अधिकतर आबादी के लिए पढ़ाई यानी कुंजिका-गाईड

संपादकीय
31 मई 2015
स्कूली परीक्षाओं के नतीजों, और कॉलेज के इम्तिहानों के इस दौर में आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने मन की बात में इम्तिहान में नाकामयाब होने वाले बच्चोंं का हौसला बढ़ाया। दूसरी तरफ अमरीका से आई एक खबर बताती है कि किस तरह वहां पिछले साल आठ हजार से अधिक चीनी छात्र-छात्राओं को कॉलेज से निकाल दिया गया क्योंकि वे नकल कर रहे थे, या लापरवाह थे, पढऩे-लिखने में कमजोर थे, या इसी तरह की कुछ और बातें थीं। भारत में अगर अमरीका जैसे पैमाने को लागू किया जाए, तो आधे लोगों को स्कूल-कॉलेज से निकाल देना पड़ेगा। लेकिन दूसरी तरफ अगर स्कूल-कॉलेज में पढ़ाने वालों का इम्तिहान लिया जाए, तो शायद उनमें से भी आधे लोगों को निकाल देना पड़ेगा। लोगों को याद होगा कि अभी दो हफ्ते पहले ही जम्मू-कश्मीर में एक स्कूल-शिक्षक को गाय पर निबंध लिखने को कहा गया, और वह कुछ भी नहीं लिख पाया। इंटरनेट पर ऐसे कई वीडियो तैरते हैं जिनमें उत्तर भारत की किसी स्कूल की शिक्षिका एबीसीडी के 26 अक्षर भी नहीं लिख पातीं, या मामूली सा जोड़-घटाना भी नहीं लिख पाती। देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का नाम भी शायद आधे शिक्षकों को पता नहीं होगा। 
लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारें इस बात से बेफिक्र हैं कि शिक्षा का स्तर कहां जा रहा है। सरकारी ढांचा कितना इस्तेमाल हो रहा है, किताबों का क्या हाल है, शिक्षकों के अपने ज्ञान का क्या हाल है? पढ़ाने की डिग्री देने वाले जो कोर्स हैं, वैसे बीएड या एमएड जैसे कोर्स महंगी रिश्वत लेकर हाजिरी देने और इम्तिहान में पास करवाने का ठेका लेते हैं। सबकी जानकारी में, राज्यों की राजधानियों से लेकर देश की राजधानी तक हर किसी को यह मालूम है कि पढ़ाने की पढ़ाई के नाम पर कैसी जालसाजी चलती है, और फर्जी तरीके से डिग्री पाकर लोग सरकारी नौकरियां पा लेते हैं, और शहरों से दूर अगर पोस्टिंग हुई, तो लोग गांव के किसी बेरोजगार को अपना काम ठेके पर दे देते हैं, और खुद शहर में रहकर तनख्वाह लेते रहते हैं। 
भारत में प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा के बाद के शोध कार्य कर का स्तर इतना नीचा और इतना कमजोर है, कि यहां की अधिकतर आबादी पढऩे के बाद दुनिया के विकसित और सावधान देशों के मुकाबले रोजगार के बाजार में कहीं नहीं टिक सकती। जिन लोगों को यह लगता है कि भारतवंशी लोग पूरी दुनिया पर छाए हुए हैं, उनको भारत की आबादी के अनुपात में दुनिया के देशों में गए हुए भारतीयों को देखना चाहिए कि वे कितने गिने-चुने हैं। और फिर बहुत से देशों में तो हिन्दुस्तानी लोग महज मजदूर की तरह जाते हैं, और बंधुआ की तरह रहते हैं। अमरीका और योरप के देशों में जाकर कामयाब काम करने वाले जो हिन्दुस्तानी हैं, उनसे अधिक संख्या में कामयाब लोग बड़े छोटे-छोटे देशों से निकलकर दुनिया भर में जाते हैं। 
स्कूलों से लेकर कॉलेज की पढ़ाई तक आज जो हाल है, वह परीक्षा-केन्द्रित है। बच्चों को एक के बाद दूसरे इम्तिहान के लिए तैयार किया जाता है, एक के बाद दूसरे मुकाबले के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन ज्ञान को लेकर किसी को फिक्र नहीं है।  छात्र-छात्राओं की गरीब आबादी पाठ्य पुस्तकों के बजाय कुंजिकाओं और गाईड के सहारे परीक्षा पास करती हैं, और पैसे वाली आबादी कोचिंग सेंटरों में जाकर खर्च करके। अब पिछले एक बरस से केन्द्र सरकार के पढ़ाई वाले मानव संसाधन मंत्रालय में एक के बाद एक कई ऐसे फैसले हो रहे हैं, जो शिक्षा को और बुरा करने जा रहे हैं। खुद सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर यह बात जोर पकड़ रही है कि मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की समझ बड़ी सीमित है। 
स्कूल-कॉलेज, खासकर कॉलेज की किताबों के बाजार को देखें, तो वहां पर गरीबों के बीच प्रचलित पाठ्यक्रमों की किताबें बिकना बंद हो चुकी हैं, और छात्र-छात्राओं के बीच सिर्फ कुंजिकाओं और गाईड का चलन रह गया है। सिर्फ उन्हीं के सहारे इम्तिहान की तैयारी उतनी ही आम बात है जितनी आम बात हिन्दुस्तानियों का पान-गुटखा खाना है। अब कॉलेजों से नीचे स्कूलों में भी यही हालत बिखरती जा रही है। लेकिन इस व्यापक मुद्दे पर इस थोड़ी सी जगह में चर्चा करते हुए हम यह भी याद दिलाना चाहते हैं कि देश भर में शिक्षा का जो हिस्सा, स्कूल-कॉलेज के कामकाज का जो हिस्सा राज्य सरकारों के जिम्मे आता है, उनमें भी बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के चलते हुए पढ़ाई प्राथमिकता की सूची में आखिर में आती है। स्कूल-कॉलेज के जिन पहलुओं पर मोटा खर्च हो सकता है, और मोटी कमाई हो सकती है, वे पहलू सबसे अधिक महत्व पाते हैं। कतरा-कतरा इन कई बातों को मिलाकर एक बड़ी निराशाजनक तस्वीर बनती है, और यह तस्वीर किसी भाषण से, मन की किसी बात से सुधरने वाली नहीं है। आज भारत के अधिकतर लोगों के लिए बेहतर पढ़ाई-लिखाई के लिए कोई बड़ा उत्साह नहीं रह गया है। आबादी का एक छोटा हिस्सा ही पढ़ाई के बाद उसका कोई फायदा पा रहा है, और यह एक बड़ी फिक्र की बात है। 

आईआईटी में यह लड़ाई महज विचारों की आजादी की लड़ाई नहीं है, बल्कि...

संपादकीय
30 मई 2015

मद्रास आईआईटी के छात्रों को एक संगठन पर वहां के मैनेजमेंट ने कार्रवाई की है क्योंकि दलित छात्रों का यह संगठन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना कर रहा था। इस संगठन की मान्यता खत्म कर दी गई है। और इसे लेकर केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी और कांग्रेस पार्टी के बीच काफी बहस छिड़ी हुई है। लेकिन राजनीतिक दलों से परे एक जो गंभीर बात उठ रही है, वह यह कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत आईआईटी जैसे संस्थान के बालिग हो चुके छात्र-छात्राओं को प्रधानमंत्री की आलोचना का हक नहीं है? 
अभी एक अमरीकी मीडिया संस्थान ने भारत के, और भारत में काम कर रहे विदेशी लोगों में से चुनिंदा आधा दर्जन लोगों से मोदी सरकार के एक साल के कामकाज पर उनकी राय ली थी। नंबरों के आधार पर नतीजा यह निकला अभिव्यक्ति की आजादी पर मोदी सरकार को सबसे कम नंबर मिले, दस में से शायद तीन, और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर मोदी को सबसे अधिक नंबर मिले। यह बात देश के उदार विचारधारा के लोगों के बीच, बुद्धिजीवी कहे जाने वाले तबके के बीच, सामाजिक संगठनों के लोगों के बीच जोरों से उठ रही है कि मोदी सरकार के आने के बाद से आलोचना को बर्दाश्त करना कम हो गया है, और लोग मुंह खोलने में डरने लगे हैं। लेकिन हम मद्रास आईआईटी के इस मुद्दे को लेकर बहस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तरफ ले जाने के बजाय इसके एक दूसरे पहलू पर बात करना चाहते हैं जो कि आज बहस में किनारे कर दिया गया है। 
यह वही मद्रास शहर है जहां पर हाईकोर्ट के वकीलों ने मोदी सरकार, और भाजपा के राज्यों द्वारा जगह-जगह गोमांस पर रोक को बढ़ावे के खिलाफ हाईकोर्ट के अहाते में ही गोमांस का भोज करके विरोध किया था। उनका कहना था कि एक सवर्ण हिन्दू सोच को भारत के बाकी लोगों पर लाद  दिया जा रहा है, या कानून बनाकर उसे जुर्म बनाया गया है। अभी केन्द्र सरकार ने पूरे देश के लिए ऐसा कोई कानून नहीं बनाया है लेकिन भाजपा और उससे जुड़े संगठनों की ऐसी सोच बार-बार आक्रामक तरीके से सामने आ रही है। आईआईटी के दलित छात्रों का यह संगठन देश के बाकी तमाम दलित लोगों की तरह इस बात पर विचलित चले आ रहा है कि किस तरह भाजपा की राज्य सरकारें हर जगह पर गोमांस और इससे जुड़े कारोबार को दंडनीय अपराध बना चुकी हैं, और एक सनातनी ब्राम्हणवादी हिन्दू सोच देश के बाकी तबकों पर लादी जा रही है। 
बात सिर्फ इस बात की नहीं है कि आईआईटी छात्रों के किसी संगठन की मान्यता खत्म कर रहा है। बात यह है कि इस संगठन के लोग जिस तबके के हैं, उनके बुनियादी अधिकार किस तरह देश भर में खत्म किए जा रहे हैं। मान्यता को खत्म करने की यह कार्रवाई अदालत में ठहर नहीं सकेगी, और ऐसा करके आईआईटी ने मोदी का कोई भला नहीं किया है, बल्कि मोदी के लिए एक नई फजीहत खड़ी की है। जिस अमरीका के साथ संबंधों को लेकर मोदी आज खबरों में है, उस अमरीका में भारत के आईआईटी से पढ़कर जाकर हजारों लोग काम कर रहे हैं, और उस अमरीका में गोमांस कोई मुद्दा नहीं है। अमरीका में काम करने वाले लोग इस आजादी का सम्मान करना सीख जाते हैं कि लोग अपनी-अपनी पसंद का खाएं। जिनको वहां भी शाकाहारी रहना है, वे शाकाहारी रहते हुए भी गोमांस खाने वाले लोगों के साथ उदारता से रहना सीख जाते हैं। भारत के भीतर इस तरह की दकियानूसी कार्रवाई पूरी दुनिया में इस देश के लोगों की आजादी की हालत को बहुत कमजोर साबित करेगी। यह लड़ाई सिर्फ मोदी की आलोचना की लड़ाई नहीं है, यह देश में दलित तबके के विचलित होने की लड़ाई है, और वह आईआईटी जैसे प्रतिबंधों से ठंडी पडऩे वाली नहीं है।
और यह तब हो रहा जब आज प्रधानमंत्री मोदी अंबेडकर की 125वीं सालगिरह मनाने की कमेटी की अध्यक्षता कर रहे हैं। इस मौके पर क्या वे अंबेडकर के दलित अनुयायियों की भावनाओं को भी जानना चाहेंगे, या गरीब मांसाहारी लोगों के मुंह का कौर छीनने के लिए सनातनी कानून बढ़ाते चलेंगे?

140 अक्षरों से बेहतर होती दिमागी सेहत...

संपादकीय
29 मई 2015

ट्विटर पर लोग कोई दो दर्जन शब्दों के भीतर, या 140 से कम अक्षरों वाले संदेश में बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं। छोटे संदेश वाला यह माईक्रोब्लॉगर लोगों के कटाक्ष को, उनके तानों को बहुत पैना बना देता है, और जिस तरह एक वक्त तार (टेलीग्राम) करते हुए लोग एक-एक शब्द का ख्याल रखते थे, क्योंकि भुगतान हर शब्द का करना पड़ता था, उसी तरह आज लोग ट्विटर पर एक-एक अक्षर का ख्याल रखते हैं। यहां पर आज किसी ने लिखा कि हिन्दुस्तान में लोग लू से नहीं मर रहे, वे खाना-पीना न होने से, सर पर साया न होने से, और वक्त पर इलाज हासिल न होने से मर रहे हैं। एक ही तस्वीर को देखने के दो अलग-अलग पहलू हैं। कुछ लोग तपते हुए सूरज पर तोहमत लगा रहे हैं कि उसकी बरसाई जा रही आग में झुलसकर लोग मर रहे हैं। और दूसरी तरफ एक नजरिया यह है कि जिन पर जिंदगी की सहूलियतों का, बचाव का, साया नहीं है, वे मारे जा रहे हैं। 
ट्विटर जैसी जगह पर लोग अपने चेहरे के साथ या चेहरे के बिना, बड़ी आक्रामक बातें कह रहे हैं, और भारतीय जीवन में पैनेपन की जो कमी हमेशा से रहते आई है, वह इससे दूर होते दिखती है। अभी कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह लिखा था कि सोशल मीडिया पर लोगों के विचार जनमत का सही या पूरा प्रतिनिधित्व नहीं भी कर सकते हैं। लेकिन अब हम वैसे किसी निष्कर्ष से परे इस पर जा रहे हैं कि वहां पर लोग जिन बातों को लिखते हैं, उनसे उनके मन की भड़ास कैसे निकलती है, और एक दिमागी सेहत के लिए यह भड़ास निकलना क्यों और कितना जरूरी है। लोगों को ध्यान होगा कि सार्वजनिक जगहों पर पखानों के दरवाजों के भीतर की तरफ लोग अपने मन की चाहत, या अपने मुताबिक कोई बहुत चुटीली बात, या गालियां लिखकर अपना मन हल्का करने का काम किया करते थे। आज सोशल मीडिया पखाने के दरवाजे के भीतरी हिस्से का काम भी कर रहा है। लोग अब अपने चेहरे के साथ भी इस पर उसी अंदाज में गालियां, गंदी बातें, और हिंसक धमकियां लिखने लगे हैं, जो कि इसके पहले तक अपने कपड़े उतारे हुए, पखाना करते हुए ही लिखते थे। 
जिन लोगों के मन में किसी से शिकायत है, या किसी से नफरत है, उनके लिए सोशल मीडिया बड़ा फायदेमंद है, और उनकी कुंठाओं को एक इलाज इससे मिलता है। लेकिन दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि लोग शब्दों और वाक्यों से, कहावतों और मुहावरों से, नामों और चेहरों से जिस तरह के खिलवाड़ फेसबुक या ट्विटर जैसी जगहों पर कर रहे हैं, उससे शर्तिया ही उनकी कल्पनाशीलता बढ़ रही है। जब दिमाग के कल्पना के हिस्से का इस्तेमाल होता है, तो वह सक्रियता दिमाग को सेहतमंद भी बनाए रखती हैं। इसलिए हम सोशल मीडिया के बाजारू या राजनीतिक उपयोग से परे भी उसका एक निजी फायदा देखते हैं कि इससे लोग भड़ास से मुक्त हो रहे हैं। 
एक और पहलू सोशल मीडिया का गैर-सोशल भी है। आज एक घर के लोग, एक दफ्तर के लोग, आपस में दोस्त लोग भी एक-दूसरे से जिन बातों को सीधे कहने से कतराते हैं, वे भी सोशल मीडिया पर बड़ी से बड़ी, भारी-भरकम बात को बिना किसी एक के लिए कहे हुए भी कह जाते हैं। और जिनको उसका मतलब निकालना रहता है, वे निकाल लेते हैं। एक वक्त कहा जाता था कि बहू को सुनाने के लिए सास अपनी बेटी को सुनाती है। कुछ इसी किस्म का हाल सोशल मीडिया का हो गया है जहां पर लोग अपने दिल के हाल को एक दार्शनिक अंदाज में उन लोगों को बिना नाम लिए बता देते हैं, जिन तक वे बात पहुंचाना चाहते हैं। इसलिए हम सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ मजाक या सिर्फ सुख और दुख बांटने वाला नहीं समझते। ये सिर्फ खबरों को बांटने वाला भी नहीं है। इसका इस्तेमाल लोगों की एक बेहतर मानसिक स्थिति तैयार करने में भी हो रहा है, और जिन लोगों को जनमत को जानने की जरूरत होती है, वे भी अपने-अपने हिसाब से सोशल मीडिया की बातों का वजन तौल सकते हैं, और अपने नतीजे निकाल सकते हैं। एक सौ चालीस अक्षरों वाला एक ट्वीट ठीक उतना ही लंबा होता है, जितनी लंबी सूक्ति एक वक्त के महान लोग लिखा करते थे, या किसी शायर और कवि शेर और दोहे लिखा करते थे। जानकार और समझदार लोगों को शायद सैकड़ों बरस पहले से समझदारी की बातों की लंबाई की 21वीं सदी की सीमा का अंदाज था। जब ट्विटर आया भी नहीं था, तभी से गालिब, कबीर और सुकरात ट्वीट की लंबाई के भीतर ही अपनी बातें लिखते आए हैं। 

कांव-कांव
0 सुना है आन्ध्र में गांधी प्रतिमा के पास से शराबखाना हटाने के बजाय गांधी प्रतिमा को ही हटा दिया गया है?
00 आज की जिंदगी में जिसकी अधिक जरूरत है, उसे ही रहने का हक है...

