बकवासियों को मुखवास देने की बड़ी जरूरत है

संपादकीय
22 अप्रैल 2015

लोकसभा में कल मोदी के मंत्री गिरिराज सिंह ने सोनिया गांधी के खिलाफ कही भद्दी बात के लिए माफी मांगी और उसके बाद वहां का कांग्रेसी-हंगामा बंद हुआ। लेकिन मानो मीडिया का पेट भरने के लिए शाम होते-होते एक दूसरे केन्द्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने कांग्रेस या राहुल गांधी को लेकर शैतान शब्द का इस्तेमाल किया, और मानो मधुमक्खी के छत्ते पर यह दूसरा पत्थर पड़ा। देश इसी तरह की बातों में उलझकर खत्म हुए जा रहा है। संसद के भीतर, विधानसभाओं के भीतर, या फिर सड़क पर, कैमरों के सामने, मंच और माईक पर, लोग बेकाबू होकर इस तरह की गंदी बातें कर रहे हैं कि मानो फिल्म के पर्दे पर शाहिद कपूर नाच-नाचकर गंदी बात-गंदी बात गाना गा रहा है। 
अब एक सवाल यह भी उठता है कि ऐसी बातों को लेकर टीवी के स्टूडियो या अखबार के दफ्तर तक दौड़ जाने वाले मीडिया के लोगों को क्या कहा जाए, जो कि आग को आगे बढ़ाने के बजाय तर्कहीन और अवैज्ञानिक आरोपों पर यह सवाल भी नहीं उठाते कि ऐसा आरोप लगाने के लिए उनके पास कौन से तथ्य हैं, कौन से सुबूत हैं। अब दो दिन पहले दो महीने के अज्ञातवास से लौटे हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस के विशाल किसान सम्मेलन में यह कहा कि लोकसभा चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी ने उद्योगपतियों से हजारों करोड़ का कर्ज लिया था, और उसे चुकाने के लिए किसानों की जमीन लेकर वे उद्योगपतियों को दे रहे हैं। अब यह बात भी बिना किसी सुबूत और बुनियाद के थी। अभी महाराष्ट्र की एक अदालत में राहुल गांधी इस बात पर रियायत पाकर कटघरे के बाहर-बाहर चल रहे हैं, जिसमें उनके एक बयान को लेकर मुकदमा दर्ज किया गया है। राहुल गांधी ने गांधी की हत्या के लिए आरएसएस को जिम्मेदार ठहराया था, संघ को हत्यारा कहा था, और उसे लेकर संघ के समर्थकों ने उन्हें अदालत में घसीटा है। अब लोग बिना सुबूत अगर एक दूसरे को शैतान कहें, हत्यारा कहें, रंगभेदी और नस्लभेदी बात करें, एक दूसरे को भ्रष्ट कहें, तो देश का कितना समय इसमें बर्बाद हो रहा है। दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ तक यह सिलसिला चल रहा है कि बिना सुबूत एक-दूसरे के खिलाफ बहुत से भारी-भरकम आरोप लगाए जा रहे हैं और जब तक मामले अदालत में नहीं जाते हैं, तब तक किसी को कोई खतरा नहीं लगता है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल से लेकर प्रशांत भूषण तक, और गडकरी से लेकर कितने ही दूसरे नेताओं तक उनके बयानों के लिए मुकदमे दर्ज हैं, और अदालतों में चल रहे हैं। 
लेकिन मीडिया ने गंदी बातों को, बेबुनियाद बातों को आगे बढ़ाने का काम इस तरह की गैरजिम्मेदारी के साथ शुरू किया है कि मानो वह ऐसा पोस्ट ऑफिस है जिसे कि लिफाफे के भीतर की चि_ी को पढऩा ही नहीं है। अगर गंदी बातें सामने न आएं, तो अखबारों को पन्ने भरना, टीवी चैनलों को बुलेटिन भरना मुश्किल होने लगे, और ऐसे बकवासियों के विरोधियों को जवाब देने के मौकों का टोटा पड़ जाए। आज भारतीय राजनीति में बकवासियों को मुखवास देने की जरूरत है, ताकि बदबूदार बातें मुंह से निकलना कुछ कम हो, या जो बातें निकल रही हैं, उनकी बदबू कुछ कम हो।

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