीतर आंतरिक विस्थापित लोगों की तरह रहने की तकलीफ से उबारने की जरूरत है, और कश्मीर के भीतर राष्ट्रीय सोच इतनी विकसित करने की जरूरत है कि धर्म से परे लोग एक कश्मीरियत को अहमियत दें, और दोनों तबके वहां पर मिलकर रह सकें। 
आज कश्मीर में हिन्दू पंडितों की वापिसी के लिए देश में जैसे राष्ट्रीय वातावरण की जरूरत है, उसे तबाह करने का काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ के लोग, उनके हमख्याल लोग बड़ी तेजी से कर रहे हैं। साधू-साध्वियों से लेकर शिवसेना और धर्मसेना तक, विश्व हिन्दू परिषद तक जिस तरह की मुस्लिम विरोधी बातें कर रहे हैं, वे तमाम बातें कश्मीरी पंडितों के भविष्य के खिलाफ भी जा रही हैं। यह भी हो सकता है कि ऐसे संगठन कश्मीरी पंडितों को पूरी जिंदगी, हमेशा के लिए, शरणार्थी ही बनाकर रखना चाहें, ताकि नफरत को रोज खाना खिलाया जा सके। लेकिन इन तमाम संगठनों के भविष्य से परे देश का इतिहास यह देखेगा, और यह लिखेगा कि प्रधानमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने देश की ऐसी बड़ी समस्याओं का क्या समाधान निकाला। देश में चारों तरफ नफरत की बात करते हुए कश्मीर के भीतर कश्मीरी पंडितों को वापिस बसाना एक बड़ी दिक्कत है, और बड़ा खतरा है। देश के भीतर जब तक माहौल अच्छा नहीं रहेगा, मोदी कोई इतिहास नहीं रच सकेंगे। 

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