बच्चा चोरी के शक में लोगों को मारना महज घटनाएं नहीं एक पूरी राष्ट्रीय सोच का सुबूत

संपादकीय
28 मई 2015

छत्तीसगढ़ में जगह-जगह बेकसूर लोगों को मारा जा रहा है कि वे बच्चा चुराने वाले हैं। अब तक दर्जन भर से अधिक ऐसे मामले हो चुके हैं जिनमें से एक में तो राजधानी रायपुर में ही मारा गया है, और अब मारने वाली भीड़ से दर्जनों लोग पता नहीं कितनी जिंदगी जेल में काटेंगे। लेकिन यह सिलसिला थम नहीं रहा है, और एक के बाद दूसरे शहर में लोग बच्चा चोर के शक में बेकसूरों को पीट रहे हैं। कहीं रोजगार ढूंढते मजदूर शक का शिकार हो रहे हैं तो कहीं विचलित और विक्षिप्त लोग मारे जा रहे हैं। चूंकि भीड़ की हिंसा और मार के शिकार लोग महत्वपूर्ण नहीं हैं, गरीब और फटेहाल हैं, इसलिए इसके खिलाफ किसी संगठित तबके ने अभी तक कोई आवाज नहीं उठाई है। जो मारा गया है, और जो पिट रहे हैं, वे किसी एक धर्म या जाति के नहीं हैं, किसी एक राजनीतिक दल या सामाजिक संगठन के नहीं हैं, इसलिए ऐसी बेकसूर जिंदगियों के पक्ष में खड़ा होने के लिए किसी के पास वक्त भी नहीं है। 
लेकिन इससे दो बातें साबित हो रही हैं, एक तो यह कि लोग बहुत तेजी से अफवाहों के शिकार होकर अपने शक को जानलेवा बनाने में हिचक नहीं रहे हैं। दूसरी बात यह कि पुलिस या सरकार पर से, अदालत पर से लोगों का भरोसा घट चला है, और वे कानून अपने हाथ में लेने को एक आसान समझ रहे हैं, शायद बेहतर रास्ता भी समझ रहे हैं। यह प्रदेश, और बाकी देश भी, किस तरह अफवाहों का शिकार हो सकता है, यह देखना हो, तो कुछ दशक पहले गणेशजी के दूध पीने को याद करना पड़ेगा जब सरकारी दफ्तर छोड़-छोड़कर लोग शहर में ढूंढ-ढूंढकर गणेश प्रतिमाओं को दूध पिला रहे थे। तब से लेकर अब तक देश में शिक्षा तो बढ़ गई है, लेकिन अक्ल बढऩे का कोई सुबूत नहीं हैं। लोग अभी भी अंधविश्वास के वैसे ही शिकार हैं, जैसे कि वे गणेश प्रतिमा के सामने थे। गणेशजी के दूध पीने के दशकों बाद इस देश को कभी कोई निर्मल बाबा बेवकूफ बनाता है, तो कभी आसाराम जैसे लोग भक्तों की बच्चियों से बलात्कार के मामले में जेल पहुंचते हैं। अंधविश्वास है कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। अभी-अभी हमने इसी पेज के लिए लिखा था कि शक का इलाज तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं था, लेकिन अंधविश्वास का इलाज तो दवाओं के देवता धन्वंतरि के पास भी नहीं था। 
देश की सोच को धर्मान्धता के आधार पर, एक अस्तित्वहीन इतिहास के झूठे राष्ट्र गौरव के आधार पर, अवैज्ञानिकता के आधार पर, और कट्टरता, पाखंड के आधार पर जिस तरह से कमजोर बनाया जा रहा है, उसी का नतीजा है कि लोग पुलिस और अदालत पर भरोसे के बजाय कानून को हाथ में लेने पर भरोसा अधिक कर रहे हैं। इंसानी मिजाज ऐसा नहीं हो सकता कि वह कुछ मामलों में अंधविश्वासी हो, कट्टर हो, और कुछ दूसरे मामलों में वह वैज्ञानिक नजरिए का हों। इसलिए जब समाज की लोकतांत्रिक, न्यायसंगत, तर्कसंगत, और वैज्ञानिक सोच को कमजोर किया जाता है, तो वह अलग-अलग कई शक्लों में हिंसक हो जाती है, क्योंकि लोकतंत्र पर उसका अधिक भरोसा नहीं रहता। ऐसे लोग दूसरों के हक और अपनी जिम्मेदारी को मानने और समझने के बजाय अपने हक और दूसरों की जिम्मेदारी को हिंसा की हद तक ले जाते हैं। आज इस देश में बहुत से साम्प्रदायिक और धर्मान्ध नेता जिस तरह के अवैज्ञानिक और अलोकतांत्रिक बयान दे रहे हैं, उससे समाज की सोच बर्बाद हो रही है। इसके बुरे नतीजे अभी खुलकर सामने नहीं आ पाए हैं, लेकिन किसी दिन ऐसी ही अफवाहों पर भरोसा करके जब लोग किसी दूसरे धर्म, या किसी दूसरी जाति के लोगों को मारना शुरू करेंगे, तो उसके जवाब में एक संगठित जवाबी हिंसा उठ खड़ी होगी। और उस वक्त भारतीय समाज की खोई हुई वैज्ञानिक सोच को रातों-रात वापिस लाना मुमकिन भी नहीं होगा। समाज की सोच सागौन की पेड़ की तरह होती है, जो कि धीरे-धीरे पनपते हुए, विकसित होते हुए, पचीस-पचास बरस में जाकर काम की हो पाती है। और समाज के भीतर अंधविश्वास तो बांस की तरह पनपता है जो कि देखते ही देखते आसमान छूने लगता है। हमको बांस को ऐसी मिसाल में इस्तेमाल करते हुए तकलीफ हो रही है, लेकिन यह बयां करने का आसान रास्ता सूझ रहा है। इस देश के समझदार लोगों को वैज्ञानिक सोच और लोकतांत्रिक न्यायप्रियता कायम रखने के लिए सरकारों और राजनीतिक दलों से परे जाकर मेहनत करनी पड़ेगी। जिनको यह काम मुश्किल लगता है, उनको याद रखना चाहिए कि सैकड़ों बरस पहले जब कोई अदालत नहीं थी, कोई संसद नहीं थी, कोई मानवाधिकार आयोग नहीं थे, तब एक अकेले कबीर ने जिस हौसले के साथ पाखंड पर वार किया था, आज कोई उतना वार करे, वैसा वार करे, तो उस पर राजनीतिक दल, सरकारें, और धर्म के ठेकेदार चढ़ बैठेंगे। लेकिन अकेले कबीर ने उस वक्त जो काम किया था, आज तरह-तरह की कानूनी मदद के रहने पर कुछ और लोगों को भी वैसा काम करना सोचना चाहिए। 

नकवी के पाकिस्तान भेजने के बयान पर मोदी के ही एक और मंत्री का समझदारी का बयान

संपादकीय
27 मई 2015

केन्द्र सरकार के एक अतिबड़बोले केन्द्रीय मंत्री, जो कि लंबे अरसे से भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता भी रहे हैं, मुख्तार अब्बास नकवी ने पिछले दिनों एक बड़ा हिंसक बयान दिया कि जिन लोगों को गोमांस खाना है वे पाकिस्तान चले जाएं। इसके पहले भी मोदी सरकार और भाजपा के कुछ लोग कभी मुसलमानों को, तो कभी मोदी के आलोचकों को पाकिस्तान चले जाने की सलाह देते आए हैं। मुख्तार अब्बास नकवी के सामने भाजपा के भीतर के कुछ मुस्लिम नेताओं पर लागू यह बेबसी लागू है कि उन्हें भाजपा के प्रति वफादारी दिखाने के लिए पाकिस्तान को तो गालियां देनी ही पड़ती हैं, कई बार वे भाजपा के हिन्दू नेताओं के मुकाबले भी अधिक आक्रामक होकर देश के मुसलमानों को गद्दार कहते हैं, पाकिस्तान जाने को कहते हैं। आज इस पर लिखने की जरूरत इसलिए लगी कि इसी मोदी सरकार में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू ने नकवी के बयान के जवाब में आज खुलकर सार्वजनिक रूप से कहा है कि वे गोमांस खाते हैं और उनको कौन रोक सकता है। उन्होंने काफी लंबी बात नकवी के बयान के जवाब में कही है, और हम तो कई बार इसी जगह भाजपा सरकारों और मोदी सरकार के लिए यह सलाह लिख चुके थे कि खान-पान को लेकर देश में इस तरह की सनातनी आक्रामकता से देश के अल्पसंख्यक तो मूलधारा से कटेंगे ही, देश के हिन्दू समाज के भी करोड़ों ऐसे लोग हैं जिनको गोमांस खाने से कोई परहेज नहीं है, और ऐसे लोगों में उस दलित और आदिवासी समाज के करोड़ों लोग शामिल हैं जो कि सनातनी हिन्दुत्व हिंसा के चलते हुए ही हिन्दू समाज को छोड़-छोड़कर कहीं बौद्ध हुए, कहीं मुस्लिम हुए, और कहीं ईसाई हुए।
हमारी बात तो एक असहमत विचारधारा की बात कहकर खारिज की जा सकती थी, लेकिन आज मोदी सरकार के भीतर के ही एक अधिक गंभीर और एक अधिक वजनदार मंत्री किरेन रिजिजू ने नकवी को जिस तरह से खुलकर जवाब दिया है, वह जवाब देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों की आबादी के एक बड़े हिस्से की तरफ से भी है, और हिन्दू समाज के करोड़ों लोगों की तरफ से भी है। लोगों के खान-पान को लेकर उन पर इस तरह से हमले, और इस तरह की बंदिशें लोकतांत्रिक नहीं हैं। गाय काटने या गोवंश के बाकी पशुओं को काटने को जिस तरह से गो-वध करार देकर एक भावनात्मक उन्माद खड़ा किया जाता है, उससे तो रहा-सहा हिन्दू समाज और बिखर जाएगा। एक तरफ तो मोदी सरकार और भाजपा के सबसे करीब का वैचारिक संगठन, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ लगातार दलितों और आदिवासियों को दूसरे धर्मों से हिन्दू धर्म में लाने को वापिसी कहते हुए उसमें लगा हुआ है, संघ परिवार के विश्व हिन्दू परिषद जैसे दूसरे संगठन सार्वजनिक रूप से बयान दे रहे हैं कि छुआछूत को खत्म करके हिन्दू समाज से निकले हुए लोगों को वापिस लाकर जोड़ा जाना चाहिए, या जो लोग हिन्दू समाज के भीतर छुआछूत झेल रहे हैं, उन्हें सुरक्षा देनी चाहिए। लेकिन ऐसे बयान एक तरफ, और दूसरी तरफ गोवंश के पशुओं को काटने के खिलाफ, उनको बेचने के खिलाफ, उनका मांस खाने के खिलाफ जिस तरह के उन्मादी कानून बन रहे हैं, वे भयानक हैं। 
महाराष्ट्र में आज गाय-बैल के बेचने पर रोक लगा दी गई है, और वहां का किसान जब भुखमरी में खुद खुदकुशी कर रहा है, तो गाय-बैल को न वह बेच पा रहा है, न उन्हें मारकर खा पा रहा है। वह महज अपनी जान दे रहा है। देश की ग्रामीण पशु-अर्थव्यवस्था धार्मिक उन्माद का शिकार हो रही है, और केन्द्र सरकार से लेकर उन्मादी राज्य सरकारों तक, किसी के पास इस बात का इलाज नहीं है कि करोड़ों लोग इन प्रतिबंधों से जिस तरह बेरोजगार हुए हैं, क्या वे हिन्दुस्तान के रहने वाले हैं, या नहीं? और क्या उन्हें नकवी की जुबान में पाकिस्तान भेज देना चाहिए? दूसरी बात यह कि इस धर्म निरपेक्ष देश में किसी एक धर्म के एक तबके की धार्मिक मान्यताओं के आधार पर बाकी पूरे देश के खान-पान की स्वतंत्रता के अधिकार को किस तरह कुचला जा सकता है? हमको पूरा भरोसा है कि ऐसे टुकड़ा-टुकड़ा प्रादेशिक कानून सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर निश्चित ही खारिज हो जाएंगे। लेकिन तब तक भाजपा को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसे कानून हिन्दू समाज के अब तक बचे हुए हिस्से को भी चूर-चूर करके रख देंगे। और देश के अल्पसंख्यक तबके मोदी सरकार और भाजपा से बुरी तरह कट जाएंगे। फिलहाल तो मोदी मंत्रिमंडल के ही एक सदस्य ने नकवी को जो जवाब दिया है, वह सवाल सरकार को बेजुबान कर गया है।

कुर्सी से हटने के बाद ही खुलासे का हौसला क्यों?

