ये पिशाच और हैवान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही हैं...

संपादकीय
24 अप्रैल 2015

मुम्बई की एक दिल दहलाने वाली खबर कल वहां के एक अखबार में छपी और उससे बहुत अनमने ढंग से थोड़ा सा हिस्सा लेकर हम यहां लोगों का दिल दहलाने को बेबस हुए। वहां एक छोटी सी खोली में रहने वाले एक गरीब परिवार की दस-बारह बरस की दो बच्चियों के साथ उन्हीं के दो बालिग भाई बरसों से बलात्कार करते आ रहे हैं, और इसकी शिकायत करने पर उनकी मां ने ही बच्चियों को आग से दागा, और कहा कि भाई जैसा चाहते हैं, वैसा ही करें। एक कमरे के इस घर में मां की मौजूदगी में ही रोजाना यह हिंसा चलती रही, और मां ने बच्चियों को स्कूल से भी निकलवा दिया था ताकि वे स्कूल में किसी को यह बात न बता सकें। 
इस घटना को हिन्दुस्तान के अधिकतर लोग दरिंदगी, हैवानियत, और मानसिक बीमार परिवार जैसे लेबल लगाकर अनदेखा करना चाहेंगे कि दुनिया में ऐसे भी लोग होते हैं। लेकिन इस बात को कम ही लोग मानना चाहेंगे कि उनके आसपास भी, उनके बीच भी ऐसे लोग होते हैं। एक तरफ यह मामला नाबालिग बच्चियों के देह-शोषण का है और दूसरी तरफ यह मामला वर्जित संबंधों का भी है। भारत के अधिकतर हिस्से में, और दुनिया के भी अधिकतर समाजों में परिवार के भीतर जिन रिश्तों में देह संबंध वर्जित रहते हैं, उनमें भाई-बहन का संबंध सबसे ऊपर आता है। लेकिन यह सारी सामाजिक व्यवस्था, और ये प्रतिबंध इंसानी बदन बनने के करोड़ों बरस बाद हाल के हजार-दो हजार बरस के भीतर के हैं। प्रतिबंध सामाजिक हैं, और देह आदिम हैं। बदन और इंसान की सोच, उसकी देह की जरूरतें, इन सबका समाज व्यवस्था से अधिक लेना-देना नहीं रहता। जब तक किसी इंसान की बेबसी होती है, वे समाज व्यवस्था को मान लेते हैं, जब तक उनको ठीक लगता है, तब तक उसे मान लेते हैं। लेकिन जब इस व्यवस्था को तोड़कर, इससे परे जाकर अपने निजी सुख या फायदे की बात होती है तो लोग अपने-आपको सबसे पहले देखते हैं। 
मुम्बई की जिस खबर को लेकर हम आज यहां चर्चा कर रहे हैं, वह खबर जरूरत से कुछ अधिक भयानक जरूर है, लेकिन बहुत अनोखी नहीं है। छोटे पैमाने पर, दो-चार बार के देह-शोषण के मामले जगह-जगह परिवार के भीतर होते हैं। दो-चार दिन पहले ही खबर छपी है कि एक नाबालिग लड़की की शिकायत पर उसके पिता और चाचा को गिरफ्तार किया गया है जो कि रोज नशा करके उस बच्ची से बलात्कार करते थे, यह बरसों से चले आ रहा था। इस तरह देखें तो समाज में कोई भी वर्जित संबंध ऐसे नहीं हैं जिनको कि तोड़ा न जाता हो। समाज की व्यवस्था समाज की निगाहों के सामने तक कायम रह जाए, तो रह जाए। जहां समाज की निगाहों से परे की बात शुरू हुई, वहां समाज बनने के पहले का इंसानी मिजाज जागने लगता है। और हमारा मानना है कि हिंसा या जुर्म करने वाले लोगों को हैवान या पिशाच कहना नाजायज है, और निगाहें चुराना है। किसी ने न हैवान देखा है, न पिशाच देखा है। दरअसल लोगों को अपनी इंसानी बिरादरी की इतनी बुरी तस्वीर को हकीकत मानना बुरा लगता है, इसलिए लोग ऐसे कामों को इंसानियत मानने से मना कर देते हैं, और सिर्फ अच्छे कामों को इंसानियत मानते हैं। सच तो यह है कि बलात्कार से लेकर दूसरे हर किस्म के जुर्म तक, तमाम बातें इंसानियत का हिस्सा हैं। और जिस तरह लोग अपने चेहरे के बेहतर पहलू की तस्वीर खिंचवाना पसंद करते हैं, और बदशक्ल हिस्से को कैमरे के सामने नहीं आने देना चाहते, उसी तरह समाज और उसके इंसान महज अच्छी बातों को इंसानियत बताना चाहते हैं। 
जुर्म की कुछ बातें, कुछ खबरें बहुत तकलीफदेह होते हुए भी उनको थोड़ा सा जान लेना इसलिए ठीक होता है कि हमारा मन जिन बातों को इंसानी मानने को तैयार नहीं होता, वे तमाम बातें हाड़-मांस के इंसान ही किस तरह करते हैं, इसे देखना आईना देखने की तरह रहता है। समाज के भीतर, परिवार के भीतर, और दो लोगों के रिश्ते के भीतर, सिर्फ सावधानी ही एक गारंटी हो सकती है, और इसके अलावा इंसानी तन-मन से और कोई गारंटी नहीं मिल सकती। परिवारों के बीच वर्जित संबंधों को लेकर यह मान लेना निहायत गैरजिम्मेदारी और लापरवाही की बात होगी कि समाज के भीतर के नियम-कायदे सब जानते हैं, और वर्जित संबंधों के बारे में वे सोचेंगे भी नहीं। यह एक बड़ी खुशफहमी है, और जो समाज इसके तहत जितनी अधिक तसल्ली से जीता है, उसके बच्चे उतने ही अधिक हादसे झेलते हैं। आज जिन लोगों के साथ आपका जिंदगी भर का भरोसा हो, उनसे कभी अकेले में पूछकर देखें, कि क्या बच्चों का देह-शोषण, वर्जित संबंधों वाले जबर्दस्ती देह-संबंध क्या उन्होंने कभी देखे-सुने नहीं हैं, कभी भुगते नहीं हैं? तो शायद ईमानदार जवाब में हर किसी के कोई न कोई ऐसे तकलीफदेह तजुर्बे निकल आएंगे। 
हम मुम्बई के परिवार जितने खतरे की बात न करते हुए भी इतना तो कहना चाहते हैं कि हर परिवार को, अड़ोस-पड़ोस को, और समाज को इन बातों की तरफ से सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि ये पिशाच, ये हैवान हमारे भीतर ही हैं, समाज की व्यवस्था में इनके गले में एक जंजीर डाल रखी है, और जहां जंजीर जरा ढीली हुई कि बहुत से लोगों के भीतर ऐसे पिशाच-हैवान उठ खड़े होते हैं। भारत में बच्चों की शिकायतों को अनसुना-अनदेखा करके उन्हें झिड़ककर चुप कर देने का मिजाज लोगों में है। ऐसी बातों को दबा देने में ही घर-परिवार और समाज सबकी सहूलियत दिखती है। लेकिन ऐसी पहली शिकायत को अनदेखा करने का मतलब होता है कि मुजरिम को आगे दौडऩे के लिए एक खुला मैदान मिल जाए, और जुर्म करने के लिए अनगिनत और बच्चे मिल जाएं। बच्चे हों, या बड़े हों, ऐसे शोषण से बचाने के लिए  सबको सावधान रहने की जरूरत है, आसपास भी सावधानी, और अपने भीतर भी सावधानी। 

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