जब गाडिय़ों का हॉर्स पॉवर दिमाग पर चढ़ जाता है...

6 अप्रैल 2015
संपादकीय
दिल्ली में एक कार को मोटरसाइकिल ने छू दिया, तो कार सवारों ने उतरकर बाईक सवार आदमी को उसके बच्चों के सामने ही सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला। इस खबर से विचलित हम सुबह से इस पर लिखने की सोच ही रहे थे कि छत्तीसगढ़ के सरगुजा में जशपुर के भूतपूर्व शाही घराने के आज के भाजपा सांसद के भाई विक्रमादित्य सिंह जूदेव के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज हुई है कि उसने अपनी बड़ी सी गाड़ी से एक स्कूल संचालक को बुरी तरह कुचला, और फरार हो गया। ऐसी भी खबर है कि जख्मी स्कूल संचालक की जिंदगी खतरे में है, या वह गुजर गया है। 
जिन लोगों के हाथ सत्ता, ओहदे, पैसे, या मशीनी इंजन की ताकत होती है, उनमें से बहुत से लोगों में यह ताकत दिमाग तक चढ़ जाती है। यह आमतौर पर दिखता है कि सड़कों पर जो लोग जितनी बड़ी और जितनी ताकतवर गाड़ी लेकर चलते हैं, उनके बर्ताव में बाकी तमाम लोगों के खिलाफ एक परले दर्जे की हिंसक हिकारत पैदा होने लगती है। मशीन का हॉर्स पॉवर कुछ लोग अपने दिमाग पर चढऩे से रोक पाते हैं, लेकिन अधिकतर लोग इसके शिकार हो जाते हैं। ऐसा शायद ही कोई दिन रहता हो जब सत्ता या ताकत की किसी और शक्ल के बेजा इस्तेमाल की खबर न आती हो। और दिल्ली में जो हुआ वह तो किसी अनजान से एक्सीडेंट के बाद के तनाव के चलते हुआ, लेकिन छत्तीसगढ़ के सरगुजा में जो हुआ है, वह तो भूली-बिसरी शाही ताकत से उपजी बददिमागी का एक नमूना दिखता है, और पुलिस मामला दर्ज करके जशपुर-घराने के इस नौजवान की तलाश कर रही है। 
दरअसल भारत में जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा, हाईवे बढ़े, सड़कें चौड़ी हुईं, और गाडिय़ां बड़ी-बड़ी होती गईं, वैसे-वैसे लोगों में फासला बढ़ते चला गया। आज ताकतवर अमीर और पैदल या साइकिल वाले गरीब के बीच में इतना बड़ा फर्क रहता है कि प्रशासन या पुलिस भी इस फर्क को दूर नहीं कर सकते। लोगों को पैदल और साइकिल के लिए बेहतर इंतजाम का हक है, लेकिन शहरी ढांचा बड़ी गाडिय़ों के हिसाब से ही बनते चल रहा है। फिर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में हम लगातार देखते हैं कि किसी भी तरह की ताकत का एक हिंसक प्रदर्शन सड़कों पर होता है, और बाकी जनता के हकों के लिए ताकतवर दिमागों में भयान हिकारत रहती है। हालांकि जशपुर की यह ताजा हिंसा सड़कों की आम हिंसा से बहुत अधिक भयानक है, और उसमें सत्तारूढ़ पार्टी की बददिमागी के साथ-साथ पुरानी सामंती बददिमागी मिली हुई दिख रही है। 
कल देश के तमाम दिग्गज जज मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री के साथ बैठकर अदालती कामकाज में सुधार पर बातचीत कर रहे थे। एक बात यह भी निकलकर आई कि निचली अदालतों में गए हुए तमाम मामले पांच बरस के भीतर निपटा लेने की कोशिश होनी चाहिए। आज ही अखबार में यह भी खबर है कि किस तरह फिल्म अभिनेता सलमान खान के तेरह बरस पुराने सड़क हादसे के मामले में अब तक गवाही का दौर ही चल रहा है। सलमान की कार से फुटपाथ पर सोए हुए लोग कुचलकर मर गए थे, और पुलिस और अदालत इस खुले हुए केस में अब तक कोई इंसाफ नहीं दे पाए हैं। आज भी यह नया बयान सामने आया है कि सलमान के ड्राइवर ने एक्सीडेंट का दोष अपने ऊपर लिया है। अब अगर ताकतवर लोगों की ताकतवर गाडिय़ों से होने वाली मौतों के मामले दस-पन्द्रह बरस तक अगर निचली अदालत में ही पड़े रहेंगे, तो देश की आखिरी अदालत से इंसाफ या बेइंसाफी होने तक तो लोगों की जिंदगियां ही गुजर जाएंगी। 
यही वजह है कि इस देश में लोगों को लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा नहीं रह गया है, और जिन लोगों में हौसला रहता है, खोने को कुछ नहीं रहता है, वे लोग हथियार उठा लेते हैं। 

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