संपादकीय
26 मई 2015

देश के एक बड़े अफसर रहे, और बाद में दूरसंचार नियामक आयोग के अध्यक्ष बने प्रदीप बैजल की एक किताब सामने आई है जिसमें उन्होंने यह सनसनीखेज आरोप लगाया है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें 2जी घोटाले में साथ न देने पर उन्हें (बैजल को) नुकसान की बात कही थी। 2जी घोटाले पर केन्द्रित उनकी यह नई किताब मनमोहन सिंह पर एक अभूतपूर्व तोहमत लगा रही है, और लोग इस बात पर हैरान भी हो रहे हैं, कि एक वरिष्ठ सरकारी अफसर रहते हुए प्रदीप बैजल ने उस वक्त इस चेतावनी या धमकी के बारे में अपनी सरकारी जिम्मेदारी पूरी क्यों नहीं की? और आज जब देश की राजनीतिक सत्ता बदल गई है, तब बरसों बाद जाकर वे इन बातों को सार्वजनिक क्यों कर रहे हैं, या ऐसी बातें क्यों लिख रहे हैं? 
वैसे तो हम समकालीन इतिहास लिखने के हिमायती हैं, और हमारा मानना है कि सार्वजनिक पदों पर, महत्व के पदों पर जो लोग भी रहते हैं, उन्हें अपनी बातों को लिखना ही चाहिए। लेकिन सरकारी या संवैधानिक पदों पर रहने वाले लोगों को अपने पद पर रहते हुए ही, उस ओहदे के साथ जुड़े हुए कामकाज को प्रभावित करने वाली बातों को लिखना चाहिए, किसी किताब में नहीं, सरकारी कागजात में, फाईलों पर, और जरूरत पडऩे पर सतर्कता एजेंसियों को, और अदालत को भी। अगर देश के सबसे बड़े दर्जन भर अफसरों में भी यह हौसला नहीं रहेगा कि वे प्रधानमंत्री के खिलाफ जाने वाली बातों को सरकारी रिकॉर्ड पर रख सकें, तो फिर यह देश की नौकरशाही की एक कमजोरी और खामी ही कही जाएगी। जो लोग सरकारी पदों पर इतने ऊपर तक पहुंचे हुए रहते हैं कि नौकरी छोडऩे पर भी जिनके जीने में कोई दिक्कत नहीं होती, और मरने तक जो पेंशन पा सकते हैं, उन लोगों को तो हौसला दिखाना ही चाहिए। 
न सिर्फ केन्द्र सरकार में बल्कि कई प्रदेशों में भी अपने कार्यकाल के दौरान ही बहुत से अफसर अपने ऊपर के नेताओं या बड़े अफसरों के गलत हुक्म मानने से इंकार भी कर देते हैं, और सरकारी रिकॉर्ड में उन बातों को ले भी आते हैं। हमारे पाठकों को याद होगा कि कई बरस पहले जब अर्जुन सिंह केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री थे तब उनके मंत्रालय के एक संयुक्त सचिव ने फाईल पर यह लिखा था कि अर्जुन सिंह की बेटी वीणा सिंह आकर उनसे मिली थीं, और देश भर की स्कूलों में दोपहर के भोजन की जगह कारखानों में बने बिस्किट देने की सिफारिश की थीं। हर बरस 13 हजार करोड़ से अधिक का जो कारोबार बिस्किट कंपनियां झटकना चाहती थीं, उनकी सिफारिश लेकर, उनके लिए लॉबिंग करने अर्जुन सिंह की बेटी उन्हीं के मंत्रालय पहुंची थीं। इस बात को सरकारी फाईल पर जिस अफसर ने दर्ज किया था, उसके मुकाबले प्रदीप बैजल बड़े अफसर थे। और उनको मनमोहन सिंह से अगर ऐसी कोई धमकी मिली थी, तो इस बात को उन्हें न सिर्फ फाईल पर लिखना था, बल्कि केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त और अदालत को भी इस बारे में बताना था। लेकिन जहां तक हमारी याददाश्त साथ देती है, प्रदीप बैजल ने पहली बार आज ऐसी कोई बात अपनी किताब में लिखकर लोगों के सामने रखी है, और यह मानो मोदी सरकार के एक बरस पूरा होने पर तमाम कांग्रेस-विरोधियों को प्रदीप बैजल का तोहफा है। 
इस देश में अलग-अलग ओहदों पर बैठे हुए लोगों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई जाती है। सरकारी अफसरों को भी गोपनीयता की शर्त नौकरी के साथ-साथ मिलती है। अब ऐसे में सूचना के अधिकार का बड़ा सीमित मतलब रह जाता है। होना तो यह चाहिए कि सूचना पाने का जनता का हक, सूचना देने की सरकारी जिम्मेदारी में बदलना चाहिए। होना यह भी चाहिए कि सरकारी कामकाज में जब कोई एक व्यक्ति अपने मातहत को कोई जुबानी निर्देश दे, तो उसकी रिकॉर्डिंग करने की छूट भी रहनी चाहिए, ताकि जुबानी निर्देशों के बाद कोई उससे मुकर न सकें। फिलहाल अगर बात को हम प्रदीप बैजल की किताब पर खत्म करें, तो ऐसी बात की आज कोई विश्वसनीयता नहीं है। कुर्सी पर रहते हुए लोगों को मुंह खोलने की हिम्मत रहनी चाहिए। 

अकेले और मुसीबत में रह गए बच्चों की तलाश और मदद हो

25 मई 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल इलाके सरगुजा में पिता से भटक गए एक बच्चे की भूख-प्यास से मौत के बाद वहां के जिला प्रशासन ने पूरे जिले में अकेले, बेसहारा रह गए बच्चों की तलाश शुरू की है, और ऐसे दर्जनों बच्चे मिले हैं, जिन्हें सरकारी संरक्षण गृह भेजा जा रहा है। एक मामला ऐसा मिला है जिसमें पिता ने मां की हत्या कर दी, और जेल चले गया, और तीन छोटे-छोटे बच्चे बेसहारा रह गए। हर हादसे के बाद कुछ सबक लिए जा सकते हैं। सरगुजा में एक बच्चे की मौत के बाद अगर दर्जनों दूसरे बच्चों को बचाया जा सकता है, तो वहां के इस मामले से प्रदेश के बाकी जिलों में भी सरकार को ऐसे बच्चों की तलाशी करवाना चाहिए जिनके मां-बाप जेल में हैं, या किसी और वजह से जो बच्चे अकेले रह गए हैं। 
एक दूसरे किस्म के मामले में सुप्रीम कोर्ट पूरे देश की राज्य सरकारों को कटघरे में ला चुकी है कि बच्चों और महिलाओं की तस्करी के मामलों में राज्य सरकारें क्या कर रही हैं? इनमें छत्तीसगढ़ का नाम भी है, और इसी सरगुजा के इलाके से सबसे अधिक बच्चों और लड़कियों को देश के महानगरों में ले जाकर काम पर लगाया जाता है, बंधुआ मजदूर बना दिया जाता है, बेच दिया जाता है, या वेश्यावृत्ति में लगा दिया  जाता है। ऐसे बहुत से मामले सामने आने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी निगरानी में राज्य सरकारों से काम करवाना शुरू किया है, और लगातार जवाब मांग रही है। जो बच्चे किसी भी वजह से घर छोड़कर निकल जाते हैं, या अकेले रह जाते हैं, वे मुजरिमों के हाथों भी चढ़ जाते हैं, नशे की लत में पड़ जाते हैं, और उनका यौन शोषण होने का खतरा भी भयानक रहता है। ऐसा भी नहीं है कि सरकारी संरक्षण गृह में वे सुरक्षित रहते हैं, क्योंकि छत्तीसगढ़ में ही जगह-जगह स्कूलों के छात्रावासों में लड़कियों से बलात्कार और देह शोषण के मामले सामने आए हैं। अभी भारत में इस बात को लेकर समझ और संवेदनशीलता कम है कि लड़कियों के अलावा कम उम्र लड़कों का भी देह शोषण होता है। लोग इस बात को मंजूर करने से कतराते हैं। 
राज्य सरकार को सभी तरह के मुसीबतजदा, अकेले रह गए, भूखे या कुपोषण के शिकार बच्चों का पता लगाकर उनके लिए जरूरी इंतजाम करना चाहिए। इसके साथ-साथ जितने संरक्षण गृह हैं, उनकी निगरानी के लिए भी आसपास के भले और प्रमुख लोगों की ऐसी गैरराजनीतिक कमेटी बनानी चाहिए जो कि वहां के बच्चों की मदद भी कर सके, और वहां होने वाली ज्यादती या भ्रष्टाचार पर नजर भी रख सके, उसे रोक भी सके। सरकार का अपना अमला आमतौर पर संवेदना खोने लगता है, और ऐसे में समाज के लोगों से मदद लेने की जरूरत रहती है। 
सरगुजा में यह पहल अच्छी हुई है कि जेलों में बंद कैदियों के बच्चों का पता लगाकर उनकी मदद की जाए, क्योंकि ऐसे मां-बाप के बच्चे जरूरतमंद तो रहते ही हैं, समाज में उनका शोषण होने का खतरा भी बहुत बड़ा रहता है। इस राज्य में कम से कम अनाज को लेकर ऐसी हालत नहीं है कि कोई बच्चा या कोई बड़ा भूख से मरे। सरगुजा में यह मामला जंगल में भटककर मरने का है, लेकिन ऐसी नौबत भी आने से रोकने के लिए सरकार और समाज दोनों को मिलकर कोशिश करनी चाहिए। राज्य सरकार हर जिले में ऐसा अभियान शुरू करे। 

भारतीय रक्षा मंत्री का आतंक पर पूरी तरह अवांछित बयान

संपादकीय
24 मई 2015

यूं तो पाकिस्तान को आंखें दिखाना हिन्दुस्तान में, हिन्दुस्तान के खिलाफ हमलावर जुबान में कुछ बोलना पाकिस्तान में नेताओं को पसंदीदा काम है, लेकिन कल भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के एक बयान को लेकर पाकिस्तान की जो प्रतिक्रिया आई है उससे बैठे-ठाले एक जुबानी जंग शुरू हो गई है। भारतीय रक्षा मंत्री ने भारत में हो रही आतंकी घटनाओं को लेकर कहा कि आतंकवादियों के माध्यम से ही आतंकवादियों का सफाया किया जा सकता है।  पर्रिकर ने कहा था कि कई चीजें हैं, जिन पर मैं यहां वाकई बात नहीं कर सकता। लेकिन पाकिस्तान ही क्यों, कोई दूसरा देश भी मेरे देश के खिलाफ कुछ साजिश रच रहा है तो हम निश्चित रूप से कुछ सक्रिय कदम उठाएंगे। उन्होंने हिंदी मुहावरा कांटे से कांटा निकालना का भी इस्तेमाल किया और पूछा कि आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए भारतीय सैनिकों का इस्तेमाल क्यों किया जाए? 
पाकिस्तान ने इस पर कहा कि उनके इस बयान से भारत के आतंकवाद में शामिल होने की आशंका की पुष्टि होती है। विदेश मामलों पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज ने कहा कि यह बयान केवल यह जाहिर करता है कि पाकिस्तान में हो रही आतंकवादी गतिविधियों में भारत शामिल है। यह पाकिस्तान की आशंकाओं की पुष्टि करता है। उन्होंने कहा कि पहली बार ऐसा होगा कि किसी निर्वाचित सरकार का कोई मंत्री किसी दूसरे देश या उसके सरकार से इतर तत्वों से पनपने वाले आतंकवाद को रोकने के नाम पर उस देश में आतंकवाद के इस्तेमाल की खुलकर वकालत करता हो। 
आज भारत में आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर खुश होगा कि भारत के रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान को आंखें दिखाईं। और वे लोग भी खुश होंगे जो मानते हैं कि सरहद पार करके पाकिस्तान पर कब्जा कर लेना चाहिए। लेकिन आज की दुनिया की हकीकत यह है कि किसी भी देश से तनाव अपने देश के लोगों के पेट काटकर ही निभाया जा सकता है। भारत और पाकिस्तान के बीच सर्द सरहदों पर हर बरस सैकड़ों जवान बिना गोलियों के भी मारे जाते हैं। और हथियारों के सौदागर इन दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ाकर दोनों तरफ का फौजी बजट जितना बढ़वा देते हैं, उनसे इन दोनों देशों के गरीब बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, अस्पतालों में दवाईयां नहीं हैं, शहरों में कचरा नहीं उठ पा रहा है, और गरीब लोग नर्क या जहन्नुम सी जिंदगी जी रहे हैं। इसलिए आंखें तरेरने का काम जब राजधानियों में होता है, तो उसके दाम पूरे देश की गरीब जनता चुकाती है। 
हमारा यह मानना है कि भारतीय रक्षा मंत्री का यह बयान उनकी कूटनीतिक कमसमझ को ही जाहिर करता है। उन्होंने अधिक न कहने की बात कहते हुए भी जितनी बात कही है, वह बात भी पूरी तरह अवांछित है। अगर कोई देश दूसरे देश में अघोषित रूप से आतंक को बढ़ावा देता भी है, और बहस के लिए यह मान लेते हैं कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही एक-दूसरे की जमीन पर आतंक को बढ़ा रहे हैं, तो भी  यह बात सरकार में बैठे हुए लोग कभी भी खुलकर कहने से बचेंगे। आतंक की बात हो, आतंक के मुकाबले आतंक को, फौज के मुकाबले किसी और रास्ते को इस्तेमाल करने की बातें बहुत समझदारी की नहीं हैं। और यह भी हो सकता है कि भारत में मोदी सरकार में बैठे बहुत से लोग इस बयान की वाहवाही करें, क्योंकि उनको इसके दूरगामी नतीजों का अंदाज नहीं हैं, और विदेश नीति की समझ की कमी भी इसके पीछे हो सकती है। 
इस सरकार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रात-दिन पूरी दुनिया का फेरा लगाकर भारत के नाम की जो वाहवाही करवाना चाहते हैं, वह तो ठीक है, लेकिन उनके साथ के मंत्री अंतरराष्ट्रीय संबंधों में समझ की जो कमी दिखा रहे हैं, उसका फायदा उन देशों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलता है जिनके खिलाफ भारतीय मंत्री या नेता ऐसे बयान देते हैं। दूसरी बात यह कि भारत सरकार और भारत के नेताओं को यह याद रखना चाहिए कि दूसरे देशों में जो भारतवंशी बसे हुए हैं, उनकी जान, और उनका कारोबार, रोजगार सब कुछ भारत से उठे हुए ऐसे बयानों से खतरे में पड़ जाते हैं। भारतीय रक्षा मंत्री का यह बयान भारत के पाक-विरोधी लोगों को लुभावना लग सकता है, लेकिन इससे भारत का आतंक के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नजरिया कमजोर साबित होता है।

पटरियों पर ऐसे आंदोलन का हक किसी को नहीं

संपादकीय
23 मई 2015

राजस्थान में एक बार फिर आरक्षण की मांग को लेकर गुर्जर समुदाय पटरियों पर। लोगों को याद होगा कि पिछले बरस भी गुर्जरों ने पटरियों पर इतना लंबा धरना दिया था कि राजस्थान से होकर गुजरने वाली गाडिय़ां अस्थायी रूप से बंद ही कर दी गई थी। अब इतनी गर्मी में धरने के लिए गुर्जरों ने पटरियों पर तंबू तान दिए हैं, और  एक बार फिर रेलगाडिय़ां रद्द हो गई हैं। 
चूंकि यह एक से अधिक बार हो चुका है, और देश के अलग-अलग कुछ राज्यों में दूसरे लोगों ने भी रेलगाडिय़ों को रोककर विरोध करने का या मांग मनवाने का ऐसा आंदोलन किया है, इसलिए इस बारे में बात होनी चाहिए। रेलगाड़ी देश के बदन की नसों की तरह है जिनसे पूरा बदन काम करता है। अब कोई इसे कोई इन नसों को ब्लेड से काट दे, तो बदन का जो हाल होगा, वह हाल देश का हो सकता है। और रेलगाडिय़ों को रोकना अकेले गुर्जर समाज का हक नहीं है, देश में जगह-जगह बहुत से ऐसे संगठन है जिनके लंबे आंदोलन चल रहे हैं। आज अगर विदर्भ में राज्य की मांग को लेकर रेलगाडिय़ां रोक दी जाएं, बंगाल में राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के खिलाफ अगर वामपंथी रेलगाडिय़ां रोक दें, अगर आन्ध्र में किसानों की आत्महत्या का विरोध करते हुए पटरियों के किनारे के खेतों वाले किसान आकर पटरियों पर लेट जाएं, तो देश की धड़कन ही थम जाएगी। 
हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर ऐसी नौबत में दखल देना चाहिए, और बड़ी कड़ाई के साथ यह नियम लागू करना चाहिए कि रेलगाडिय़ों को रोकना किसी भी कीमत पर मंजूर न किया जाए। इन गाडिय़ों में बहुत से बीमार इलाज के लिए जाते हैं, बहुत से लोग इम्तिहान देने और नौकरी पाने जाते हैं। ऐसी जिंदगियां तबाह करने का हक किसी भी आंदोलन को, और किसी भी मांग को नहीं दिया जा सकता। पूरे देश में जगह-जगह कई तबके आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वे सबके सब क्या पटरियों पर बैठकर देश को रोक दें? जब किसी शहर की सड़कों पर किसी प्रदर्शन के चलते, या किसी और वजह से ट्रैफिक जाम होता है, तो उसमें भी जगह-जगह मरीजों की जान जाती है। रेलगाडिय़ों में तो बड़ी संख्या में लोग चलते हैं, और उन सबके बस में यह नहीं रहता कि गाड़ी रद्द होने पर दूसरी गाड़ी में जगह पा सकें, या कि लंबा चक्कर लगाकर कहीं पहुंच सकें। 
किसी आंदोलन या समाज में अगर इतना घमंड आ जाता है कि वे कानून को कुचलकर रेलगाडिय़ों को हफ्तों तक रोक सकते हैं, तो इस देश को अपनी कानूनी ताकत का इस्तेमाल करके ऐसे लोगों को जेल में डालना चाहिए, और जेल जाकर फिर वे वहां अपना आंदोलन चलाते रहें। किसी समुदाय या कुछ आंदोलनकारियों की नाराजगी से बचने के लिए राज्य सरकारें उन पर कड़ी कार्रवाई नहीं करतीं, यह रूख अपनी जिम्मेदारी से बचने का है, और ऐसी सरकारों पर सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई करनी चाहिए। जब हालात स्थानीय प्रशासन या स्थानीय पुलिस की ताकत के बाहर बेकाबू होने लगें, तब भी बाहर से केन्द्र सरकार और सुरक्षा बलों को भेज सकती है, और आंदोलनकारियों से परे की आम जनता के अधिकारों को कायम कर सकती हैं। इस तरह के आंदोलन घातक और जानलेवा हैं, और इनको कड़ाई से बंद करवाने की जरूरत है। अपनी मांगों के लिए किसी को यह हक नहीं मिल सकता कि वे दूसरों की जिंदगी तबाह करें।

