अदालती सुधार की बड़ी-बड़ी बातों के बीच कुछ छोटी बातें

संपादकीय
5 अप्रैल 2015
देश के मुख्य जजों की एक कांफ्रेंस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने खासा लंबा भाषण दिया और जजों की तारीफ करते हुए उनके महत्व और उनके सामने की चुनौतियों पर बहुत कुछ कहा। यह कांफ्रेंस आज देश के सभी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों और सभी मुख्यमंत्रियों के साथ थी, और वैसे अदालती कामकाज में सुधार लाया जाए इस पर बात अभी जारी है।  देश में पहले दिन न्यायिक सुधार के लिए आयोग बन चुके हैं और उनकी रिपोर्ट धूल खाते दशकों से पड़ी हुई है।
 लेकिन मुद्दा यह नहीं है कि भाषण में कौन क्या कहते हैं, मुद्दा यह है कि देश की सीमित अदालती क्षमता का इस्तेमाल आज किन बातों में हो रहा है, और क्या अदालती क्षमता को बढ़ाने की सोच जनता की कमर तोडऩे की कीमत पर नहीं होगी? आज देश की तकरीबन सभी अदालतों में ऐसे मामलों की भरमार है जिनमें केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय संस्थाएं, या सरकारी सार्वजनिक उपक्रम अदालती कटघरों में खड़े हुए हैं। जब सरकार हांकने वाले लोग ही ऐसे काम करेंगे कि उनके खिलाफ मुकदमे चलते रहें, तो जाहिर है कि अदालतों की ताकत का एक बड़ा हिस्सा इन लोगों पर खर्च हो रहा है। फिर अदालत की ताकत का एक दूसरा बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों पर खर्च होता है जो कि पैसों की ताकत रखते हैं, महंगे वकील करते हैं, सुबूत और विशेषज्ञ जुटाते हैं, और बरसों तक अदालतों को किसी नतीजे पर नहीं पहुंचने देते। अब जिस देश में सुप्रीम कोर्ट इस बात पर दर्जनों बार सुनवाई कर चुका है कि सुब्रत राय सहारा को जेल में कितनी सहूलियतें कितने दिनों तक दी जाएं, कितना बड़ा दफ्तर दिया जाए, इंटरनेट दिया जाए या न दिया जाए, वहां पर आम लोगों के हितों से जुड़े हुए मामलों के लिए सुनवाई का वक्त कैसे निकलेगा? जहां पर एक-एक फिल्मी सितारे के मामलों की सुनवाई के लिए देश के सबसे दिग्गज वकील भीड़ बनाकर अदालत पर दबाव बनाते हैं, वहां पर व्यापक जनहित के मामलों की तारीखें बढ़ते चले जाना तय है। 
फिर अदालत तारीखों को बढ़ा-बढ़ाकर एक ऐसी नौबत ला देती है जिसमें बेकसूर शिकायतकर्ता का हौसला टूट जाता है, और मुजरिम मजे में घूमते रहता है। हिन्दुस्तान में आजादी की करीब पौन सदी बाद भी लोग आज तक यह कहते हैं कि भगवान कोर्ट-कचहरी से बचाए। यह नौबत पूरे देश में नीचे से लेकर ऊपर तक की अदालतों में आम है, और अगर लोगों के पास मुकदमेबाजी में खर्च करने के लिए बहुत सारा पैसा नहीं है, तो इंसाफ तक के लंबे सफर में वे बीच में ही दम तोड़ देते हैं। यह सिलसिला जब तक नहीं बदलेगा, तब तक कई किस्म की नई अदालतें खड़ी करने से कोई सस्ता इलाज नहीं मिलेगा। हर नई अदालत जनता पर बोझ बनकर आएगी, और यह नौबत इस गरीब देश के लिए ठीक नहीं है। इलाज तो अदालती तौर-तरीकों को चुस्त-दुरूस्त और ईमानदार बनाने से ही आएगा। आज आम जनता का अनुभव यह है कि जांच एजेंसियों से लेकर वकीलों तक, गवाहों से लेकर सुबूतों तक, और जजों तक, किसी न किसी स्तर पर खरीदी की एक संभावना निकल आती है, और ताकतवर लोग इंसाफ या फैसले को अपने पक्ष में करवा लेते हैं। 
आज जरूरत है बाकी तमाम बातों को करने के साथ-साथ अदालतों में तारीखों को बढ़ाने और बढ़वाने के अंतहीन सिलसिले को खत्म करने की। अगर अदालती इंसाफ, या बेइंसाफ भी, वक्त पर नहीं आता, तो उससे जनता का भरोसा खत्म हो जाता है। जो बातें हम कर रहे हैं, वे देश की इस सबसे बड़ी न्याय-कांफ्रेंस में इतनी खुलकर नहीं हो पाएंगी, लेकिन अदालतों के जानकार हर कोई यह जानते हैं कि हकीकत इससे भी बहुत बुरी है। हर संस्था अपने ढांचे को बढ़ाना चाहती है, और भारत की अदालतें भी इससे अलग नहीं हैं। लेकिन इतनी ही क्षमता को बेहतर इस्तेमाल करके, बदनीयती से तारीखें बढ़वाने का सिलसिला खत्म करके नीचे से ऊपर तक के जज इंसाफ को तेज रफ्तार कर सकते हैं। इसके साथ-साथ एक बात यह भी जरूरी है कि अदालतों में भ्रष्टाचार की बहुत ही स्पष्ट जनधारणा है, और इस बुराई को खत्म करने के बारे में भी भारतीय न्यायपालिका को अपने विशेषाधिकार छोड़कर, अपने को पारदर्शी बनाकर रास्ता निकालने के बारे में सोचना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें