140 अक्षरों से बेहतर होती दिमागी सेहत...

संपादकीय
29 मई 2015

ट्विटर पर लोग कोई दो दर्जन शब्दों के भीतर, या 140 से कम अक्षरों वाले संदेश में बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं। छोटे संदेश वाला यह माईक्रोब्लॉगर लोगों के कटाक्ष को, उनके तानों को बहुत पैना बना देता है, और जिस तरह एक वक्त तार (टेलीग्राम) करते हुए लोग एक-एक शब्द का ख्याल रखते थे, क्योंकि भुगतान हर शब्द का करना पड़ता था, उसी तरह आज लोग ट्विटर पर एक-एक अक्षर का ख्याल रखते हैं। यहां पर आज किसी ने लिखा कि हिन्दुस्तान में लोग लू से नहीं मर रहे, वे खाना-पीना न होने से, सर पर साया न होने से, और वक्त पर इलाज हासिल न होने से मर रहे हैं। एक ही तस्वीर को देखने के दो अलग-अलग पहलू हैं। कुछ लोग तपते हुए सूरज पर तोहमत लगा रहे हैं कि उसकी बरसाई जा रही आग में झुलसकर लोग मर रहे हैं। और दूसरी तरफ एक नजरिया यह है कि जिन पर जिंदगी की सहूलियतों का, बचाव का, साया नहीं है, वे मारे जा रहे हैं। 
ट्विटर जैसी जगह पर लोग अपने चेहरे के साथ या चेहरे के बिना, बड़ी आक्रामक बातें कह रहे हैं, और भारतीय जीवन में पैनेपन की जो कमी हमेशा से रहते आई है, वह इससे दूर होते दिखती है। अभी कुछ ही दिन पहले हमने इसी जगह लिखा था कि सोशल मीडिया पर लोगों के विचार जनमत का सही या पूरा प्रतिनिधित्व नहीं भी कर सकते हैं। लेकिन अब हम वैसे किसी निष्कर्ष से परे इस पर जा रहे हैं कि वहां पर लोग जिन बातों को लिखते हैं, उनसे उनके मन की भड़ास कैसे निकलती है, और एक दिमागी सेहत के लिए यह भड़ास निकलना क्यों और कितना जरूरी है। लोगों को ध्यान होगा कि सार्वजनिक जगहों पर पखानों के दरवाजों के भीतर की तरफ लोग अपने मन की चाहत, या अपने मुताबिक कोई बहुत चुटीली बात, या गालियां लिखकर अपना मन हल्का करने का काम किया करते थे। आज सोशल मीडिया पखाने के दरवाजे के भीतरी हिस्से का काम भी कर रहा है। लोग अब अपने चेहरे के साथ भी इस पर उसी अंदाज में गालियां, गंदी बातें, और हिंसक धमकियां लिखने लगे हैं, जो कि इसके पहले तक अपने कपड़े उतारे हुए, पखाना करते हुए ही लिखते थे। 
जिन लोगों के मन में किसी से शिकायत है, या किसी से नफरत है, उनके लिए सोशल मीडिया बड़ा फायदेमंद है, और उनकी कुंठाओं को एक इलाज इससे मिलता है। लेकिन दूसरी तरफ हम यह भी देखते हैं कि लोग शब्दों और वाक्यों से, कहावतों और मुहावरों से, नामों और चेहरों से जिस तरह के खिलवाड़ फेसबुक या ट्विटर जैसी जगहों पर कर रहे हैं, उससे शर्तिया ही उनकी कल्पनाशीलता बढ़ रही है। जब दिमाग के कल्पना के हिस्से का इस्तेमाल होता है, तो वह सक्रियता दिमाग को सेहतमंद भी बनाए रखती हैं। इसलिए हम सोशल मीडिया के बाजारू या राजनीतिक उपयोग से परे भी उसका एक निजी फायदा देखते हैं कि इससे लोग भड़ास से मुक्त हो रहे हैं। 
एक और पहलू सोशल मीडिया का गैर-सोशल भी है। आज एक घर के लोग, एक दफ्तर के लोग, आपस में दोस्त लोग भी एक-दूसरे से जिन बातों को सीधे कहने से कतराते हैं, वे भी सोशल मीडिया पर बड़ी से बड़ी, भारी-भरकम बात को बिना किसी एक के लिए कहे हुए भी कह जाते हैं। और जिनको उसका मतलब निकालना रहता है, वे निकाल लेते हैं। एक वक्त कहा जाता था कि बहू को सुनाने के लिए सास अपनी बेटी को सुनाती है। कुछ इसी किस्म का हाल सोशल मीडिया का हो गया है जहां पर लोग अपने दिल के हाल को एक दार्शनिक अंदाज में उन लोगों को बिना नाम लिए बता देते हैं, जिन तक वे बात पहुंचाना चाहते हैं। इसलिए हम सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ मजाक या सिर्फ सुख और दुख बांटने वाला नहीं समझते। ये सिर्फ खबरों को बांटने वाला भी नहीं है। इसका इस्तेमाल लोगों की एक बेहतर मानसिक स्थिति तैयार करने में भी हो रहा है, और जिन लोगों को जनमत को जानने की जरूरत होती है, वे भी अपने-अपने हिसाब से सोशल मीडिया की बातों का वजन तौल सकते हैं, और अपने नतीजे निकाल सकते हैं। एक सौ चालीस अक्षरों वाला एक ट्वीट ठीक उतना ही लंबा होता है, जितनी लंबी सूक्ति एक वक्त के महान लोग लिखा करते थे, या किसी शायर और कवि शेर और दोहे लिखा करते थे। जानकार और समझदार लोगों को शायद सैकड़ों बरस पहले से समझदारी की बातों की लंबाई की 21वीं सदी की सीमा का अंदाज था। जब ट्विटर आया भी नहीं था, तभी से गालिब, कबीर और सुकरात ट्वीट की लंबाई के भीतर ही अपनी बातें लिखते आए हैं। 

कांव-कांव
0 सुना है आन्ध्र में गांधी प्रतिमा के पास से शराबखाना हटाने के बजाय गांधी प्रतिमा को ही हटा दिया गया है?
00 आज की जिंदगी में जिसकी अधिक जरूरत है, उसे ही रहने का हक है...

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