छत्तीसगढ़ में अब सरकार पूरी हुई, काम की चुनौतियां

22 मई 2015
संपादकीय

एक तरफ केंद्र में मोदी सरकार का एक बरस पूरा होने जा रहा है, और उसी के साथ-साथ छत्तीसगढ़ में मंत्रिमंडल का विस्तार हो रहा है, और पौन दर्जन विधायकों को मंत्री और संसदीय सचिव बनने मिल रहा है। इसके साथ ही सरकार का अपना ढांचा निर्वाचित लोगों से पूरा हो रहा है। हफ्ते भर के भीतर ही सरकार के निगम-मंडलों में सत्तारूढ़ पार्टी के लोगों का मनोनयन होना तय है, और करीब दर्जन भर नेता कुर्सियां और लालबत्तियां पा लेंगे। लेकिन इसके साथ-साथ सत्ता पर नए-नए आने वाले लोगों से कुछ गलतियां, और कुछ गलत काम होने का एक खतरा बढ़ भी जाएगा, जो कि सरकार के आने वाले बरसों में परेशानी खड़ी कर सकेगा। 
छत्तीसगढ़ में सत्तारूढ़ पार्टी अगला महीना अपने तकरीबन सारे निर्वाचित और मनोनीत नेताओं के ढांचे के साथ सरकार चलाना शुरू कर देगी। लोकसभा चुनाव और म्युनिसिपल-पंचायत चुनावों के चलते हुए यह काम रूका हुआ था, और इसके साथ अब सरकार का पूरी रफ्तार से काम करना, नए मोर्चो पर नई कल्पनाओं के साथ आगे बढऩे की संभावनाओं का एक मौका खड़ा होता है। रमन सिंह सरकार के लिए  आने वाले दिन सरकार के कामकाज को जनता की नजरों में बेहतर साबित करने की चुनौतियों वाले रहेंगे। तीन नए मंत्रियों के साथ कुछ मंत्रालयों में फेरबदल भी हुए हैं, और सारे ही मंत्रालयों से जुड़े हुए निगम-मंडल भी अब राजनीतिक मुखिया पा जाएंगे। ऐसे में एक खतरा यह भी रहता है कि लोगों के बीच आपस में कुछ खींचतान हो, और कुछ लोग सत्ता की गलतियां करने लगें। लेकिन इस बीच ऐसी संभावना भी बनती है कि अगर राजनीतिक मनोनयन वाले लोग अच्छा काम करें, तो वे सरकार की साख बढ़ा भी सकते हैं। 
वैसे इस बात को अनदेखा नहीं करना चाहिए कि मंत्रिमंडल से लेकर निगम-मंडल तक मुख्यमंत्री और पार्टी के नेताओं के जाति के आधार पर, क्षेत्र के आधार पर, वरिष्ठता और वजन के आधार पर कई तरह के समझौते करने पड़ते हैं। लेकिन इनके बीच ही लोकतंत्र में राजनीति चलती है, और मुख्यमंत्री के सामने इन सबके बीच तालमेल बिठाना एक बड़ी बात रहेगी। फिर राज्य सरकार के सामने अपने कुछ विभागों के पकड़ाए हुए बड़े भ्रष्टाचार से उबरने की एक चुनौती भी है। यह खतरा बाकी विभागों पर भी है, और दूसरी जगहों पर नागरिक आपूर्ति निगम जैसे संगठित व्यापक भ्रष्टाचार के पकड़ाए जाने के पहले उसे रोकना होगा। अपने शासन के बारहवें बरस में मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह विपक्ष और जनता से किसी तरह की रियायत की उम्मीद नहीं कर सकते। और केंद्र में मोदी सरकार और अमित शाह के राजनीतिक नेतृत्व के चलते हुए भी छत्तीसगढ़ केंद्र के प्रति एक बरस पहले के मुकाबले आज अधिक जवाबदेह है। 
देश के संघीय ढांचे में केंद्र सरकार से राज्य को बहुत कुछ हासिल करने की अपार संभावना है। राज्य सरकार को अब अपने इस पूरे ढांचे के साथ इस बारे में गंभीरता से मेहनत करनी चाहिए, क्योंकि जो राज्य केंद्र के सामने अच्छे प्रस्ताव लेकर जाते हैं, वे वहां से खासा बजट भी लेकर आते हैं। 

सोशल मीडिया पर आती बातें जनभावना की पूरी तस्वीर नहीं

संपादकीय
21 मई 2015

लोकतंत्र में सोशल मीडिया ने लोगों को अपने दिल-दिमाग की बातें कहने का ऐसा मौका दिया है कि प्रिंट मीडिया, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों ही सोशल मीडिया पर नजर रखते हैं, और वहां से विचारों को चुनकर उन पर खबरें बनाते हैं। एक वक्त था जब अखबारों में पाठकों के पत्र, या संपादक के नाम पत्र जैसे कॉलम हुआ करते थे, और फिर धीरे-धीरे उसका चलन कई भाषाओं या देश-प्रदेश में कम होने लगा, क्योंकि डाकिये के मार्फत आने वाली चि_ियां पुरानी होने लगती थीं, और टीवी के आने से लोगों को खबरें जल्द भी मिलने लगीं, और वे जल्द ही बासी भी होने लगीं। लेकिन अब अपने छोटे से मोबाइल फोन से भी छोटे और बड़े सभी किस्म के लोग गिने-चुने शब्दों में अपनी बात पोस्ट करके पुराने और परंपरागत मीडिया में भी खासी हलचल मचा देते हैं। आज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में किसी का काम भी बिना सोशल मीडिया पर नजर रखे नहीं चलता। लेकिन इस नौबत के कुछ किस्म के खतरे भी हैं। 
एक तो यह कि सोशल मीडिया पर आने वाली प्रतिक्रियाओं को लोकतंत्र में प्रतिनिधि-प्रतिक्रिया मानने की गलती कुछ लोग कर बैठते हैं। दरअसल जिन लोगों को बड़ी भारी नकारात्मक या आलोचनात्मक बात कहनी होती है, वे सोशल मीडिया पर उतने ही अधिक सक्रिय होते हैं। दूसरी तरफ ऐसे समर्थक और भक्तजन भी खासे सक्रिय होते हैं, जो कि अपने नेता, या अपनी पार्टी, संगठन, की बातों को आगे बढ़ाना चाहते हैं, फैलाना चाहते हैं। लेकिन अब तक ऐसा कोई संचार-औजार नहीं बन पाया है जिससे कि यह अंदाज लग सके कि नफरत करने वालों, और मोहब्बत करने वालों की गिनतियों के बीच मौन लोग कितने हैं, और वे किस तरफ हैं। फिर एक बात यह भी है कि भाड़े के ऐसे बहुत से टट्टू दोनों किस्म के तबकों को हासिल हैं, जो कि मामूली सी संचार-साजिश से एक बड़ी दूसरी ही तस्वीर सोशल मीडिया पर पेश कर सकते हैं, कि नापसंद या पसंद करने वाले लोग कितने अधिक हैं।
अब जब सोशल मीडिया की प्रतिक्रियाओं को लोग जनता की प्रतिक्रिया मानकर अपनी राय ढालने लगते हैं, तो फिर भाड़े के टट्टुओं की मेहनत से एक बड़ी झूठी तस्वीर बनती है। और अखबारों के पुराने जमाने में लोगों की प्रतिक्रिया जिस तरह से बहुत कम मिल पाती थीं, और उसे आंकना भी मुश्किल रहता था, उससे बिल्कुल अलग आज सोशल मीडिया पर लोग बहुत खुलकर कहते हैं, और खूब कहते हैं। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया को जनता के इंटरनेट तक पहुंच वाले, सोशल मीडिया पर सक्रिय लोगों की प्रतिक्रिया ही मानना ठीक होगा। अभी भी भारत जैसे देश में आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर किसी प्रतिक्रिया को पोस्ट करने से दूर ही है। ऐसे में सोशल मीडिया पर बहुमत का रूख उतना ही सही होता है जितना कि किसी सौंदर्य स्पर्धा में जीतने वाली युवती को देश की सबसे खूबसूरत युवती मान लेना। वह दरअसल सभी प्रतिस्पर्धियों में से सबसे अधिक सुंदर होती है। गांव-देहात तक बिखरी सुंदरियों की गिनती और उनसे तुलना ऐसे मुकाबलों में नहीं होती। इसलिए सोशल मीडिया पर अभी जो प्रतिक्रिया देखने मिलती है, उसे जमीनी हकीकत के पैमाने पर उस अनुपात में ही देखना चाहिए, जिस अनुपात में आबादी का कोई हिस्सा यहां पर सक्रिय है। 
आज भारत में सोशल मीडिया के रूख को लेकर लोग अपनी पसंद के विचारों को छांट लेते हैं, और उनको आगे बढ़ाकर जनता के विचार साबित करने में लग जाते हैं। जनता के विचार का एक छोटा हिस्सा ही इंटरनेट पर है, और उन विचारों में से भी अपनी पसंद के विचारों को छांटकर लोग उसे जब जनभावना बताते हैं, तो वह एक गलत तस्वीर रहती है। लेकिन क्या लोग इतनी बारीकी से विश्लेषण पसंद करते हैं? 

मोदी का एक बरस, और विपक्षी कांग्रेस का एक बरस

संपादकीय
20 मई 2015

मोदी सरकार के एक बरस पूरे होने के पहले से कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने देश भर में उस पर हमले करना शुरू कर दिया है। यह एक सेहतमंद लोकतंत्र की पहचान होती है कि विपक्ष सरकार की खामियों पर नजर रखे और उन्हें जनता के सामने गिनाकर सरकार को कटघरे में बनाए रखने की कोशिश करे। दूसरी तरफ सरकार की भी यह जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी कामयाबी जनता को गिनाए। फिलहाल बात कांग्रेस पार्टी की है जिसे दस बरस की सत्ता के बाद भाजपा ने बड़ी शर्मिंदगी वाली बेदखली थमाई और जिसे विपक्ष का दर्जा भी पाने नहीं दिया। 
कांग्रेस एक ऐसे आक्रामक तेवर में है, जिसमें उसके पांवों तले जमीन नहीं है। कोई भी सरकार कुछ न कुछ मुद्दों पर नाकाम रहती है, और मोदी सरकार की खामियां निकालने में भी कोई बड़ी खूबी की जरूरत नहीं है, लेकिन खुद कांग्रेस के हाल को देखें तो पिछले आम चुनाव में उसकी जो बेइज्जती हुई, और जिस तरह से वह राजपथ से उठाकर फुटपाथ के किनारे कर दी गई, उस पर तो इस एक बरस में कोई चर्चा तक नहीं हुई। इस पार्टी में हो सकता है कि कोई ऐसी कमेटी बनी हो, जिसमें सत्तारूढ़ परिवार के वफादार लोगों ने मुखिया पर से शिकस्त की तोहमत हटाकर पार्टी के तमाम लोगों के बीच बांट दी हो, लेकिन उससे परे इस पार्टी ने क्या किया? एक-एक कर राज्य भी इसके हाथ से निकले चले जा रहे हैं, और केन्द्र तो मानो पूरी तरह खिसक ही चुका है, संसद में यह पार्टी प्रमुख विपक्षी दल भी नहीं रह गई, और देश में अब भी अपने वफादार रह चुके वोटरों के सामने कांग्रेस ने यह साफ नहीं किया है कि ऐसी चुनावी शिकस्त का वह क्या मतलब निकाल रही है। उसने यह भी उजागर नहीं किया है कि इस हार के लिए इसके पहले के दस बरस की कौन सी बातें जिम्मेदार थीं, और कौन से कुकर्म ऐसे थे जिनसे कि मतदाता नाराज थे। इस पार्टी से यह तो उम्मीद भी नहीं की जाती कि वह अपने मुखिया परिवार पर कोई आंच आने दे। 
जब चारों तरफ ऐसे सवाल खड़े हों, और बिना किसी जवाब के यह पार्टी सीधे आगे बढ़ जाना चाहती हो, तो वह इसका अधिकार तो है, लेकिन देश के लोगों का भरोसा ऐसे में लौट सकेगा, इसमें हमको भरपूर शक है। लोकतंत्र में कुनबे से बाहर भी एक जवाबदेही होती है। और राहुल गांधी खुद हफ्तों तक देश को बिना बताए जिस तरह से गायब रहकर लौट आए, उस रूख में भी जनता के प्रति एक हिकारत लगे या न लगे, एक बेफिक्री तो लगती है। किसी पार्टी का मटियामेट हो जाने के बाद उठकर खड़ा होना महज अपने हाथ में नहीं होता, वह जनता के हाथ में होता है। और जनता से यह उम्मीद करना कि वह नेहरू-गांधी परिवार के वारिसों को अपनी किस्मत मानकर चले, अपनी नियति मानकर चले, यह ठीक नहीं है। ऐसा मानकर चलना शायद ही कारगर हों। 
कांग्रेस पार्टी को अपने पुराने ढर्रे से निकलकर जनता के बीच भरोसा कायम करने के तौर-तरीके इस्तेमाल करने पड़ेंगे। हम कुछ अरसा पहले कांग्रेस के सिलसिले में यह भी लिख चुके हैं कि कांग्रेस को यह भी सोचना चाहिए कि वह पार्टी को बचाना चाहती है, या उसके पारिवारिक वारिस को। क्या एक पार्टी की जिम्मेदारी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी से अधिक नहीं होती है? आज भाजपा और एनडीए के तेवरों और तौर-तरीकों के खिलाफ किसी भरोसेमंद के उठकर खड़े होने पर विपक्ष की बड़ी संभावनाएं हैं। लेकिन यहां पर सबसे अहमियत वाला शब्द, भरोसेमंद, है। कांग्रेस आज घर बैठी पार्टी के बजाय एक सक्रिय पार्टी दिख रही है। लेकिन वह शायद इस उम्मीद में है कि जनता अगले चुनाव के आने तक यूपीए की दस साल की सरकार के कामकाज, और कांग्रेस पार्टी के गलत कामों को भूल जाएगी। हो सकता है कि यह असल जिंदगी में सच भी हो, लेकिन हमारा मानना है कि कांग्रेस को ऐसी उम्मीद से परे भी जनता के प्रति जवाबदेही का जिम्मा निभाना चाहिए। 

