मां को घर से निकालने वाले बेटे ने बहन को मारा कि...

संपादकीय
3 अप्रैल 2015
छत्तीसगढ़ में दो दिन पहले एक सामाजिक बदलाव की खबर थी कि एक हिन्दू महिला के गुजरने पर उसके बेटी ने उसे कंधा दिया, और उसका दाह संस्कार किया।  लेकिन दो दिन गुजरे नहीं थे कि यह भयानक खबर आई कि इस बेटी के भाई ने कुल्हाड़ी से इस बहन के टुकड़े कर दिए, इसलिए कि मां की संपत्ति उसे न मिल जाए। और मां को इस बेटे ने पहले ही घर से निकाला हुआ था, और वह बेटी के साथ रहती थी, यह चाहती थी कि बेटी ही उसका दाह संस्कार करे। 
नवरात्रि खत्म हुई ही है कि ये दो खबरें आ गई। देवी की पूजा-उपासना करने वाला भारत का हिन्दू समाज साल में दो बार नवरात्रि पर, दुर्गा पूजा पर, लक्ष्मी और सरस्वती पूजा पर, काली और संतोषी मां की पूजा पर साल भर दर्जनों दिन लगाता है। देवी के गुणगान के गीत लाउडस्पीकर पर चलते रहते हैं, और वैष्णो देवी से लेकर हर प्रदेश के देवी मंदिरों तक भक्तों का सैलाब रहता है। लेकिन देश के बाकी धर्म और समुदायों के लोगों की तरह इस समाज में भी जिंदा देवियों के खिलाफ हिंसा बेहिसाब है। अजन्मी कन्या को गर्भ में मारने से लेकर बच्चियों से बलात्कार, दहेज हत्या से लेकर विधवा प्रथा तक, और कहीं-कहीं सती बनाने तक, महिलाओं से हिंसा का मानो देश में सैलाब आया हुआ है। बहुत से धर्म तो ऐसे हैं जिनमें देवियों की कोई कल्पना या धारणा नहीं है, लेकिन हिन्दू धर्म तो देवी पूजा से भरा हुआ धर्म है, और इस धर्म से तो यह उम्मीद की जाती है कि यह इस प्रतीक-पूजा से परे असल जिंदगी में भी लड़कियों और महिलाओं का थोड़ा सा सम्मान करे। 
अब छत्तीसगढ़ की इस ताजा भयानक घटना को देखें, तो एक बूढ़ी मां को बेटा घर से निकाल चुका है, और बेटी अपनी मां का सहारा है, उसी के पास मां रह रही है। देश में बुजुर्ग मां-बाप की देखभाल की जिम्मेदारी के लिए कानून तो बना हुआ है लेकिन हकीकत यह है कि जिस देश में वृद्धावस्था पेंशन के लिए भी लोगों को रिश्वत देनी पड़ती हो, वहां पर बेटे से गुजारा-भत्ते का मुकदमा लडऩा आसान तो है नहीं। खैर, लड़कियां वैसे भी मां-बाप का अधिक ख्याल रखती हैं, और इस मामले में भी मां की मर्जी के मुताबिक लड़की ने उसका अंतिम संस्कार किया। और जब मौत के दो दिन बाद तालाब पर नहाने की रस्म चल रही थी, तो इस जिम्मेदार बेटी के भाई ने अपने बेटे के साथ आकर कुल्हाड़े से उसकी हत्या कर दी। 
यह वही छत्तीसगढ़ है जहां पर हर कुछ हफ्तों में पुलिस तक ऐसा मामला पहुंचता है जिसमें किसी महिला को टोनही बताकर उसे प्रताडि़त किया जाता है, उसे मारा जाता है, या मार डाला जाता है। यह समाज भी बराबरी की सोच न होने का नतीजा है। जिन समाजों में महिला को बराबर या लगभग बराबर माना जाता है, वहां पर महिला पर इस तरह के जुल्म कम होते हैं। छत्तीसगढ़ में ही आदिवासी समाज ऐसा है जिसमें महिला के अधिकार गैरआदिवासी समुदायों के मुकाबले अधिक बराबरी के हैं। बस्तर के आदिवासी समाजों में देखें तो रोजमर्रा के रीति-रिवाज और मनोरंजन महिला को लगभग बराबरी का हक मिलता है। इसलिए यह सोचना बेकार है कि शहरी समुदायों में, अधिक पढ़े-लिखे समुदायों में, संपन्न समाज में बराबरी अधिक है। 
छत्तीसगढ़ बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा के मामले में देश में सबसे अधिक हिंसक राज्यों में से एक है। और इस किस्म के निजी जुर्म अमूमन रोके जाने वाले नहीं होते। पुलिस जुर्म के पहले किसी की नीयत का अंदाज नहीं लगा सकती। जब तक समाज में लोगों की सोच में बदलाव नहीं आएगा, तब तक केवल सजा से मर्दानी हिंसा रूकते नहीं दिखती। और देश भर के आंकड़े बताते हैं कि तीन बरस पहले के अतिचर्चित निर्भया बलात्कार कांड के बाद से भी अब तक इस देश में बलात्कार के मुकदमों में सजा के न आंकड़े बदले हैं, न उनकी रफ्तार बदली है। अब महिला आरक्षण की तरह महिला पर हिंसा या जुर्म के मामलों के लिए अलग से ही अदालतें बनें, और वे तेजी से गुनहगार को सजा दे सकें, तो क्या ऐसे जुर्म कम होंगे? इसके बारे में कानून और समाज के जानकार तबकों को सोचना चाहिए। फिलहाल इस तरह के निजी जुर्म सरकार या पुलिस शायद ही रोक पाए, समाज खुद चाहे तो इनमें कमी आ सकती है। 

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