विरासत ढोने के लिए वारिस तैयार होना भी जरूरी होता है

संपादकीय
17 अप्रैल 15

राहुल गांधी करीब दो महीने बाहर रहकर लौटे, तो देश के लोगों का एक इंतजार खत्म हुआ। लेकिन यह रहस्य अभी तक बना हुआ है कि वे कहां गए थे, क्या कर रहे थे, और किस वजह से इस बात का खुलासा नहीं किया गया था। यह हो सकता है कि सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए राहुल के पते-ठिकाने को गोपनीय रखा गया हो, लेकिन यह दौर कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती का दौर है, और अलग-अलग तबकों की बातों को देखें तो ऐसा लगता है कि कांग्रेस के नेताओं के बीच मां-बेटे को लेकर एक खींचतान चल रही है कि कौन पार्टी को सम्हाले। ऐसे में एक लंबी गैरमौजूदगी निजी तो हो सकती है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में निजी बातों की एक सीमा भी होती है। आम लोग तो बरसों तक बिना कुछ कहे मर्जी की जिंदगी जी सकते हैं, लेकिन जिस आदमी से इस देश को सम्हालने की उम्मीद उसके समर्थक करते हैं, जो कि देश की एक सबसे बड़ी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है, जो कि संसद सदस्य है, उससे देश के लोगों को कुछ अधिक जानने का हक भी है। सुरक्षा के अलावा बाकी बातों को कांग्रेस पार्टी को देश को उजागर करना था, उसके बिना यह पार्टी अपने को और अपने नेता को हाशिए की तरफ धकेलती है। देश के लिए जो लोग अहमियत रखते हैं, वे लोग देश के प्रति जवाबदेह भी रहने चाहिए। महत्व और अनदेखी एक साथ नहीं चल सकते। अब आने वाले दिन बताएंगे कि राहुल गांधी ऐसे आड़े वक्त पर, चौपट हो चुकी अपनी पार्टी को छोड़कर, संसद के महत्वपूर्ण सत्र को छोड़कर, इस तरह दो महीने क्यों गायब रहे। 
खैर, इससे परे कि एक बात यह भी है कि आने वाले दिनों में राहुल गांधी और सोनिया गांधी में से पार्टी को सम्हालने की अधिक संभावना कौन रखते हैं। वैसे तो यह इस घरेलू पार्टी का निहायत ही घरेलू मामला है, लेकिन यह सार्वजनिक चर्चा में है, इसलिए इस पर  कुछ चर्चा हम भी कर सकते हैं। सोनिया गांधी ने कांग्रेस पार्टी को बहुत ही कठिन मौके पर सम्हाला था और प्रधानमंत्री की कुर्सी का प्रस्ताव छोड़कर भी उन्होंने कांग्रेस को एक गौरवशाली चुनावी-ऊंचाई तक पहुंचाया था। लोकसभा के दो-दो चुनाव लगातार पार्टी ने सोनिया की वजह से ही जीते थे, यह और बात है कि पार्टी की सरकार के कुकर्मों के चलते कांग्रेस ने अपने साथ यूपीए गठबंधन की संभावनाओं को खत्म कर दिया। अब पिछले लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस की कोई भी संभावना बची नहीं थी, तब एक गलत मौके पर राहुल गांधी को एक ऐसे नरेन्द्र मोदी के मुकाबले जनता के सामने पेश किया गया जिस मोदी का कोई विकल्प दिख नहीं रहा था। राहुल गांधी को उस मुकाबले में पूरी तरह नाकामयाब होना ही था, और वह आशंका से कुछ बढ़कर हुआ। 
अब कांग्रेस पार्टी को मिट्टी से उठकर फिर खड़ा होना है। अब तक राहुल गांधी की जितनी खूबियां सामने आई हैं, उन सबको मिलाकर भी वे लोगों के बीच कोई भरोसा खड़ा करते दिखते नहीं हैं। दूसरी तरफ सोनिया गांधी इस तमाम हार के बावजूद कांग्रेस के भीतर एक सर्वमान्य नेता हैं, और ऐसा लगता है कि वक्त के साथ-साथ वे कांग्रेस को इस बदहाली से कम या अधिक हद तक उबार पाएंगी। शीला दीक्षित जैसे बहुत से लोगों ने यह राय सामने रखी है कि सोनिया गांधी पार्टी की अगुवाई जारी रखना चाहिए। हमको भी दूर बैठे यही एक बात सही लगती है कि यह वक्त राहुल गांधी के कमजोर कंधों पर बड़ा वजन डालने का नहीं है, और सोनिया गांधी का कांग्रेस के भीतर वे फिलहाल तो कोई विकल्प नहीं बन सकते। यह बात सुनने में अटपटी लग सकती है कि 45-50 बरस का यह अधेड़ नौजवान अब तक काबिल नहीं बन पाया है, लेकिन इंदिरा गांधी के बाद अगर इस नेहरू-गांधी परिवार को देखें, तो राजीव, सोनिया, और राहुल, ये सब वक्त की पैदाइश हैं, और इनके बीच अनिवार्य रूप से न तो कोई लीडरशिप की खूबी थी, और न ही कोई बड़ी हसरत ही दिखती थी। ऐसे में हादसों ने एक के बाद दूसरे को पार्टी सम्हालने को मजबूर किया, लेकिन इन तीनों के ही साथ काम सम्हालते समय कोई तजुर्बा नहीं था। राहुल गांधी को अभी लंबी ट्रेनिंग और लंबी सीख की जरूरत है, उसके पहले उनको कांग्रेस का अध्यक्ष बनाना उनके खुद के साथ बेइंसाफी होगी। यह जरूर हो सकता है कि उनकी ताजपोशी करके कुछ लोग अपने खुद के नंबर बढ़वा सकें, लेकिन उससे कांग्रेस का कोई भला नहीं होगा। विरासत को ढोने के लिए वारिस का तैयार होना भी जरूरी होता है, वरना इस देश ने अंग्रेज राज में हिन्दुस्तानी राजकुमारों के अंग्रेज पालक देखे हुए हैं, कांग्रेस के भीतर ऐसी नौबत ठीक नहीं होगी।

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