दिल्ली में टकराव निहायत गैरजरूरी, पूर्ण राज्य बने

19 मई 2015
संपादकीय

दिल्ली का हाल बेहाल। प्रधानमंत्री दुनिया भर में घूम-घूमकर कहीं मंगोलियाई सारंगी बजा रहे हैं, तो कहीं किसी देश का नगाड़ा पीट रहे हैं। और इधर घर में दिल्ली की राज्य सरकार को वहां के उपराज्यपाल पीट रहे हैं, और केंद्र सरकार मजा ले रही है। दिल्ली की संवैधानिक व्यवस्था को न जानने वालों को यह मुश्किल से समझ आएगा कि वहां का मुख्यमंत्री पुलिस को काबू नहीं करता, सरकार के बहुत से दूसरे कामकाज को भी काबू नहीं करता। दिल्ली के कई मामलों में उपराज्यपाल के मार्फत केंद्र सरकार का काबू रहता है, और पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने इस शहर-प्रदेश में झाड़ू लगाकर भाजपा को बाहर निकाल फेंका था, उसके चलते दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते सांप-नेवले से बेहतर न होने थे, और न हैं। नतीजा यह है कि दिल्ली राज्य और केंद्र सरकार के बीच की संवैधानिक व्यवस्था का नाम लेकर दोनों सरकारों के बीच किसी झगड़ालू सास-बहू जैसे टकराव चल रहे हैं, और आज शाम मामला राष्ट्रपति तक जा रहा है, कल तक संविधान-विशेषज्ञ वकील सुप्रीम कोर्ट इसे ले जा सकते हैं।
दरअसल दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग बहुत दशकों से चली आ रही है, और यहां तब भी टकराव जारी रहता है जब केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार रहती है। यह नौबत देश के लिए और इस प्रदेश के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है, जहां पर की राज्य के मुख्यमंत्री एक बहुत ही टकरावपरस्त अरविंद केजरीवाल हैं, और जहां पर केंद्र चला रही भाजपा अपनी जिंदगी की शायद सबसे शर्मनाक शिकस्त झेलकर इस राज्य की विधानसभा में हाशिए के भी किनारे पर पहुंची हुई है। लोकतंत्र में यह नौबत बिल्कुल ठीक नहीं है, और बिना देर किए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने का काम करना चाहिए। इससे हो सकता है कि अगले कुछ बरस अरविंद केजरीवाल और उनके आम आदमी पार्टी के हाथ मजबूत हों, लेकिन केंद्र सरकार को यह याद रखना चाहिए कि सन 2000 में जब तीन नए राज्य बने थे, तो छत्तीसगढ़ में गैरभाजपाई सरकार बनी थी। उस वक्त देखा जाए तो केंद्र में एनडीए की सरकार थी, और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक किस्म से छत्तीसगढ़ में कांगे्रस की सरकार के साथ यह राज्य बनाया था।
दिल्ली की स्थिति को जो लोग एक अलग किस्म की जटिल राष्ट्रीय राजधानी की स्थिति बताते हैं, और पूर्ण राज्य के दर्जे के खिलाफ हैं, उनका भरोसा भारत के संघीय ढांचे में कुछ कम है। दिल्ली सरकार वहां की पुलिस को काबू नहीं कर सकती यह सोचना केंद्र सरकार के एक घमंड के अलावा और कुछ नहीं है। किसी भी राज्य की सरकार हर किस्म का काम कर सकती है, और दिल्ली शहर की सरकार से दस-दस गुना बड़े प्रदेश इस देश की निर्वाचित सरकारें चला रही हैं। एक राज्य के साथ ऐसा संवैधानिक टकराव ठीक नहीं है, और जितने भारी बहुमत से केजरीवाल मुख्यमंत्री बने हैं, और भाजपा जिस कदर मटियामेट हुई है, उसे देखते हुए उस राज्य में मुख्यमंत्री को नीचा दिखाने की कोशिशें मोदी सरकार को ही नीचा दिखा रही हैं, और उनकी सरकार और पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा।

बयालीस बरस की बेहोशी के बाद की मौत से उठे सवाल

संपादकीय
18 मई 2015

मुम्बई के एक नामी अस्पताल में वहीं के एक वार्डब्वॉय के हमले और बलात्कार की शिकार एक नर्स आज 42 बरस लंबे कोमा के बाद चल बसी। उसे जिंदा रखने को वहां की नर्सों ने एक चुनौती माना था, और सबने रात-दिन मेहनत करके उसे जिंदा रखा था, लेकिन उसकी हालत पूरी तरह की बेहोशी की थी। और यह अस्पताल के समर्पित सहकर्मियों की वजह से ही मुमकिन हो पाया था कि वह जिंदा रही, और बिस्तर पर लगातार रहने से होने वाले जख्मों से बची भी रही। उसकी मौत ने एक बार फिर बलात्कार की तरफ ध्यान खींचा है, और चारों तरफ अस्पताल की नर्सों की तारीफ भी हो रही है कि पेशे का समर्पण ऐसा होता है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट तक एक अपील भी की गई थी कि ऐसे जिंदगी के बजाय उसे गुजर जाने की इजाजत दी जानी चाहिए, लेकिन नर्सों के समर्पण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी। उसके परिवार ने भी उसे बहुत बरस पहले भुला दिया था। 
अब इस मौत के बाद एक सवाल यह उठता है कि क्या जीवनरक्षक तरीकों से किसी मरीज को इस हालत में इतनी लंबी जिंदगी देने का कोई औचित्य है? सहकर्मी नर्सों ने जो बीड़ा उठाया था, वह उनके पेशे की निष्ठा भी थी, और सहकर्मी के लिए उनका अतिरिक्त समर्पण भी था। लेकिन इस देखरेख से परे भी एक अस्पताल की सुविधाएं 42 बरसों तक इस हाल में पहुंच चुकी जिंदगी की बस सांसों को जारी रखने के लिए लग रही थीं, और इस देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें अस्पतालों में मामूली इलाज भी नहीं मिल पाता है।
 यहां पर दो-तीन अलग-अलग मुद्दे उठते हैं। पहला तो यह कि जब जिंदगी से परे एक धड़कन वाले मुर्दा शरीर जैसी हालत हो जाए, तो उसे कब तक जारी रखना चाहिए? एक दूसरा मुद्दा कल ही हमने छापा है कि किस तरह दक्षिण भारत में कोमा में चले गए, और दिमाग से मर चुके एक आदमी के परिवार ने उसके हाथों को अफगानिस्तान के एक ऐसे जख्मी को दान किया जिसके दोनों हाथ कट चुके थे। और अब लंबे ऑपरेशन के बाद वे हाथ फिर से एक चलते-फिरते जिंदा शरीर में काम आ रहे हैं। क्या लोगों की स्थायी बेहोशी, या कोमा, या दिमागी मौत की हालत ने उनके अंग दूसरों के काम नहीं आने चाहिए? क्या ऐसी बेहोश जिंदगी के बजाय एक सम्मानपूर्ण मौत देना बेहतर नहीं है? 
ऐसा ही एक दूसरा मामला कुछ बरस पहले दिल्ली से सामने आया था जब वहां एक सरकारी अस्पताल में भर्ती एक मरीज 19 बरस बाद कोमा में ही चल बसा था। वह वहां का एक दमकल कर्मचारी था, जिसे कि मुफ्त इलाज का अधिकार था, इसलिए उसे अस्पताल का एक कमरा मिल गया, और 19 बरस की बेहोशी के बाद उसकी लाश ही वहां से निकली। इन बरसों में पूरा परिवार उस बेहोश आदमी के साथ अस्पताल में रहते, आते-जाते तबाह हो गया था। ऐसी जिंदगी भी क्या जिंदगी जो कि पूरे घर का जीना खत्म कर दे? और दक्षिण भारत की यह मिसाल सामने है जिसमें परिवार के लोगों ने दिल कड़ा करके अपने घर के एक धड़कते हुए आदमी के दोनों हाथ दान कर दिए। दुनिया में जगह-जगह ऐसे मामले सामने आते हैं जिसमें एक छोटे बच्चे को शरीर के अंगों ने आधा दर्जन लोगों तक को नई जिंदगी दी है। 
लोगों को अपने जीते-जी अपने परिवार के लोगों को तैयार करना चाहिए कि वे उनकी ऐसी नौबत होने पर अस्पतालों में उन्हें अंतहीन जिंदा रखने की कोशिश न करें। ऐसा करके कई लोग परिवार को दीवालिया भी बना देते हैं, और अधिकतर मामलों में परिवार का जीना हराम हो जाता है। जिंदगी को लंबा खींचने वाले मेडिकल-उपकरणों की क्षमता तो अंतहीन हो सकती है, लेकिन जिंदगी के मोह को छोडऩा भी जरूरी है। भारत में अभी स्वैच्छिक मृत्यु, यूथेनेसिया, पर बहस चल रही है। कानून अभी बहुत दूर है। लेकिन भारत के कुछ धर्मों में पहले से ऐसी परंपराएं हैं कि लोग आखिरी वक्त करीब पाकर, या मृत्यु चाहने पर, खाना-पीना बंद करके मौत की तरफ बढ़ जाते हैं। हम इनसे परे फिलहाल सबसे आसान, और शायद सबसे मुश्किल भी, रास्ता सुझा रहे हैं कि कोमा में जाने के बाद कृत्रिम सांस देकर जिंदगी को लंबा नहीं खींचना चाहिए, और दो-चार दिन की कोशिश के बाद शरीर के अंग दान करने की वसीयत हर जिम्मेदार व्यक्ति को करके जाना चाहिए। 

अमरीकी नेताओं से हिन्दुस्तानी नेताओं को सीखने की जरूरत...

17 मई 2015
संपादकीय

अमरीकी राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन, और अमरीकी विदेश मंत्री रहीं उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन ने पिछले एक बरस में भाषण देकर करीब डेढ़ सौ करोड़ रूपये कमाए हैं, और एक किताब से करीब तीस करोड़ रूपये और। हिलेरी क्लिंटन अमरीकी राष्ट्रपति के अगले चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हो सकती हैं, और यह पैसा चुनाव में भी काम आ सकता है, या फिर बिल क्लिंटन ने जो लाइब्रेरी बनवाना शुरू किया है, उसमें भी काम आ सकता है, या फिर यह पूरी तरह से निजी कमाई होने से वे इसका निजी इस्तेमाल भी कर सकते हैं। अमरीका में भूतपूर्व राष्ट्रपति इसी तरह खासी कमाई करते हैं, और कई लोग ट्रस्ट बनाकर अपनी पसंद की एक जगह पर लाइब्रेरी भी बनवाते हैं। अमरीकी राष्ट्रपतियों से अलग रूस के राष्ट्रपति रहे मिखाइल गोर्बाच्येव ने भी दुनिया में व्याख्यानमाला में जाकर खासी कमाई की थी। 
संपन्न दुनिया में लोग किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के भाषण सुनकर उससे अपने निजी जीवन में फायदा उठाने के लिए खासा भुगतान भी करते हैं। भारत की राजनीति में देखें तो लोग अपने खर्च पर भीड़ जुटाते हैं, और उन्हें अपनी बात सुनाते हैं। भारत में शायद कोई ऐसा नेता न हो जो कि अपने भाषणों को बेच सकता हो। लेकिन विचारों को बेचना और उससे अपना घर चलाना, अपना चुनाव चलाना एक शानदार तरीका है। लोग सरकार में रहकर दलाली करते हैं, काला धन जुटाते हैं, और भ्रष्टाचार करके पिछले चुनाव के पूंजीनिवेश की वसूली करते हैं, और अगले चुनाव के लिए तैयारी रखते हैं। दरअसल भारत की राजनीति में, यहां के चुनाव में, और देश के तमाम किस्म के बाकी कारोबार में भी कालेधन का हिस्सा इतना अधिक है, इतनी बड़ी समानांतर अर्थव्यवस्था है, कि लोग एक नंबर में काम करना ही नहीं चाहते। और राजनीति में तो दो नंबर के पैसों का इतना बड़ा बोलबाला रहता है, वोटों को इस बेशर्मी के साथ खरीदा जाता है, वोटों के पहले टिकटें खरीदी जाती हैं, चुनाव के दौरान मीडिया खरीदा जाता है कि यहां सफेद पैसों से ये सब काम न किए जाते, और न हो सकते। 
लेकिन भारत को अमरीका से जो कुछ बातें सीखने की हैं, उनमें नेताओं के कमाने के तरीके भी हैं। यह एक अलग बात है कि भारत में उच्च-मध्यम वर्ग या संपन्न तबका, इतने बड़े नहीं हैं, जितने कि अमरीका में हैं। लेकिन वहां भी हर कोई तो टिकट खरीदकर भाषण सुनने नहीं जाते। न ही हर कोई किताबें खरीदते हैं। इन दोनों कामों के लिए जितनी फीस लग सकती हैं, जितने दाम देने पड़ सकते हैं, उतना खर्च उठाने वाले हिन्दुस्तानी भी कम नहीं हैं। इस देश में भी ऐसा सिलसिला शुरू होना चाहिए कि लोगों से टिकट, दाम, या चंदे की शक्ल में कमाई की जा सके। लोगों को याद होगा कि अरविंद केजरीवाल ने जब चुनावी राजनीति शुरू की, तो उन्होंने दावतों का इंतजाम करके उनमें टिकट रखकर लोगों को खाने पर बुलाया था, और खासा पैसा इक_ा किया था। कुछ विवादों को छोड़ दें, तो आम आदमी पार्टी ने इंटरनेट पर भी चुनावी चंदा अच्छा-खासा इक_ा किया था, और दसियों हजार लोगों ने अपने नाम से अपना एक नंबर का पैसा दिया था। इस देश में बाकी लोगों को भी जनता के बीच से पैसा जुटाने के लिए भाषण या किताब जैसी तरकीबें इस्तेमाल करनी चाहिए, इससे उनकी ताकत भी साबित होगी, और वे खुद, उनकी पार्टी कालेधन पर निर्भर रहने के बजाय ईमानदारी से काम कर सकेंगे। 

मोदी का पहला साल, एक विदेशी मोर्चा और एक देशी मोर्चा बड़े मुद्दे

संपादकीय
16 मई 2015
मोदी सरकार का एक बरस पूरा होने पर देश भर में उसका मूल्यांकन किया जा रहा है। लेकिन मोटे तौर पर यह मूल्यांकन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक सीमित है, और यह पहला साल न सिर्फ उनकी सरकार का एक साल है, बल्कि अपने सबसे करीबी, सबसे भरोसेमंद सहयोगी अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद का लगभग पहला साल भी है। इसलिए भारत सरकार के मुखिया और पार्टी के परोक्ष मुखिया के रूप में नरेन्द्र मोदी का मूल्यांकन दो पैमानों पर किया जाना चाहिए, और शायद होगा भी। 
हम अभी सरकार की बहुत बारीकियों पर जाना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि चुनाव में मोदी के किए गए वायदे, और आसमान पर दिखाया गया इन्द्रधनुष हकीकत में बदलने के लिए अभी उनके पास चार बरस बाकी हैं। लेकिन अब तक जिन मुद्दों पर मोदी का कामकाज और उनका रूख एकदम खुलकर साफ है, उनकी खूबियां और खामियां साबित हो चुकी हैं, उनकी कामयाबी और नाकामयाबी की मिसालें सामने हैं, उन मुद्दों पर मोदी के पहले साल को कसौटी पर कसने का मौका है। 
नरेन्द्र मोदी यूपीए सरकार के दस बरस, और खासकर बर्बाद आखिरी पांच बरस के बाद एक राजनीतिक और शासकीय शून्य की नौबत में प्रधानमंत्री बने। और जैसा कि आसमानी हवाओं के बीच शून्य बनने पर वहां हवा आंधी बनकर दाखिल होती है, मोदी के साथ कुछ वैसा ही हुआ। छोटी-छोटी बातों पर उनकी खामियां देखने के पहले हम यह याद करना चाहेंगे कि जिस नेता ने केन्द्र सरकार में या पार्टी के केन्द्रीय ढांचे में एक दिन भी काम नहीं किया था, वह नेता आज अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर, और विदेश नीति के मामले में हिन्दुस्तान का सबसे अधिक सक्रिय नेता बन गया है। पहले एक बरस में मोदी ने जितने महत्वपूर्ण देशों के साथ जितने किस्म के संबंध बनाए हैं, उनका नफा-नुकसान तो दिखने में वक्त लगेगा, लेकिन क्या किसी ने एक बरस पहले यह सोचा था कि मोदी अमरीकी राष्ट्रपति को उनका नाम, बराक, लेकर सार्वजनिक रूप से बुलाने वाले नेता कुछ महीनों में ही बन जाएंगे? विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कामयाबी या नाकामयाबी कुछ महीनों के भीतर नहीं दिखती, लेकिन मोदी ने जिस तूफानी रफ्तार से देशों के बीच भारत की खोई हुई जगह को दुबारा स्थापित किया है, वह उम्मीद से दुगुना, और अभूतपूर्व है। 
अब जो दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात मोदी के पहले बरस की है, उन्होंने एक उग्र और आक्रामक हिन्दू नेता की अपनी छवि को सुधारने के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जैसा कि भारत के प्रधानमंत्री को करना चाहिए था, और जैसा करने पर मोदी का कद अपने मौजूदा कद से अधिक बढ़ा होता। उनकी सरकार के मंत्री, उनकी पार्टी के सांसद, उनके सहयोगी संगठनों के अलग-अलग नेता, देश में एक अभूतपूर्व साम्प्रदायिकता और कट्टरता की बात कर रहे हैं, और वे उनको न रोकते दिखते हैं, और न ही उनकी पार्टी रोकने का काम कर रही है। नतीजा यह है कि अमरीकी पत्रिका, टाईम, को मोदी एक इंटरव्यू में जिस तरह की सर्वधर्म समानता की बातें कर रहे हैं, उनकी सरकार, उनकी पार्टी, और उनके साथी वैसा कुछ करते दिख नहीं रहे हैं। हो सकता है कि यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा हो, और देश में बहुसंख्यक हिन्दू वोटों को ध्यान में रखते हुए मोदी बिना अपनी जुबान खराब किए हुए, बाकी लोगों को ऐसा कहने की छूट दे रहे हों, लेकिन उनकी सारी अंतरराष्ट्रीय सक्रियता के बावजूद इस घरेलू मोर्चे पर इस एक बरस में वे नाकामयाब रहे हैं। देश में न सिर्फ अल्पसंख्यक समुदायों, बल्कि बहुसंख्यक हिन्दू समाज की एक बहुसंख्यक मांसाहारी आबादी की खानपान की जीवनशैली के खिलाफ जिस आक्रामक अंदाज में गोवंश कानून को लागू करवाया जा रहा है, शायद उसके नुकसान भी मोदी को आज दिख नहीं रहे हैं। 
पिछली सरकार की दस बरस की लंबी आर्थिक नीतियों में फेरबदल करके इस एक बरस में उसके नतीजे तश्तरी पर पेश कर देने का जादू कोई नहीं कर सकता था। इसलिए हम अभी उस मोर्चे का अधिक विश्लेषण यहां करना नहीं चाहते। लेकिन देश के बाहर और देश के भीतर मोदी की जो अतिसक्रियता है, और जिस तरह वे बिना किसी रिमोट कंट्रोल के काम करते दिख रहे हैं, वह अपने आपमें पिछले प्रधानमंत्री के मुकाबले इतने फर्क की बात है कि जनता अभी उसे निहारने में ही लगी हुई है। दरअसल यूपीए ने अपने आपको अपने कुकर्मो से जिस तरह गटर में डाल रखा था, उसके मुकाबले फुटपाथ पर खड़ा कोई आम नेता भी ऊंचे चबूतरे पर खड़ा दिखता। मोदी को अपने पहले एक बरस में यह फायदा मिला है। लेकिन संसद और पार्टी में अपने ऐतिहासिक बाहुबल का इस्तेमाल करके वे अगर देश के एक बड़े नेता बनने का मौका खोकर महज एक हिन्दू नेता बने रहेंगे तो वह महानता का एक मौका खो भी बैठेंगे। मोदी के बारे में हमारा विश्लेषण किसी मोहब्बत और नफरत से परे का है, और उनका यह पहला साल इन दो अलग-अलग मुद्दों के साये तले गुजरा है, बाकी बातें आगे फिर कभी। 

पीएम के स्वागत में अफसरों की पोशाक पर नोटिस, और उससे जुड़ी कुछ बातें

विशेष संपादकीय
15 मई 2015

-सुनील कुमार

प्रधानमंत्री के छत्तीसगढ़ प्रवास पर दो जिलों में उनके स्वागत को खड़े हुए कलेक्टरों को इस बात के लिए नोटिस मिला है कि उनकी पोशाक प्रधानमंत्री की अगुवानी के लिए सरकारी शिष्टाचार नियमों में निर्धारित रस्मी पोशाक नहीं थी। एक कलेक्टर को मिले नोटिस में इस बात को भी आपत्तिजनक माना गया है कि प्रधानमंत्री का स्वागत करते हुए वह धूप का चश्मा लगाए हुए था। पिछले कुछ दिनों से मीडिया और सोशल मीडिया में इन दो कलेक्टरों की तस्वीरें चक्कर लगा रही थीं, और सरकार से उम्मीद की जा रही थी कि इन्हें टांगा जाए। आखिर राज्य सरकार ने इस आधार पर यह नोटिस दिया कि इन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं के नियम के एक हिस्से के खिलाफ काम किया है, जो नियम कहता है कि इन सेवाओं के अधिकारी हर समय पूर्णत: सत्यनिष्ठा (इंटिग्रिटी) और समर्पण से काम करेंगे, और ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो कि ऐसे अधिकारी से अपेक्षित न हो। 
केन्द्र सरकार का गढ़ा हुआ यह नियम, या शिष्टाचार के पैमाने ऐसे हैं जिनके तहत बहुत सी बातें आ सकती हैं, और आती हैं। जैसे कि पुलिस के पास एक दफा है जो किसी भी गरीब बेबस को गिरफ्तार करने के काम आती है, यह दफा कहती है कि  गिरफ्तार व्यक्ति चोरी की नीयत से, लुकी-छिपी हालत में पाया गया। लेकिन हम आज की इस बहस को आसमान जैसे विस्तार वाले नियमों पर ले जाना नहीं चाहते, केवल सरकारी शिष्टाचार के नियमों और परंपराओं तक सीमित रखना चाहते हैं। मई-जून के महीने में भी जब इस गर्म देश के इसी गर्म प्रदेश में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पहुंचते हैं, तो चिलचिलाती धूप में भी खुले विमानतल पर अधिकारियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे बंद गले के कोट या जॉकेट में रहें, और ऐसे स्वागत से परे भी सरकार के नियमित कामकाज में बहुत से लोग अपनी पसंद से भी इस किस्म की औपचारिक पोशाक में रहते हैं जो कि इस देश के मौसम के ठीक खिलाफ जाती है। हो सकता है कि सरकार के शिष्टाचार नियम कहते हों कि गर्मी चाहे जितनी हो, धूप चाहे कितनी हो, अफसर को बंद गले के कपड़ों में ही रहना चाहिए, लेकिन एक इंसान की गैरसरकारी, गैरराजकीय, और गैरसामंती सामान्य समझबूझ यह कहती है कि लोगों के कपड़े मौसम और कामकाज के, काम की जगह के हिसाब से सुविधाजनक होने चाहिए। इसलिए अगर केन्द्र सरकार के ऐसे कोई बेवकूफी भरे नियम हैं भी, तो भी उनको एक पार्सल बनाकर उन अंग्रेजों को भेज देना चाहिए, जिनका छोड़ा हुआ मैला सिर पर ढोते हुए भारत में सरकारों और अदालतों के लोग गर्व हासिल करते हैं। 
हमारी इन दो अफसरों के लिए अलग से कोई हमदर्दी नहीं है, और जब तक इस देश में बेवकूफी भरा हुआ ऐसा शिष्टाचार जनता के पैसों से लागू है, तब तक ये अफसर या तो उसे ढोएं, या फिर उसे अदालत में चुनौती दें। हमें सरकार के इस नोटिस से भी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन इस देश की सामंती व्यवस्था से शिकायत है जो कि जनता के पैसों से जनता को कुचलते हुए कुछ लोगों के झूठे घमंड को सहलाते हुए कायम है। जिस देश में लाखों बच्चे हर बरस कुपोषण के शिकार होकर मर जाते हैं, वहां का राष्ट्रपति सौ-सौ अरबी घोड़ों पर सवार सौ-सौ गैरजरूरी अंगरक्षकों की परेड में अकबर की तरह चलता है, जहां पर राज्यपालों के साथ बसों में सवार होकर पुलिस बैंड चलता है कि राज्यपाल के कार्यक्रम के पहले और बाद में राष्ट्रगान बजाया जाए, जहां पर सुप्रीम कोर्ट में जज या वकील ऐसे लबादे ओढ़कर चलते हैं, जो कि चित्रकथाओं में मैनड्रेक पहने दिखता है, या कि हॉलीवुड की फिल्मों में सुपरमैन ओढ़े हुए दिखता है, रिवाजों के ऐसे पाखंड से लदे हुए देश पर धिक्कार है। यह सारा तमाशा जनता का पेट काटकर बर्बाद की जाने वाली बिजली से ठंडे किए जाने वाले कमरों में होता है, और जिस देश का आधा हिस्सा अंधकार में डूबे रहता है, वहां पर एक-एक नेता या अफसर जनता के सौ-सौ ट्यूबलाईट जितनी बिजली एक-एक एसी पर खर्च करते हैं। जब अफसरों या मंत्रियों के बीच गर्म महीनों में भी मोटे-मोटे कोट और जॉकेट पहनकर चलने को शान माना जाता हो, जहां अफसरों के लिए इसे शर्त बना दिया गया हो, वहां पर लोगों ने यह सोचना बंद कर दिया है कि इस गर्म देश में यह सिलसिला शुरू कैसे हुआ? 
दरअसल यहां राज करने वाले अंग्रेज एक ठंडे देश से आए थे, और वहां पर बंद और मोटे कपड़े पहनना जिंदा रहने की मजबूरी थी। उन्होंने भारत को आजाद करने के साथ-साथ रिवाजों की जो जूठन छोड़ी, उसे आजादी के आज करीब पौन सदी बाद भी हिन्दुस्तानी गर्व से ढो रहे हैं। ट्रेनों में टीटी से लेकर अदालतों में वकील तक पसीने के मौसम में भी काले कोट पहनने को मजबूर हैं, क्योंकि गोरों के छोड़े गए चिथड़ों से बाहर आने का हौसला हिन्दुस्तानियों में नहीं है। 
ऐसे सारे शिष्टाचार और रिवाज खत्म किए जाने चाहिए जो कि सामंती थे, और सामंती हैं। कल तक वे हिन्दुस्तान के गुलाम लोगों के खून-पसीने से चलते थे, और आज जो हिन्दुस्तान के तथाकथित आजाद लोगों के खून-पसीने से चल रहे हैं। महाराष्ट्र में अभी-अभी मंत्रियों और अफसरों को जिलों में दी जाने वाली पुलिस-सलामी बंद कर दी गई है। इसमें पुलिस की एक सलामी गारद बर्बाद होती थी, जिसे नौटंकी जैसे कपड़े पहनाकर केवल इसी काम के लिए रखा जाता था। जिस देश में विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक पेशी पर ले जाने के लिए पुलिस कम पड़ती हो, और बरसों तक बिना सजा कैदी जेल में रहने को मजबूर रहते हैं, वहां पर सलामी के लिए पुलिस का इस्तेमाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है। सत्ता पर बैठे हुए लोगों को इस बात में बड़ा मजा आता होगा कि वे जहां जाएं, वहां उन्हें सलामी मिले। लेकिन ऐसे लोग किसी सलाम के हकदार भी नहीं हो सकते जो कि देश की गरीब जनता के पैसों से इस अंग्रेजी केक की जूठन को लोकतंत्र के फ्रिज में सम्हालकर रख रहे हैं। 
आज हिन्दुस्तान में बहुत सी बुरी सरकारी बातें जनहित याचिकाओं पर अदालती फैसलों से ही खत्म हो पा रही हैं, क्योंकि सत्ता पर बैठे लोग खुद अपनी सामंतशाही को कम करना नहीं चाहते। सरकार के ऐसे तमाम फिजूलखर्च-शिष्टाचार के खिलाफ किसी को अदालत जाना चाहिए, और लोगों के बदन से ऐसे गैरजरूरी कपड़ों की बंदिश खत्म करवानी चाहिए, जिनके लिए जनता की बिजली से कमरों को भारी ठंडा करके रखना जरूरी होता है। आज केन्द्र या राज्य सरकार की बैठकों को देखें, तो तस्वीरों से ठंडक का तो पता नहीं लगता, लेकिन कोट-जॉकेट से यह जरूर पता लगता है कि कमरों को कितना अधिक ठंडा बनाए रखने के लिए, कितनी अधिक बिजली झोंकी जा रही होगी। हिन्दुस्तानियों को, खासकर आजाद हिन्दुस्तान में पैदा होने वाले हिन्दुस्तानियों को इतने दुस्साहस की जरूरत है कि अंग्रेजों के छोड़कर गए हुए हिन्दुस्तान-विरोधी रीति-रिवाजों को, पाखंडों को, जनता के खून से सींचकर जिंदा न रखें, उसे खत्म करें। 
यह बात भी अजीब है कि चिकित्सा विज्ञान धूप में आंखों को बचाए रखने के लिए जिस तरह के चश्मे सुझाता है, वैसा चश्मा लगाने पर एक अफसर को नोटिस मिला है। कल की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन की तस्वीरें देखें, तो वे वहां टेराकोटा-आर्मी संग्रहालय के भीतर भी धूप का चश्मा लगाए दिख रहे हैं। अब यह कौन सा शिष्टाचार है कि प्रधानमंत्री का इंतजार करते हुए अफसर धूप में अपनी आंखों को भी अल्ट्रावायलेट किरणों से न बचाए? कई मौकों पर हेलीकॉप्टरों से उडऩे वाली धूल से अपनी आंखों को न बचाए? यह शिष्टाचार और सेवा नियमों के नाम पर एक बड़ा पाखंड है, और किसी हौसलेमंद अफसर या सामान्य नागरिक को इसे अदालत में चुनौती देनी चाहिए ताकि पूरे देश में जनता के पैसों की किस्म-किस्म से बर्बादी टले, और इस देश के लोग अपने मौसम और अपनी जरूरत के मुताबिक आम कपड़ों में रहने की आजादी पा सकें। 

बाल मजदूरी के मौजूदा कानून और नए प्रस्तावित कानून का हकीकत से लेना-देना नहीं

संपादकीय
14 मई 2015

भारत के बाल मजदूरी कानून में केन्द्र सरकार ने एक बड़ा बदलाव किया है कि अब 14 साल से कम उम्र के बच्चे भी बिना जोखिम वाले पारिवारिक कामकाज, मनोरंजन उद्योग, और खेल से जुड़े कामों में मजदूरी कर सकेंगे। लेकिन ऐसा काम वे स्कूल के समय को छोड़कर बाकी वक्त में ही कर सकेंगे। इसके साथ-साथ सरकार ने इन रियायतों से परे के बाकी किस्म के काम में बाल मजदूरी करवाने लायक लोगों के लिए सजा बढ़ाने का भी संशोधन किया है। अब ऐसा पकड़ाने पर तीन साल तक कैद दी जा सकेगी, और पचास हजार रूपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। 
देश में बाल मजदूरों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले लोग ऐसे फेरबदल के खिलाफ हैं, और उनका मानना है कि इससे गरीब बच्चों के स्कूल जाने में कमी आएगी, और मां-बाप चाहे मजबूरी-बेबसी में ही, बच्चों को पारिवारिक काम में लगाएंगे, और उनको स्कूल भेजने की बंदिश लागू करना मुश्किल होगा। 
हम जब भारत में बाल मजदूरी की हकीकत देखते हैं तो सरकार का कानून एक पाखंड लगता है, और बाल मजदूरों के हक के लिए लडऩे वाले आंदोलनकारियों के मुद्दे हवा-हवाई लगते हैं। इस देश भर में किसी भी शहर-कस्बे में चले जाएं, तो हर चौराहे पर चाय ठेले या फुटपाथी होटल पर काम करते ऐसे बाल मजदूर दिखते हैं जिनके हाथ-पैर की उंगलियां पानी में डूबे-डूबे सड़ चुकी होती हैं। वे न सिर्फ बाल मजदूर होते हैं, बल्कि वे बंधुआ मजदूर भी होते हैं। और उन्हीं की उम्र के बच्चों के मां-बाप जो रहते हैं, वे समाज को चलाते, सरकार को चलाते, अदालतों को चलाते, ऐसे बच्चों को देखते चलते हैं। लेकिन निगाहों के सामने के इन बाल मजदूरों से परे के ऐसे करोड़ों बाल मजदूर हिन्दुस्तान में हैं जो कि कारखानों में, गंदी जगहों पर, खतरों के बीच, जहरीली हवा और पानी में बंधुआ मजदूर की तरह काम करते हैं। हिन्दुस्तान की हालत ऐसी है कि बंधुआ बाल मजदूरों की भलाई के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिला है। जाहिर है कि इस मोर्चे पर काम करने को इतना अधिक होगा, तभी तो उन्होंने इस पुरस्कार पाने जितना काम किया होगा। 
ऐसे देश में बाल मजदूरी को रोकने का कानून एक बड़ा पाखंड है जो कि सरकार और समाज को यह दिलासा दिलाता है कि वे लोग बच्चों के लिए कुछ कर रहे हैं। दूसरी तरफ बाल मजदूरी के कानून को और कड़ा बनवाने में, उसकी अमल में लगे हुए लोग इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि उनकी कोशिशें बच्चों को किसी सुरक्षित किनारे पहुंचा रही हैं। इन दोनों के बीच बच्चों की बदहाली देखने लायक है, और ऐसा लगता है कि एक नोबल पुरस्कार से ही बच्चों की हालत बदलने वाली नहीं है। 
लेकिन हम भारत की इस आर्थिक हकीकत को भी अनदेखा करना नहीं चाहते जहां पर किसान कर्ज में डूबकर दसियों हजार की संख्या में हर बरस आत्महत्या कर रहे हैं, और जहां पर बड़े-बड़े संपन्न और विकसित प्रदेशों में कुपोषण के शिकार होकर हजारों बच्चे बेवक्त मर रहे हैं, लेकिन खबर नहीं बन पा रही है, ऐसे देश में बच्चों का काम करना बेहतर है या भूखों मर जाना, यह अंदाज लगा पाना बड़ा मुश्किल है। स्कूल की पढ़ाई है तो बहुत अच्छी, लेकिन क्या उसे जिंदगी की कीमत पर ही सुझाया जा सकता है? ऐसे बहुत से तकलीफदेह, और शर्मिंदगी खड़ी करने वाले सवाल भारत में हर चौराहे पर खड़े हैं। बाल मजदूर बहुत से घरों के चूल्हों के लिए जरूरी हैं, और ऐसे घरों को मजदूरी के बजाय पढ़ाई सुझाना पता नहीं किस हौसले के साथ किया जा सकता है। 
हम मौजूदा कानून और प्रस्तावित नए कानून को लेकर आनन-फानन कोई राय देना नहीं चाहते, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि कानूनों का हकीकत से अधिक लेना-देना नहीं है। 

