सच के बस हिज्जे ही सरल हैं

संपादकीय
19 अप्रैल 15

कनाडा की एक टेनिस खिलाड़ी यूगेनी एक अजीब बात के लिए खबरों में है। टेनिस मुकाबले शुरू होने के पहले यह एक पारंपरिक शिष्टाचार रहता है कि दोनों तरफ के खिलाड़ी एक दूसरे से हाथ मिलाकर शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन यूगेनी ने शुरू से लेकर अब तक हर मुकाबले के लिए अपनी यह नीति बनाकर रखी है कि वे सामने के खिलाड़ी को जीत के लिए शुभकामनाएं देने का काम नहीं करतीं। उनका मानना है कि इसके पीछे कोई दुर्भावना नहीं है, लेकिन वे इस बात पर भरोसा नहीं करतीं कि जिसके खिलाफ मुकाबला है उसे ही शुभकामना देना। वे कहती हैं कि वे मैच के बाद नतीजे चाहे जो हो, प्रतिद्वंदी से हाथ मिलाते हैं। हालांकि कनाडा की टेनिस-टीम के बाकी खिलाड़ी कुछ अलग सोचते हैं, और वे सामने के खिलाडिय़ों से हाथ मिलाने से परहेज नहीं करते।
ये बात जरा सी है, लेकिन आज की चर्चा के लायक इसलिए है कि भारत में लंबे समय से नैतिकता और ईमानदारी के ऊंचे पैमाने के बारे में यह कहा जाता है कि मन, वचन, और कर्म एक रहने चाहिए। जो मन में है वही कहा जाए, और जो कहा जाए, वही किया जाए। लोगों को कई बार यह सुनने या पढऩे मिलता है कि किसी की कथनी और करनी में फर्क है। ऐसे में कनाडा की इस खिलाड़ी का यह व्यक्तिगत फैसला दिलचस्प है, और एक किस्म की ईमानदारी है। 
जिंदगी में ऐसे कड़े फैसले बड़े मुश्किल होते हैं। साफगोई के नुकसान होते हैं, क्योंकि जब कोई ऐसा सच कहते हैं, जो कि दूसरों को पसंद न आए, तो उनके खिलाफ एक तनाव खड़ा होता है, और हिन्दुस्तान की आज की हवा देखें, तो उनके खिलाफ हिंसा और खतरा भी खड़े हो जाते हैं। फिर किसी संगठन या किसी दफ्तर की बात करें, तो वहां पर सच कहना चापलूसी के नर्म पुलाव के बीच कंकड़ की तरह खटकता है, और उसके नुकसान खासे बड़े होते हैं। किसी ढांचे में ऊपर पहुंचने के लिए चापलूसी को उसी किस्म से जरूरी माना जाता है, जिस किस्म से सरकारी दफ्तरों में फाईलों को आगे बढ़वाने के लिए हाथों पर चिकनाई लगाने की बात कही जाती है। यह माना जाता है कि सरकारी ढांचे के चक्के ऐसी चिकनाई की वजह से ही घूम पाते हैं, और इसके न रहने पर काम रूक जाता है। सच कहने की बात सुनने में अच्छी लगती है, बुद्ध से लेकर कबीर तक और गांधी तक भी सच की महिमा बार-बार कही गई है, लेकिन गांधी एक बहुत ही दुनियादार-व्यवहारिक थे, और उन्होंने सच पर जिद के साथ-साथ यह भी कहा था कि सच तो कहो, पर कड़वा सच मत कहो। 
अब सवाल यह उठता है कि अगर कोई सच कहना ही तय कर ले, तो फिर बात मीठी हो, या कड़वी, उसे कैसे न कहा जाए? और मीठी बात तो आमतौर पर चापलूसी की होती है, दिल में नफरत लिए हुए भी दो देशों के नेता गले मिल लेते हैं, और मिठाई से लेकर बिरयानी तक खाना-खिलाना हो जाता है, एक-दूसरे को शॉल का तोहफा देना हो जाता है, और इसके पीछे गांधी की नसीहत का वह आधा हिस्सा रहता है कि कड़वा सच न कहो। अब ऐसे में मन, वचन, और कर्म, इन तीनों के बीच एक ईमानदार तालमेल कैसे हो सकता है? जब दिल से लेकर जुबान तक कुनैन जैसी कड़वाहट भरी हुई हो, तो कोई महज मीठा-मीठा सच कैसे कह सकते हैं? कोई गांधी के बारे में, या नेहरू के बारे में, या गोडसे के बारे में महज अच्छा-अच्छा कहते हुए ईमानदार विश्लेषण कैसे कर सकते हैं? 
दरअसल, इंसान का मिजाज, और समाज का ढांचा पूरे सच के लायक बना हुआ नहीं है। एक परिवार का ढांचा भी पूरे सच के लायक नहीं है, और दो लोगों के बीच के निजी रिश्ते भी खालिस सच की आंच को नहीं झेल सकते। लोगों के मन में बाकी लोगों के बारे में जो है, वह अगर उजागर हो जाए, तो पल भर में दुनिया के शायद आधे या चौथाई रिश्ते टूट जाएं, अनगिनत सौदे टूट जाएं, समझौते चौपट हो जाएं। खालिस सच कुछ उसी किस्म का रहता है जैसे कि विकीलीक्स पर दुनिया के देशों के आपसी और गोपनीय संदेश का भांडाफोड़ हो गया, और लोगों के मन में हमेशा के लिए एक-दूसरे के लिए एक खटास पड़ गई। सच अधिकतर मामलों में दूध में पड़े दही के छींटे जैसा रहता है जो कि दिलों को दूध की तरह फाड़कर रख देता है। बहुत छोटे-छोटे से सच बहुत बड़ी-बड़ी जिंदगियों को खत्म कर सकते हैं, और दुनिया के बड़े-बड़े ढांचों को भूकम्प की तरह हिला सकते हैं, गिरा सकते हैं। खालिस सच को पचाना मुश्किल रहता है, और वक्त ऐसा है, इंसानी मिजाज ऐसा है कि एक खिलाड़ी मुकाबले में दूसरे को जीत के लिए शुभकामना देने का फर्जी काम न करे, तो भी वह खटकने लगती है। ऐसे में सच के बस हिज्जे ही सरल हैं।

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