सामंती परंपराएं जनता पर बोझ, खत्म होनी चाहिए

18 अपै्रल 15
संपादकीय

महाराष्ट्र सरकार ने अंगे्रजों के समय से चली आ रही एक परंपरा को खत्म किया है कि मंत्रियों और बड़े अफसरों के जिलों में जाने का वहां उन्हें सलामी गारद द्वारा सलामी दी जाए। इसे एक फिजूलखर्ची मानते हुए सादगीपसंद मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने कहा है कि साधनों की ऐसी बर्बादी का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने हाल ही में तथाकथित अतिमहत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में भी कटौती की है। 
यह बात, और इस तरह की कई दूसरी बातों को पूरे देश में लागू करने की जरूरत है। कल छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी आए, और कई घंटों तक कई सड़कों को उनके लिए बंद कर दिया गया, और कोई वैकल्पिक रास्ता भी तय नहीं किया गया। ऐसे में जनता भरी धूप तले बेहाल हो गई। अभी कुछ हफ्ते पहले ही मध्यप्रदेश में एक जुलूस के चलते रास्ते बंद थे और अस्पताल पहुंच पाने के पहले ही इस टै्रफिक जाम में फंसे हुए एक इंजीनियर ने दम तोड़ दिया। अब इसके खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका लगाई गई है और हाईकोर्ट में सरकार और पुलिस से इस पर जवाब मांगा है। 
भारत में संवैधानिक संस्थाओं और उन पर काबिज लोगों को लेकर सरकार और उन लोगों का खुद का भी नजरिया सामंतवाद से बाहर नहीं निकल पा रहा है। सलामी गारद तो एक किस्म की बर्बादी है, हम राज्यपाल के कार्यक्रम में राष्ट्रधुन बजाने के लिए बस पर लदकर आते-जाते पुलिस बैंड को देखते हैं जिसके दर्जन भर से अधिक लोग सिर्फ यही काम करने के लिए रखे गए हैं। राजभवनों और राष्ट्रपति भवन का तामझाम जरूरत से कई गुना अधिक रहता है, और राष्ट्रपति के अंगरक्षकों का घुड़सवार दस्ता भाले लेकर कुछ इस तरह ठुमकते हुए चलता है कि मानो वह अकबर की रक्षा कर रहा हो। अंगे्रज चले गए, और शोषण-बर्बादी की ये परंपराएं हिंदुस्तानियों के लिए छोड़ गए जो कि आज तक उन्हें ढो रहे हैं। अंगे्रजी सामंत का आतंक इतना है कि इस गर्म देश में जजों और वकीलों, रेलवे के टिकट निरीक्षक और गार्डों के बदन पर से काला कोट हटाते हुए हिंदुस्तान डरता है कि मलिका विक्टोरिया कहीं नाराज न हो जाए। 
देश में जगह-जगह जनहित याचिकाएं लगाने की जरूरत है, कि कुपोषण के शिकार बच्चों वाले इस देश में इस तरह की बर्बादी एक बड़ी हिंसा है, जिसका मजा कार्यपालिका, न्यायपालिक, और विधायिका, सभी पर सवार लोग लेते हैं। गाडिय़ों के काफिले, सायरन और लालबत्तियां, इन सबका सिलसिला खत्म करना चाहिए। ताकतवर ओहदों के बंगलों पर पुलिस के लोग चपरासियों जैसा काम करने में जोत दिए जाते हैं, जो कि उनके मनोबल के लिए भी खराब है, और विभाग की क्षमता की बर्बादी भी है। ऐसा करने वाले लोगों को राजघाट और गांधी प्रतिमा पर फूल चढ़ाने का हक भी नहीं रहना चाहिए। 
प्रणब मुखर्जी ने अपने नाम के साथ महामहिम लिखवाना बंद करवाया, तो उन्हें देखकर राज्यपालों ने भी ऐसा किया। अब छत्तीसगढ़ के राज्यपाल ने अपने लिए ट्रैफिक को रोकने पर नाराजगी दिखाई, जनता से माफी मांगी, तो इसका असर नीचे भी जाना चाहिए। इसके अलावा दूसरी गैरजरूरी सामंती परंपराएं खत्म भी होनी चाहिए जो कि जनता पर बोझ  हैं। 

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