पाकिस्तान की ताजा हिंसा और भारत के लिए सबक

संपादकीय
13 मई 2015
पाकिस्तान में मुस्लिमों के ही एक तबके ने जिस तरह आज मुस्लिमों के एक दूसरे तबके की बस में घुसकर 50 के करीब लोगों को गोलियां मार दीं, उससे धर्म के बारे में सोचने की जरूरत है। यह वही इस्लाम है जिसमें सूफी संत पूरे वक्त ईश्वर से मोहब्बत के गीत गाते हैं, और उनका पूरा फलसफा मोहब्बत से भरा होता है। वे खुदा को प्रेमी या प्रेमिका मानते हुए उससे मोहब्बत की बातें करते हैं, और दूसरी तरफ आज इसी इस्लाम का नाम लेकर दुनिया में ऐसे-ऐसे किस्म की, और ऐसे-ऐसे दर्जे की हिंसा हो रही है, कि उन खबरों को खुलासे से छापना भी मुमकिन नहीं है। अब जब ऐसी हिंसा के लिए किसी धर्म की शर्तों और नसीहतों का नाम लिया जाता है, तो यह लगता है कि किसी एक बात के कितने तरह के सही और गलत मतलब निकाले जा सकते हैं, और एक धर्म मोहब्बत भी सिखा सकता है, और उन्हीं शब्दों के दूसरे मतलब निकालकर नफरत से लहू भी फैलाया जाता है, फैलाया जा रहा है। आज इस्लाम के नाम पर इराक से लेकर अफगानिस्तान तक, और सीरिया से लेकर पाकिस्तान तक, यमन और अफ्रीका के कई देशों तक जिस तरह के जुल्म ढाए जा रहे हैं, जिस तरह से बच्चों और महिलाओं से बलात्कार हो रहा है, जिस तरह बेकसूर लोगों के गले काटे जा रहे हैं, और जिस तरह छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में हथियार थमाकर हत्याएं करवाई जा रही हैं, वह सब तो दुनिया के किसी धर्म में नहीं सिखाया गया है।
दरअसल निजी आस्था तक सीमित रहकर धर्म आस्थावान लोगों की जो मदद कर सकता था, उससे दूर भटककर धर्म पहले तो सार्वजनिक प्रदर्शन का सामान बनाया गया, और फिर उस सार्वजनिक प्रदर्शन में हिंसा और उग्रता जोड़-जोड़कर धर्म के नेताओं और ठेकेदारों ने अपनी ताकत में इजाफा किया। धर्म को इस तरह काम में लाया गया कि लोगों को तमाम किस्म की बेइंसाफी जायज लगने लगे, दूसरों के हक कम लगने लगें, और आस्था के सिर्फ अपने ही तरीके सही लगने लगें। इस्लाम से परे भी आज हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म से जुड़े हुए कई आक्रामक नेता रात-दिन साम्प्रदायिकता और हिंसा की आग उगल रहे हैं। एक धर्म की आग दूसरे धर्म के लोगों को आग उगलने के लिए उकसाती हैं। फिर जब दूसरे धर्म के लोग नहीं बचते, तो फिर अपने ही धर्म के कुछ अलग रिवाजों वाले समाज निशाने पर आ जाते हैं, क्योंकि इक_े किए हुए हथियारों का इस्तेमाल तो करना ही है।
हम पाकिस्तान की इस धार्मिक हिंसा को लेकर भारत के लोगों को सावधान करना चाहते हैं कि जब तक पाकिस्तान में इस्लाम की एक बिरादरी के आतंकियों को गैरमुस्लिम मिलते रहे, तब तक वे उनको मारते रहे। अब जब उंगलियों को बंदूकों के ट्रिगर चलाने की आदत ही हो गई, तो मुस्लिमों के भीतर दूसरी बिरादरी के लोगों को मारना बढऩे लगा है। आज भारत में हिन्दू हो या मुस्लिम, जिस किसी तबके के लोग धार्मिक कट्टरता की बुनियाद पर हिंसा खड़ी कर रहे हैं, वे पहले तो दूसरे धर्म के लोगों को मारेंगे, और फिर अपने ही धर्म के लोगों को भी मारने लगेंगे। हिन्दुस्तान में धार्मिक आधार पर भेदभाव और नफरत को, हिंसा और जुर्म को तुरंत रोकने की जरूरत है। यह बात तसल्ली की नहीं है कि पाकिस्तान की हिंसा के मुकाबले भारत में तो कोई हिंसा नहीं है। एक जरा सी चिंगारी बढ़कर किस तरह देश को जला सकती है, यह हमने 1992 के पहले की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद को गिराने, गोधरा में ट्रेन को जलाने, और फिर गुजरात के दंगों की शक्ल में देखा हुआ है। यह सिलसिला दुबारा खड़े नहीं होने देना चाहिए। आज बिना हथियार हिन्दू धर्म के ही अलग-अलग तबकों के बीच एक बेइंसाफी खड़ी की जा रही है। गोमांस और गोवंश के मांस को लेकर हिन्दुओं का एक छोटा सा सनातनी तबका, हिन्दू आबादी के ही बहुत बड़े हिस्से को हिन्दू धर्म से दूर धकेल रहा है। और आज जिन गलों में नारों के लायक आवाज की ताकत है, वे लोग इस बात से बेफिक्र हैं कि गाय को लेकर की जा रही सामाजिक-जातीय राजनीति से देश किस तरह कट रहा है, हिन्दू समाज किस तरह से बंट रहा है। किसी देश या समाज में जब धार्मिक या किसी और तरह की हिंसा बढ़ाई जाती है, तो वह धर्मान्ध और कट्टरवादी सोच समाज के कई पहलुओं पर हावी हो जाती है। भारत ऐसे खतरे की तरफ बढ़ रहा है, और पाकिस्तान की हिंसा को देखकर उसे यह सबक लेना चाहिए कि किस तरह अलग-अलग धर्म, जाति, और खानपान के सहअस्तित्व को कायम रखा जा सकता है।

सिर्फ मोदी की सभा का नहीं सरकार का ढांचा भी गिरा हुआ

संपादकीय
12 मई 2015
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा के लिए बनाए जाते विशाल डोम को लेकर आने वाली खबरें कई तरह की फिक्र खड़ी करती हैं। वह जगह इस तरह के ढांचे को बनाने के लिए सही नहीं थी, ऐसा मौसम विभाग के लोगों की चेतावनी से पता लगता है  कि वह जगह चारों तरफ से दूर-दूर तक खुली होने की वजह से बवंडर के खतरे वाली थी। यह भी खबर है कि पिछले बरस या दो बरस पहले एक सरकारी ढांचे की दीवार आंधी के चलते ही यहां गिर चुकी थी। यह तो गनीमत है कि मोदी की सभा के वक्त पर ही ठीक एक दिन पहले यह ढांचा गिरा, और यह सोचकर ही घबराहट होती है कि अगर अगले दिन सभा के दौरान ऐसा बवंडर आया होता, और ऐसी तबाही होती, तो उसके नीचे के लाख-पचास हजार लोगों का क्या हुआ होता? फिर खबरें यह भी बताती हैं कि दिल्ली में भाजपा के एक बड़े नेता सुधांशु मित्तल की पारिवारिक कंपनी ने यह डोम बनाने का ठेका कई करोड़ रुपये में लिया था, और लापरवाही से इसका काम करते हुए हादसा होने पर कंपनी के मालिक भाग खड़े हुए। घायल मजदूरों की खबरों के आने के दो दिन पहले यह अखबार ऐसी तस्वीर छाप चुका था जिसमें ऊंचाई पर काम करने वाली मजदूर बिना किसी सुरक्षा बेल्ट के काम कर रहे थे। अभी जो जांच हो रही है, उसमें इस अखबार की ऐसी दर्जनों तस्वीरें सुबूत बन सकती हैं कि किस लापरवाही से मजदूरों की जिंदगी ऊंचाई पर टांग दी गई थी। और यही लापरवाही आखिर तक जारी रही। अब जांच से चाहे जो निकले, लेकिन कम से कम एक मजदूर की मौत तो हो ही चुकी है, और दर्जनों जख्मी भी हैं।
लेकिन लापरवाही यहीं खत्म नहीं होती। घायल मजदूरों को छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा सहित दो बड़े निजी अस्पतालों में भर्ती किया गया, और इस खबर के छपने के भी पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अस्पतालों के संपर्क में थे, और एक से ज्यादा बार वे इन अस्पतालों में जाकर ठीक से इलाज के निर्देश देकर आए थे। लेकिन इसके बाद भी खुद सरकार के अस्पताल, मेकाहारा, में हाल यह था कि अगले दिन वहां से चार जख्मियों के परिवारों ने इलाज न देखकर उनको वहां से निकाला, और दूसरे निजी अस्पतालों में ले जाकर भर्ती किया। अब सवाल यह उठता है कि जहां मुख्यमंत्री जाकर एक-एक घायल की नब्ज टटोल रहे हैं, वहां पर भी अगर खबरों में बने हुए इन घायलों का इलाज सरकारी डॉक्टर ठीक से नहीं कर सकते, तो फिर बाकी मरीजों के लिए उम्मीद ही क्या की जा सकती है?
हम इन बातों को इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि हर हादसे से कुछ सबक लिए जाने चाहिए, और छत्तीसगढ़ में सरकार के अलग-अलग विभागों के ऐसे बहुत से सबक की जरूरत है। इन तमाम बातों को लेकर ढांचे के गिरने के अलावा भी जांच होनी चाहिए, और सरकार को अपने खुद के ढांचे को दुरूस्त करना चाहिए। यह गिरा हुआ ढांचा तो एक दिन के लिए बनाया जा रहा था, लेकिन सरकार का ढांचा चार बरस बाद एक बार फिर जनता की कसौटी पर खड़ा होगा। अभी वक्त बहुत है, लेकिन सरकारी ढांचा बहुत बुरी तरह गिरा हुआ दिख रहा है, और यह राज्य के लिए फिक्र की बात है।

जया की वापिसी

संपादकीय
11 मई 2015
कर्नाटक हाईकोर्ट से जयललिता के बरी होने के साथ ही पिछले हफ्ते से देश के कमजोर तबकों में चली आ रही निराशा और गहरी हो गई है। सलमान खान को जिस तरह से हाईकोर्ट जज ने आनन-फानन राहत दी, और यह कहा भी कि जिसकी क्षमता होती है, उसे अदालतों से फायदा भी मिलता है, उससे भी लोग बहुत निराश थे। हालांकि यह सच्चाई है कि जो लोग महंगे वकील रखकर अदालत के कामकाज को दुह सकते हैं, वे फायदा पाते ही हैं, और यह फायदा नाजायज नहीं है, लेकिन देश के संपन्न और विपन्न तबके के अधिकारों का फर्क बतलाता है। अब तमिलनाडू की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता जिस तरह अनुपातहीन संपत्ति के मामले में बरसों के बाद अब हाईकोर्ट से बरी हो चुकी हैं, और ऐसे आसार हैं कि वे दो-चार दिनों में फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगी, उससे यह लगता है कि देश में लोकतंत्र है कहां? यह लोकतंत्र चुनाव की टिकट खरीदकर, चुनाव में जीत खरीदकर, मंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी खरीदकर हासिल किया जाता है, और फिर इस पूंजीनिवेश की वसूली-उगाही चालू हो जाती है। अदालतों तक मामला अगर जाता भी है, तो लालू यादव जैसे लोग लंबे वक्त तक सजायाफ्ता की हैसियत से भी नेतागिरी करते रहते हैं, और इस देश की धर्मनिरपेक्षता को तय करते रहते हैं। ऐसा ही हाल दूसरी पार्टियों के बहुत से नेताओं का है जो कि जेलों से जमानत पर छूटकर लीडर बने रहते हैं।
अब जयललिता के अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों को देखें, तो उनकी पूरी पार्टी और उनकी पूरी सरकार सामंती युग में जीती हुई दिखती है जहां पर लोग उनके पैरों पर बिछे रहने से अधिक कुछ भी करने के हकदार नहीं हैं। कहने के लिए तो दक्षिण भारत अधिक पढ़ा-लिखा माना जाता है, तमिलनाडू एक संपन्न राज्य भी है, और वहां पर दलित चेतना भी बहुत से राज्यों से अधिक है। लेकिन जिस तरह की कुनबापरस्ती से यह राज्य आजादी के बाद से आज तक के अधिकतर वक्त पर चलते रहा है, वह भयानक है। लोग या तो जया के अन्नाद्रमुक में रहते हुए उनके तलुवे चाटते हैं, या फिर उनकी विरोधी पार्टी द्रमुक में रहते हुए करुणानिधि की कुर्सी के पहिए चूमते हैं। लोकतंत्र के भीतर यह एक भयानक नौबत है, जो कि किसी भी दूसरे किस्म के विकास के बावजूद वैसी की वैसी बनी हुई है। जयललिता राजनीति में एमजीआर की अंतरंग महिला के रूप में आईं, और एमजीआर की कुनबापरस्ती का फायदा उन्होंने पाया, और अपनी एक तानाशाही कायम की। लेकिन कम पढ़े-लिखे और कम विकसित उत्तर भारत को अगर देखें, तो मुलायम का कुनबा, लालू का कुनबा, एक से एक नमूने उत्तर भारत में भी हैं, समाजवाद के नाम पर भी हैं, क्षेत्रीय राजनीति में भी हैं, और राष्ट्रीय राजनीति में भी हैं।
आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, लेकिन किसी भी तरह के जुर्म, किसी भी तरह के मुकदमे, किसी भी तरह की कुनबापरस्ती घटने का नाम नहीं ले रहे। जयललिता की दुबारा वापिसी लोकतंत्र के मुंह पर कानून से मंजूर तमाचे की तरह होगी। और अब उनके पैरों पर पड़े रहने वाले उनके नेता उनके सामने जमीन को कुछ खोदकर उनके पैरों से नीचे के स्तर पर लेटेंगे, क्योंकि जिस लेवल पर जया के पैर हैं, उस लेवल पर उनके चापलूसों को लेटने का दुस्साहस कैसे हो सकेगा?

कमाऊ मुजरिम को सजा से समाज को कमाई क्यों नहीं?

