पिछली सरकार हो, या मौजूदा किसानी-खुदकुशी जारी है...

23 अपै्रल 2015
संपादकीय

किसानों की आत्महत्या बहुत बुरी तरह खबरों में है। और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहे पूरी दुनिया में अपनी वाहवाही करवाकर आ जाएं, घर पर जो शर्मिंदगी रास्ता देख रही है, उससे पीछा छुड़ाना नामुमकिन है। लेकिन मोदी को अभी साल भर के भीतर ही प्रधानमंत्री बने हैं, किसानों की आत्महत्या तो उनके आने के पहले से, और उनकी पार्टी के राज के बाहर भी जगह-जगह बरसों से चली आ रही है। लगातार कांगे्रस राज वाले महाराष्ट्र में जितने बड़े पैमाने पर आए दिन एक गांव या दूसरे कस्बे में किसान आत्महत्या करते आए हैं, उससे तो मनमोहन सिंह तक की खासी बदनामी हो रही थी कि देश पर उनका राज, और महाराष्ट्र पर उनकी पार्टी का राज, और उसके बाद भी मौतों के थमने का नाम नहीं। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ जैसा राज्य है जिसने पिछले कुछ बरसों से किसानों की आत्महत्या, और किसानी से जुड़ी हुई वजहों की वजह से आत्महत्या में पुलिस-रिकॉर्ड के स्तर पर अब बरसों से एक भी किसान की आत्महत्या दर्ज नहीं हुई है, यह एक अलग बात है कि किसानी से जुड़े मुद्दे पर आत्महत्या की खबर छत्तीसगढ़ में आती भी नहीं है।
लेकिन महाराष्ट्र और आंध्र जैसे राज्य जहां पर बड़े पैमाने पर किसान खुदकुशी कर रहे हैं, खेती के कर्ज को लेकर, कुदरत की मार से खेती खराब होने को लेकर खुदकुशी हो रही है, वहां पर सरकार भी ऐसे हादसों की खबरों को फर्जी नहीं बता रही है, और वहां मुसीबतजदा किसानों को बचाना आज पूरे देश की समस्या है। और जिस तरह भारत की खेती की अर्थव्यवस्था है, उसमें जितना भरोसा किसी फसल के अच्छे या बुरे होने का होता है, उतना ही भरोसा किसान की जिंदगी का रहता है। केंद्र सरकार चाहे वह कांगे्रस की रही हो, चाहे आज भाजपा की हो, उसकी झोली में सिर्फ कारखानेदारों और कारोबारियों के लिए रियायतें हैं। किसानों के लिए तो न वाजिब दाम है, और न ही किसानी के लिए वैसी छूट हैं, जैसे कि फौलादी कारखानों को मिलती हैं। नतीजा यह है कि इस देश को अनाज के मामले में आत्मनिर्भर बनाने वाला किसान-तबका मौत की कगार पर जीता है, और अगर मौसम की मार न हुई, कीड़ों का हमला न हुआ, तो उसे मानो एक बरस और जिंदगी मिल जाती है।
देश में लोगों का नजरिया यह है कि कारें तो पांच लाख के बजाय दस लाख की ली जाएं, टीवी तो बीस इंच के बजाय चालीस इंच का लिया जाए, स्मार्ट फोन पच्चीस हजार के बजाय पचास हजार का लिया जाए, और हर बरस बदल भी लिया जाए, लेकिन किसान की उपज का दाम अगर बढ़ता है, तो उस महंगाई की आग में ताकतवर तबके भी सुलगने लगते हैं, झुलसने लगते हैं। सरकारें खेती को मिलने वाली बड़ी छोटी-छोटी सी रियायतों को खत्म करने की कोशिशों में लगी रहती हैं, और देश में फिजूलखर्ची बाकी तमाम गैरजरूरी मोर्चों पर जारी रहती है। किसान के लिए सरकार और समाज दोनों के नजरिए में मौत इसलिए है कि दोनों ही यह समझते हैं कि किसान के बिना काम चल सकता है, बड़े पैमाने पर अनाज का आयात करने में सत्ता के दर्जनों लोग अरबपति-खरबपति बन जाते हैं। देश में अपनी जरूरत की खेती हो, या न हो, इसका बोझ किसान पर इस तरह डाल दिया जाता है कि हरितक्रांति में कुर्बानी देना अकेले किसान की जिम्मेदारी है। और पिछली मनमोहन सरकार से लेकर आज की मोदी सरकार तक इन सबकी प्राथमिकता में खेतों की जगह कारखाने हैं और ऐसी आर्थिक सोच में किसान राह के रोड़े के अलावा और कुछ नहीं है। किसानों का मुद्दा एक राजनीतिक मुद्दा बना लिया गया है, जबकि यह देश का आर्थिक मुद्दा रहना चाहिए। बहुत कम लोगों को इस बात का अंदाज होगा कि आज धीरे-धीरे करके भारत में पोल्ट्री, मछली, और गोश्त का कारोबार अनाज की उपज को पार कर गया है। बहुत से जानकारों को ऐसी आशंका है कि भूमि अधिग्रहण का नया कानून शायद बाकी किसानों को भी जगह-जगह मौत की तरफ धकेलेगा।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें