सोच से शुरू होकर शौच तक कामयाबी की कहानियां...

संपादकीय
2 अप्रैल 2015

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि एक आइडिया बहुत अच्छी हो सकती है लेकिन अगर उस पर अमल के लिए संस्थागत ढांचा नहीं रहेगा, तो वह आइडिया किसी काम की नहीं रह जाती। बात बड़ी सरल है, लेकिन बहुत अहमियत रखने वाली है। लोगों की सोच, लोगों के विचार, उनके मन में उगती और पनपती योजनाएं बहुत अच्छी हो सकती हैं, लेकिन अगर उन्हें पूरा करने के लिए सरकारी या किसी गैरसरकारी ढांचे की क्षमता न हो, तो वैसी सोच समाज के काम नहीं आ सकती। 
मिसाल के लिए हम देश भर में सार्वजनिक शौचालय शुरू करने वाले बिन्देश्वरी पाठक को देखें। शौचालय बनाने के लिए जो ईंट-गारा लगता है, वह तो पाठक के पैदा होने के सैकड़ों बरस पहले से दुनिया में मौजूद था। लेकिन इसे एक सार्वजनिक सेवा के रूप में कैसे शुरू किया जाए, कैसे कामयाबी से चलाया जाए, इसका इंतजाम तो ब्राम्हण समाज से आए हुए एक बिन्देश्वरी पाठक ने ही किया, कामयाबी से किया, और अब वे भारत के बाहर भी कई देशों में इस काम को कर रहे हैं। भारत में हर शहर-कस्बे में सुलभ शौचालय अगर न बने होते, न चलते होते, तो लोग तो सड़कों के किनारे ही फारिग होते रहते। और शौचालय बनाने के लिए किसी रॉकेट-साईंस की जरूरत भी नहीं थी। 
इसी तरह हिन्दुस्तान में कुछ और बहुत ही मौलिक प्रयोग सफल हुए हैं। इनमें से एक गुजरात के आनंद में डेयरी उद्योग का रहा। वहां पर सहकारिता के आधार पर दूध उत्पादन से लेकर दूध की मार्केटिंग तक, और अंतरराष्ट्रीय ब्रांडों से मुकाबला करते हुए मक्खन और चॉकलेट जैसे डेयरी-उत्पाद कामयाब बनाने में इस को-ऑपरेटिव ने जो मिसाल कायम की, उससे देश भर में सहकारिता क्षेत्र के भ्रष्टाचार के मुकाबले एक बिल्कुल ही अलग तस्वीर सामने आई। आज देश के एक कोने से शुरू हुई यह श्वेत क्रांति हिन्दुस्तान की एक सबसे सफल कहानी बन चुकी है। 
अब एक दूसरे कोने केरल से वामपंथी मजदूर आंदोलन के बीच से शुरू हुए इंडियन कॉफी हाऊस को देखें, तो उसकी कामयाबी कश्मीर से कन्याकुमारी तक, और गुजरात से असम तक बिखरी हुई है। किस तरह से एक मजदूर संगठन सहकारिता के आधार पर पूरे देश में एक सबसे प्रतिष्ठित और भरोसेमंद खानपान की जगह शुरू करके उसका मानो आसमान तक विस्तार कर चुका है, यह कहानी बहुत ही अनोखी और हैरान करने वाली है। इसके साथ ही मुंबई में पांच-दस लाख लोगों तक रोज टिफिन पहुंचाने वाले लोगों को देखें, तो वह भी एक अजीब किस्म की कामयाबी है। और इस तरह की दर्जनों सोच लोगों के मन में हो सकती हैं, लेकिन जब तक उस पर अमल करने के लिए लोगों का, सरकार का, या संगठन का कोई ढांचा न रहे, कुछ नहीं हो सकता। 
प्रधानमंत्री ने सोच की अहमियत को कम नहीं किया है, बल्कि उसके साथ-साथ, और उसके बाद, अमल के लिए जरूरी ढांचे की अहमियत को गिनाया है। हम बाजार में यह देखते हैं कि कोई बहुत अच्छा प्रोडक्ट भी कमजोर मार्केटिंग की वजह से फ्लॉप हो जाता है, और कोई औसत दर्जे का प्रोडक्ट भी कामयाब मार्केटिंग की वजह से हिट हो जाता है। खुद मोदी की कामयाबी के बारे में लोगों का यह मानना है कि वह एक बहुत कामयाब मार्केटिंग की उपज है, और इस मार्केटिंग के लिए भाजपा, आरएसएस, एनआरआई, कई किस्म की ताकतें लगी हुई थीं। इसलिए मोदी जब यह कह रहे होंगे, तो हो सकता है कि उनके दिमाग में अपनी खुद की कामयाबी रही हो।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें