गैरजरूरी विवादों में उलझता हुआ देश

संपादकीय
4 अप्रैल 2015

भारत जैसे विशाल देश में विविधताओं का सम्मान करते हुए कई तरह के विवादों से बचने की कोशिश होनी चाहिए। खासकर धर्म और जाति के आधार पर, निजी जिंदगी को लेकर, जितने तरह के विवाद और बखेड़े हो रहे हैं, उनसे तो बचने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए। हम राजनीतिक दलों के नेताओं की गंदी जुबान से निकलती नफरत की बातों पर कई बार लिख चुके हैं, लेकिन उससे परे भी कुछ मुद्दे हैं जिन पर बात होनी चाहिए। अब जैसे सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने ईसाइयों के एक बड़े त्यौहार गुडफ्राईडे के दिन देश भर के मुख्य न्यायाधीशों, मुख्यमंत्रियों, और प्रधानमंत्री का सम्मेलन रख दिया। एक वकील और एक जज ने इसका विरोध भी किया, तो भी मुख्य न्यायाधीश अड़े रहे, और उन्होंने गिनाया कि पहले भी दूसरे त्यौहारों पर, स्वतंत्रता दिवस पर जजों की ऐसी कांफ्रेंस होती रही है, और अदालतों का समय बचाने के लिए छुट्टी के दिन वे इसे कर रहे हैं। 
इसके पहले एक खबर यह आई कि गोवा सरकार ने सरकारी छुट्टियों की लिस्ट से गांधी जयंती का नाम हटा दिया था। बाद में इसका विरोध हुआ और सरकार ने इसे टाइपिंग की गलती बताकर इसे फिर जोड़ा। यहां यह याद दिलाने की जरूरत है कि कुछ बरस पहले भी गोवा में भाजपा की सरकार के रहते हुए एक बार और इसी तरह गांधी जयंती की छुट्टी हटाई गई थी। कहीं कोई सोनिया गांधी के रंग पर भद्दी बात कह रहा है, तो कहीं कोई नाइजीरिया के लोगों को बदसूरती की गाली की तरह इस्तेमाल कर रहा है। और फिर इसके जवाब में लालू यादव ने एक दूसरे किस्म की भद्दी बात कही कि सोनिया के खिलाफ गंदा बयान देने वाले केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को चूडिय़ां पहनानी चाहिए, और मांग में सिंदूर भरकर...। फिर भाजपा के दो सांसद सिगरेट को बचाने के लिए ऐसी भयानक अवैज्ञानिक बातें कह रहे हैं कि मानो वे तम्बाखू उद्योग के जनसंपर्क अधिकारी हों। कहीं कोई राहुल गांधी के बारे में कुछ कह रहा है, तो कहीं किसी और के बारे में। 
भारत में धर्म, जाति, क्षेत्रीयता, रंग, बोली इन सबको लेकर जितने तरह की अलग-अलग बिरादरियां हैं, उन सबका साथ रहना तभी हो सकता है जब उनके बीच एक-दूसरे के लिए परस्पर सम्मान हो, और एक-दूसरे के लिए कुछ या अधिक हद तक बर्दाश्त हो। आज पूरा देश खानपान के फर्क को लेकर उबल रहा है, जिस धर्म और जाति के भीतर गोमांस को खाने का पौराणिक काल से अब तक का इतिहास रहा है, वह भी आज मानो एक-दूसरे धर्म, या हिन्दू धर्म की ही दूसरी जातियों पर हमला करने के लिए, उनका रोजगार छीनने के लिए, उनकी जीवन शैली पर अपने किस्म की सनातनी जीवन शैली लादने के लिए टूट पड़ा है। एक तरफ तो केन्द्र की भाजपा सरकार के पर्यावरण मंत्री यह कहते हैं कि देश में हर गाय-भैंस पेट में 40 किलो पॉलीथीन लेकर जीते हैं, और दूसरी तरफ इन पशुओं के लिए जीने के किसी इंतजाम के बिना लोग उनको कसाइयों से बचाने को एक धार्मिक और साम्प्रदायिक मुद्दा बनाकर चल रहे हैं। यह सिलसिला न सिर्फ देश के अल्पसंख्यकों को अलग-थलग करने का खतरा खड़ा करेगा बल्कि खुद हिन्दू समाज के भीतर गोमांस खाने वाले एक बहुत बड़े तबके को भी सनातनी हिन्दू तबके से अलग कर देगा, जो कि हजारों बरस से अलग-थलग चले भी आ रहा था। आज अगर भाजपा सरकारों में, भाजपा में कोई यह सोचे कि हिन्दू समाज में हर कोई गोमांस खाने के खिलाफ है, तो यह हकीकत के बिल्कुल उल्टी बात है। हिन्दू समाज के भीतर बहुत बड़ी आबादी के लिए सस्ते मांस के रूप में गोमांस, गोवंश का मांस ही उपलब्ध है। 
आज देश-प्रदेश के मंत्रियों से लेकर सत्तारूढ़ पार्टियों तक के नेता जिस तरह की बेकाबू बातें कर रहे हैं, जिस तरह की गंदी जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं, उनसे देश में एक तनाव बढ़ते चल रहा है, और संस्कृतियों का एक टकराव खड़ा हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश के इस माहौल को और बिगडऩे से बचाने के लिए देश के प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी निभानी चाहिए। ऐसे विवादों पर प्रधानमंत्री को चुप रहने का हक नहीं मिल सकता। 

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