हर बरस हजारों करोड़ की टालने लायक बर्बादी

27 अप्रैल 2015
संपादकीय

जब दूसरी जगहों पर बड़े-बड़े हादसे होते हैं, तब लोगों को अपने आसपास के छोटे-छोटे हादसों और छोटी-छोटी मुसीबतों की गंभीरता कम लगने लगती है। छत्तीसगढ़ देश के बीच ऐसी जगह बसा हुआ है कि यहां समुद्री तूफान नहीं आता, भूकम्प से तबाही भी नहीं होती, बाढ़ भी जानलेवा नहीं होती, और कुदरत की किसी और तरह की मार भी बहुत जोरों की नहीं पड़ती। नतीजा यह होता है कि यहां पर छोटे-छोटे खतरों से लोग बेफिक्र हो जाते हैं। अभी एक पखवाड़े से रोज खबरें छप रही हैं कि मोबाइल फोन कंपनियां किस तरह से बिना इजाजत सार्वजनिक जगहों पर खतरनाक टॉवर लगाए जा रही हैं, न भुगतान, न इजाजत, और न खतरे का अंदाज। और इस तरह के काम बहुत सी निजी कंपनियां कर रही हैं, और उन पर कोई रोक नहीं है। हर कुछ महीनों में बड़ी बुरी आंधी आती है और इमारतों पर लगे हुए बड़े-बड़े होर्डिंग्स से सिंथेटिक फ्लैक्स के चीथड़े उड़कर बिजली के तारों से लिपट जाते हैं, होर्डिंग्स तारों पर गिर जाती हैं, और घंटों तक बिजली बंद रहती है। लेकिन दस-बीस बरस से हम ऐसे हर मामले के बाद म्युनिसिपल और प्रशासन की तरफ से चेतावनियां सुनते हैं, जिन पर अमल आज तक कभी देखने नहीं मिला। अब यह सुनने मिल रहा है कि शहर के बीच से बनी एक नई रोड को होर्डिंग्स से मुक्त रखा जाएगा, मानो उसी एक सड़क को खूबसूरत बनाना है, उसी एक सड़क को खतरे से दूर रखना है। 
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थानीय प्रशासन और म्युनिसिपल का, सरकार के विभागों का जो हाल है, जाहिर है कि प्रदेश के बाकी शहरों में उससे बेहतर तो नहीं हो सकता। रोजाना अखबारों में अलग-अलग विभागों की खबरें छपती हैं, तस्वीरों सहित सुबूत छपते हैं, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती और बरस-दर-बरस वही हाल जारी रहता है। ऐसे में सरकार के अंधाधुंध खर्च की उपयोगिता पर भी सवाल उठता है, और यह भी लगता है कि जिस शहर में राज्यपाल-मुख्यमंत्री से लेकर तमाम मंत्रियों और प्रदेश के आला अफसरों की इतनी बड़ी बसाहट है, वहां भी अगर सरकारी कामकाज की खामियां मीडिया में सामने आने के बाद काबू नहीं आतीं, तो फिर और किस जगह उन पर काबू हो सकेगा? 
कई सरकारी अहातों के बारे में पिछले बरसों में ऐसी खबरें सरकारी अफसरों के बयानों के साथ छपी हैं कि कहीं भी कोई भी इमारत बननी शुरू हो गई, उसकी योजना नहीं है, उसकी इजाजत नहीं है, और उसे तोडऩे की नौबत आ सकती है। करोड़ों के खर्च से काम शुरू होते हैं, फिर उनको तोड़ दिया जाता है, फुटपाथ की जगह सड़क, और सड़क की जगह डिवाइडर का सिलसिला इस राजधानी में राज्य बनने के बाद से कुछ ऐसा चल रहा है कि मानो स्कूल का कोई बच्चा स्लेट-पट्टी पर चॉक से लकीरें खींचकर मिटा रहा हो। जनता का इतना बड़ा पैसा दीवारों को बनाने और गिराने पर खर्च हो रहा है, सड़कों को बनाने, और फिर उनके नीचे पाईप डालने के लिए उनको तोडऩे पर खर्च हो रहा है। बार-बार सड़कों की चौड़ाई कम या अधिक होती है, और डिवाइडर की जगह बदल जाती है, फुटपाथों की जगह बदल जाती हैं। कभी वहां पेवमेंट ब्लॉक लगाए जाते हैं, और फिर जल्द ही उनको हटाकर कांक्रीट कर दिया जाता है। 
म्युनिसिपल से लेकर राज्य सरकार तक, और आरडीए से लेकर हाउसिंग बोर्ड तक, अनगिनत पढ़े-लिखे इंजीनियर हैं, लेकिन जो हमारी मामूली समझ में खामियां दिखती हैं, उनको मानो सरकार में बैठे लोग सोच-समझकर, जान-बूझकर अनदेखा करते हैं, क्योंकि बड़े-बड़े निर्माण में, और बड़ी-बड़ी तोडफ़ोड़ में बड़ी-बड़ी दिलचस्पियां जुड़ी रहती हैं। देश के बहुत से शहरों में कांक्रीट के उठाए जाने वाले ऐसे ढांचे बनाए जाते हैं, जिनको कहीं भी रखकर सड़क का डिवाइडर बनाया जा सकता है, और बाद में क्रेन से उठाकर हटाया जा सकता है। लेकिन ऐसी मामूली सी बात भी छत्तीसगढ़ में आज तक इस्तेमाल नहीं हुई है। इन तमाम लापरवाहियों में राज्य के हजारों करोड़ हर बरस बर्बाद हो रहे हैं, और जनता के किसी जागरूक मंच को सरकार के सामने जोरों से इन मुद्दों को उठाना चाहिए। राज्य में विपक्ष ऐसी बातों को देखने के बजाय एक-दो मुद्दों को रोज एक सीडी की तरह बजा रहा है। 

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