परिवार में जितने लोग, उतना ही चावल सही

संपादकीय
1 अप्रैल 2015

छत्तीसगढ़ सरकार ने रियायती चावल को लेकर अब यह नया इंतजाम किया है कि परिवार के सदस्यों की संख्या के आधार पर लोगों को चावल कम या अधिक मिलेगा। अब तक एक परिवार के राशन कार्ड पर हर महीने 35 किलो रियायती चावल मिलता था, चाहे परिवार के सदस्य कितने ही हों। ऐसे में ये शिकायतें भी सामने आती थीं कि लोगों ने राशन के लिए परिवार अधिक गिना दिए थे, या फिर जिन परिवारों में एक-दो ही सदस्य हैं उन्हें भी उतना ही चावल मिलता था, जितना कि पांच-दस सदस्यों वाले परिवार को। अब परिवार के सदस्य अधिक होने पर चावल अधिक मिलेगा, और कम होने पर कम मिलेगा। 
राज्य सरकार की राशन की यह रियायत सबसे गरीब तबके को भी पेट भर खाना मिल सके, इसलिए शुरू की गई थी। और कई बरस पहले जब गरीबी की रेखा के नीचे के लोगों की शिनाख्त करनी थी, तब सुप्रीम कोर्ट की राय के मुताबिक राज्य सरकार ने केन्द्र और राज्य के कई अलग-अलग पैमानों में से किसी भी एक पैमाने पर गरीब साबित होने वाले लोगों को इस रियायत का फायदा देना शुरू कर दिया था। बाद के बरसों में जब सरकार ने लोगों की जांच करना शुरू की, तो पता लगा कि लाखों लोग ऐसे थे जो कि गरीब न रहते हुए भी फायदा पा रहे थे, और जब उनके राशन कार्ड रद्द होने शुरू हुए, तो लोगों की नाराजगी भी सरकार को झेलनी पड़ी। लेकिन बिना जांच अगर कोई रियायत मिलने लगी है, तो उसका जल्द से जल्द खत्म करना भी जरूरी है। राज्य सरकार का चावल का फैसला ठीक है, और इससे यह जरूर हो सकता है कि कुछ लाख परिवारों का चावल कम हो जाए, और कुछ लाख परिवारों का चावल बढ़ जाए। लेकिन कुछ लोगों को रियायत में अगर कमी भी होती है तो भी रियायत का तर्कसंगत और न्यायसंगत होना जरूरी है, क्योंकि सरकारी खजाना तो कुल मिलाकर जनता का ही है, और गैरजरूरी रियायत से प्रदेश के दूसरे काम रूकते हैं। लोगों को यह भी याद रखना चाहिए कि केन्द्र सरकार ने अभी पूरे देश के लोगों से यह अपील की है कि अगर वे बहुत जरूरतमंद नहीं हैं, तो वे रसोई गैस की सरकारी रियायत का फायदा न लें। 
लेकिन इस बारे में बात करते हुए यह भी याद रखने की जरूरत है कि आज पूरे प्रदेश में जिस नान-घोटाले की चर्चा चल रही है, और एंटी करप्शन ब्यूरो पूरे प्रदेश से चावल के नमूने इक_े कर रहा है, उससे यह साबित होने जा रहा है कि गरीबों के लिए भेजे गए, और भेजे जा रहे चावल में कनकी और उससे भी बारीक चूरा मिला हुआ रहता था, रहता है, और इसी भ्रष्टाचार का हिस्सा-बांटा सरकारी छापे में सामने आया है। इसी तरह नमक में भ्रष्टाचार पकड़ाया है कि उसमें जितना आयोडीन होना चाहिए था, वह नहीं था, और उसमें बड़ा भ्रष्टाचार चल रहा था। एक वक्त नमक को लोगों की ईमानदारी से जोड़कर देखा जाता था, क्योंकि किसी इंसान के खाने में सबसे कम लागत का सामान नमक ही रहता था, आज भी रहता है। ऐसे में राज्य सरकार ने गरीबों को मुफ्त नमक देने की जो योजना बनाई थी, उस अमृत नाम के नमक में भी जब बेईमानी होने लगी, तो उसके लिए शब्दकोष में एक बड़ा आसान सा शब्द है, नमकहराम। लोगों ने नमक तक को नहीं छोड़ा था। 
आज जब हम राज्य सरकार की नई रियायती चावल नीति को सही ठहरा रहे हैं, तो इसी वक्त हम सरकार के ईमानदार अमले से यह उम्मीद भी करते हैं कि गरीबों के सामान में लूटपाट बंद करने की कोशिश करें। सरकार में बहुत से लोग हमेशा ही ईमानदार रहते हैं, और उनको अपनी ताकत लगाकर ऐसी बेईमान को रोकने में सबसे पहले मेहनत करनी चाहिए, जिसकी मार सबसे गरीब तबके पर सबसे अधिक पड़ती है। राज्य सरकार के पास अब भी अपने इंतजाम को सुधारने की बहुत गुंजाइश है। एक वक्त छत्तीसगढ़ का पीडीएस पूरे देश में और विदेशों में भी मशहूर था। उसी विभाग और उसी योजना में इतना बड़ा संगठित भ्रष्टाचार राज्य के खजाने के साथ-साथ राज्य की साख के लिए भी खराब है, और इस पर तुरंत कड़ाई से कार्रवाई करनी चाहिए। 

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