संपादकीय
10 मई 2015
पिछले तीन-चार दिनों से देश का मीडिया और इंटरनेट पर सोशल मीडिया सलमान खान को मिली कैद, और फिर प्रकाश की किरण की रफ्तार से मिली जमानत को लेकर उबल रहे हैं। कुछ लोग सलमान के समर्थन में, और बाकी लोग सलमान और अदालत के खिलाफ उफन रहे हैं। बात घूमफिरकर यहां आ रही है कि मरने वाले बेकसूरों को मारने वाला फिर कश्मीरी जाकर शूटिंग करने लगा, करोड़ों कमाने लगा, और फुटपाथ पर जो कुचले गए थे, वे लोग अब तक फटेहाल हैं।
हम सलमान खान के लिए अलग से किसी रियायत के हिमायती नहीं हैं, लेकिन सजा के पीछे की सोच, और सजा के असर पर इस मामले से परे भी कुछ विचार करने की जरूरत है। हम यहां पर सजा के प्रावधानों में एक नए किस्म के लचीलेपन की बात सोच रहे हैं। क्या ऐसा कुछ हो सकता है कि कानून में फेरबदल करके ऐसा इंतजाम किया जाए कि गैरपेशेवर मुजरिमों की ऐसी कैद कुछ कट जाने के बाद, उनकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के लिए किया जा सके? मिसाल के तौर पर अगले जितने बरस सलमान खान को कैद में काटने हैं, क्या उसकी जगह उनको अपने पेशे का काम करते रहने देने की रियायत दी जाए, और उसकी पूरी कमाई को समाज में इस्तेमाल किया जाए? और क्या ऐसी रियायत कम कमाई वाले, कम चर्चित, कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले दूसरे लोगों को भी दी जा सकती है? क्या इससे मुजरिम और सजा को एक अधिक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है?
ऐसी कई बातें इस मामले को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद बातचीत के लायक हैं। जब कभी किसी कानून या व्यवस्था में किसी फेरबदल की बात होती है, तो वह ऐसी किसी एक घटना, या कुछ घटनाओं के बाद ही शुरू होती है। कुछ बरस पहले दिल्ली में निर्भया से हुए बलात्कार के बाद आज देश में एक नया कानून लागू हुआ है। उसी हादसे के बाद के माहौल से वह कानून बना, और अब लागू हुआ। इसलिए अगर सलमान खान को लेकर एक नई चर्चा शुरू होती है, और कानून में एक ऐसा लचीलापन लाया जाता है, जिसका बेजा इस्तेमाल रोका जा सके, और जिससे समाज का कुछ फायदा हो सके, सजायाफ्ता की जिंदगी को खराब करने के बजाय उसका समाज के लिए कोई उत्पादक उपयोग हो सके, तो उसके बारे में सोचना चाहिए।
हम इसी मामले को लेकर सोचते हैं, तो लगता है कि जिस तरह जेल के भीतर कैदियों से तरह-तरह के काम करवाए जाते हैं, या जैसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही जेल के कैदी बाहर खाने-पीने की दुकान चलाते हैं, पेट्रोल पंप चलाते हैं, कई शहरों में कैदी बैंड पार्टी बनाकर बाहर जाकर काम करते हैं, और उनकी कमाई जेल में जमा होती है, तो यह भी एक रास्ता निकल सकता है कि सलमान खान को रोज जेल से बाहर जाकर उनके हुनर का काम करने दिया जाए, और उसकी कमाई को जेल में जमा किया जाए, और उन्हें उसमें से उतना ही हिस्सा मिले, जितना कि किसी कैदी को मिलता है। ऐसा आज देश में जगह-जगह आम कैदियों को जेल के बाहर जाकर काम करने मिल रहा है, ताकि जब वे सजा काटकर बाहर निकलें, तो भूखे न मरें, या बेरोजगार न हों।
दुनिया के कई दूसरे देशों में भी सजा के कई किस्म के तरीके रहते हैं। भारत में भी अभी-अभी किसी जज ने किसी को गौशाला में जाकर काम करने की सजा दी है। हम राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा किसी भी तरह की माफी देने के खिलाफ हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दी गई सजा के बाद किसी एक व्यक्ति द्वारा उसमें माफी या छूट नाजायज है। लेकिन हम अदालतों द्वारा ही सजा में ऐसे लचीलेपन को सुझा रहे हैं, जिससे किसी मुजरिम को सजा तो मिले, लेकिन साथ-साथ समाज को उसका फायदा भी मिले, वह मुजरिम भी सजा के बाद सामान्य जिंदगी के लायक बचे। अगर सुप्रीम कोर्ट इस सजा में एक शर्त के साथ ऐसी फेरबदल करता है कि सजा के आने वाले बरसों की सलमान खान की पूरी कमाई उनकी कार से कुचले लोगों के परिवारों के लिए मिल जाएगी, या सड़कों की हिफाजत पर खर्च की जाएगी, या नशे से छुटकारे के लिए इस्तेमाल की जाएगी, तो वह ऐसे मामलों में एक बेहतर और सार्थक सजा होगी।
लोकतंत्र में ऐसे लचीलेपन की गुंजाइश अगर अदालत को मौजूदा कानूनों में नहीं मिलती है, तो कानून में संशोधन करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए। बहुत ही दुर्लभ किस्म के मामलों में अदालतें कई तरह की रियायतें कभी न कभी पहली बार करती हैं। हम ऐसी रियायत के बजाय लचीलेपन के ऐसे संशोधन की सिफारिश करेंगे, जो जजों के भी विवेक की मनमानी पर न टिके, और एक नीति-सिद्धांत, पैमाने के आधार पर चले। सलमान खान को कैद के अगले बरसों में, आम कैदियों की बैंड पार्टी की तरह जेल से रोज बाहर आकर शूटिंग में हिस्सा लेने मिले, और उसकी कमाई समाज के काम आए, तो अपने किस्म का यह एक नया मामला होगा, लेकिन इससे सजा की सोच को एक सकारात्मक मोड़ भी मिलेगा, और आगे के लिए मिसाल भी बनेगी। वैसे तो अब सलमान खान को जमानत मिल चुकी है, लेकिन फिर भी आगे जाकर अगर कैद होती है, या ऐसे दूसरे लोगों को कैद होती है, तो उसके सामाजिक योगदान के पहलू पर सोचना चाहिए। (इसमें लिखे हुए अधिकतर तर्क कुछ बरस पहले संजय दत्त को हुई कैद के मौके पर लिखे गए संपादकीय से लिए गए हैं।)

मोदी की अपील, नक्सलियों को सोचने की जरूरत

संपादकीय
09 मई 2015
बस्तर के अपने पहले दौरे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नक्सलियों से हिंसा का रास्ता छोडऩे की अपील की। उन्होंने लोगों से कहा कि जिस तरह नक्सल बाड़ी और पंजाब में रक्त की धाराएं बहनी बंद हुई, उसी तरह बस्तर में भी जरूर हिंसा बंद होगी। उन्होंने नक्सलियों से कहा कि वे कम से कम दो-चार दिन के लिए अपने कंधे से बंदूक नीचे रखकर पीडि़त परिवार के बच्चों से मिल लें। आपकी गोलियों से पीड़ा पाने वाला आपकी जिंदगी बदल सकता है। हिंसा से कभी समस्याओं का समाधान नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि निराश होने की जरूरत नहीं है। बस्तर में भी नक्सलवाद बंद होगा। उन्होंने कहा कि यहां के नक्सलियों के मन में भी मानवता जागेगी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हिंसा का कोई भविष्य नहीं है, शांति के मार्गों का ही भविष्य है। आपकी गोलियों से पीड़ा पाने वाला ही आपकी जिंदगी बदल सकता है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ अगर नक्सलवाद से मुक्त हो जाए, तो वह हिन्दुस्तान का नंबर एक का राज्य हो सकता है। छत्तीसगढ़ हिन्दुस्तान का भविष्य भी बदल सकता है।
प्रधानमंत्री की बातें नक्सलियों से महज बंदूक से बात करने का विचार रखने वालों से बहुत हटकर है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह पहले भी नक्सलियों से बातचीत का इरादा कई बार जाहिर कर चुके हैं, और आज प्रधानमंत्री ने जिस तरह नक्सलियों से समाज और लोकतंत्र की मूलधारा में लौटने की अपील की है, उसके बाद इस मोर्चे पर कुछ और कोशिशें होनी चाहिए ताकि खूनखराबा खत्म हो। इतने बरसों में छत्तीसगढ़ में यह साबित हो चुका है कि सरकार तो खत्म नहीं की जा सकती, लेकिन लोकतंत्र के खिलाफ हिंसा खत्म हो सकती है। इसी राज्य के उत्तरी सिरे पर सरगुजा में नक्सल हिंसा पूरी तरह खत्म हो गई है। कोई वजह नहीं है कि बस्तर में यह खत्म न हो सके। सरकार की ताकत बहुत अधिक होती है, यह एक अलग बात है कि छत्तीसगढ़ के राज्य बनने के बाद पन्द्रह बरसों में राज्य और केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस और भाजपा ने किसी फौजी ताकत का इस्तेमाल नक्सल इलाकों में नहीं किया है। और ऐसा न करना एक समझदारी थी क्योंकि फौजी ताकत बहुत से बेकसूरों को मारती है। 
बस्तर में प्रधानमंत्री जिस कारखाने के शिलान्यास करने आए हैं, उसमें बहुत से लोगों की जमीनें जाएंगी। लेकिन किसानों या आदिवासियों की जमीनें गए बिना न तो भिलाई इस्पात संयंत्र बना था, न ही कोई बांध बनता है, और न ही नहरें या सड़क। इसलिए भूमि अधिग्रहण को लेकर देश में जो भी बहस चल रही है, किसानों के भले के लिए जो भी प्रावधान लागू किए जा सकते हैं, उन सबके साथ-साथ भूमि अधिग्रहण एक मजबूरी भी रहती है, और सरकारी कारखाने के लिए या सार्वजनिक कामकाज के लिए किसानों की तकलीफदेह बेदखली एक मजबूरी भी हो सकती है। क्या कोई छत्तीसगढ़ में बीएसपी के बिना आज की तस्वीर की कल्पना कर सकते हैं? इसी तरह बस्तर में जब एक बड़ा सरकारी इस्पात कारखाना बन जाएगा, तो न सिर्फ वहां के लौह अयस्क की बर्बादी बचेगी, उसे बस्तर के बाहर मिट्टी के मोल बेचना बचेगा, बल्कि वहां के लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार भी बहुत मिलेगा। किसी क्षेत्र का विकास उद्योगों के बिना एक सीमा तक तो हो सकता है, लेकिन जहां पर खनिज हैं, वहां पर विकास की सबसे अधिक संभावनाएं स्थानीय जमीन पर कारखाने लगाने से है। और जब यह कारखाना किसी निजी उद्योग का न होकर सरकार का हो, तो उसकी कमाई भी जनता के खजाने में ही जाएगी। 
लेकिन इस एक भूमिपूजन से न तो बस्तर में बात पूरी हो रही है, और न ही कारखाने के सरकारी होने से जनता के पूरे हक मिल जाते हैं। लोगों को वहां के स्थानीय आदिवासियों के हकों के लिए लडऩा जारी रखना पड़ेगा। सत्ता से आसानी से कुछ नहीं मिलता है, लेकिन फिर भी छत्तीसगढ़ में सरकार से लोगों को आसानी से ही बहुत से चीजें मिल जाती हैं। हम उम्मीद करते हैं कि बस्तर के औद्योगिक विकास से प्रदेश और देश का जो भला होगा, उसका एक जायज हक बस्तर के उन लोगों तक जाएगा जिनकी जमीनें अभी शिलान्यास हो रहे कारखानों या परियोजनाओं में जाएंगी। बस्तर के आर्थिक विकास से भी वहां नक्सल हिंसा खत्म होने की एक संभावना खड़ी होगी। 

भाजपा के एक कामयाब राज्य में भाजपा के एक कामयाब प्रधानमंत्री का आगमन

8 मई 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के छत्तीसगढ़ आने पर उनके कार्यक्रम तो पहले से तय और औपचारिक सरकारी कार्यक्रम हैं, लेकिन इस मौके पर यह नया राज्य प्रधानमंत्री से बहुत कुछ उम्मीद भी करता है। जिस तरह बिहार या पश्चिम बंगाल केंद्र से विशेष आर्थिक पैकेज मांग रहे हैं, उस तरह की नौबत तो छत्तीसगढ़ की नहीं है, लेकिन यहां की मौजूदा संपन्नता के चलते भी इस नए राज्य के ढांचागत विकास के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। मध्यप्रदेश का हिस्सा रहते हुए छत्तीसगढ़ मेले में भटकते हुए मिले अनाथ बच्चे की तरह था, जिसके हक के लिए छत्तीसगढ़ से भोपाल जाकर मुख्यमंत्री बने लोगों ने भी कुछ नहीं किया था। यह तो कुदरत की देन है कि इस प्रदेश की जमीन के नीचे कोयला है, लोहा है, सीमेंट के लिए पत्थर है, इसलिए यहां अलग राज्य बनने के बाद भी न सिर्फ काम चलते रहा, बल्कि नए बने हुए तीनों प्रदेशों में सबसे अधिक तरक्की इसी एक प्रदेश ने की। 
अब राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह, और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों के एक ही पार्टी के होने की वजह से जहां काम में आसानी हो सकती है, वहीं पर यह एक बड़ी सार्वजनिक-राजनीतिक चुनौती भी रहेगी कि किसी भी कमी या नाकामयाबी के लिए राज्य और केंद्र एक-दूसरे को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकेंगे। ऐसे में इन दोनों ही पक्षों को पूरी मेहनत करके, और हर संभावना को टटोलकर इस राज्य को उसका हक भी दिलाना होगा, और इसके विकास की संभावनाओं को टटोलना भी होगा। अभी तक यह राज्य स्कूल-कॉलेज, एक एम्स, एक एयरपोर्ट, एक कारखाना, इससे ही खुश होते आया है। लेकिन यह छत्तीसगढ़ सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है कि केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों के तहत जिन योजनाओं और जिन नई सोच के लिए बजट की संभावना निकल सकती है, उनके लिए कल्पनाशीलता के साथ काम करे। परंपरागत काम एक सीमा तक काम आते हैं, उनके बाद एक कल्पनाशीलता ही आगे की ऊंचाई तक ले जा सकती है।
डॉ. रमन सिंह की अगुवाई में छत्तीसगढ़ में भाजपा ने तीन विधानसभा चुनाव जीते, तीन लोकसभा चुनावों में लगभग सारी सीटें जीतीं, और पंचायत-म्युनिसिपल के चुनावों में तीन बार बड़ी कामयाबी पाई। ऐसे में आगे के चुनावों में इससे और ऊपर जाना लगभग नामुमकिन किस्म का है। गरीबों के जनकल्याण की, और उन्हें सीधा फायदा देने की जितनी योजनाएं हो सकती हैं, वे लगभग लागू की जा चुकी हैं। ऐसे में राज्य के लिए कुछ ऐसे बड़े काम करने की जरूरत है जिसके लिए केंद्र सरकार से बड़ी मंजूरी की जरूरत हो। छत्तीसगढ़ के सामने आज यह बड़ी चुनौती है कि अपने अलग-अलग इलाकों के लिए ऐसी अलग-अलग योजनाएं सोचे, और फिर उनको मंजूरी दिलाने के लिए प्रधानमंत्री से सहयोग ले।
आज नरेन्द्र मोदी बिना किसी चुनावी माहौल के, जनता के बीच आने की किसी मजबूरी के बिना, प्रधानमंत्री के एक सामान्य प्रवास के तहत आ रहे हैं, और ऐसे में उनके सामने किसी लुभावनी घोषणा करने की मजबूरी नहीं है। लेकिन उन्हें यह ध्यान देना होगा कि दशकों की जिस आर्थिक और सामाजिक विषमताओं के चलते हुए, शोषण के चलते हुए बस्तर में नक्सल हिंसा ने पैर जमाए, उन विषमताओं को केंद्र और राज्य मिलकर किस तरह दूर कर सकते हैं। ऐसा तजुर्बा अगर कामयाब रहता है तो वह देश के आधा दर्जन दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों में भी काम आएगा। फिलहाल नरेन्द्र मोदी एक बड़े कामयाब विजेता की तरह छत्तीसगढ़ पहुंच रहे हैं, और उनकी पार्टी भी भारी उत्साह में है। ये दोनों ही जिस ऊंचाई पर पहुंच चुके हैं, वहां बने रहने के लिए बहुत सा जनकल्याण करना पड़ेगा।