यह एक विकसित सभ्यता नहीं

1 मई 2015
संपादकीय

सार्वजनिक जीवन से लेकर राजनीति तक लोगों का रूख अपने और पराए के लिए किस तरह बदलता है यह देखना हो तो भारत के नेताओं को देखा जा सकता है। जिस कांगे्रस पार्टी के राज में महाराष्ट्र में दस बरसों में दस हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की, आज वहीं पर राहुल गांधी ऐसे परिवारों के बीच घूम रहे हैं। इसके पहले वे सत्तारूढ़ यूपीए के सबसे ताकतवर दो-चार नेताओं में से एक थे, लेकिन उस वक्त खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवारों से उनकी ऐसी कोई हमदर्दी याद नहीं पड़ती है। दूसरी तरफ दो दिन पहले पंजाब में छेडख़ानी से बचने के लिए मुख्यमंत्री के कुनबे की कंपनी की मुसाफिर बस से कूदने को मजबूर हुई एक लड़की और उसकी मां की खबर पर मुख्यमंत्री बादल से लेकर उनकी भागीदारी वाली केंद्र की एनडीए सरकार तक की जुबान बदली हुई थी। मुसाफिर बसों मेें छेडख़ानी को लेकर राजनीतिक दलों का जो रूख आमतौर पर रहता है वह भी पंजाब के इस मामले में राजनीति की सहूलियत से बंटा हुआ था, बदला हुआ था। 
लोकतंत्र में जीवन के मूल्य, मानवीयता के मूल्य, इंसाफ की बात, इन सबको देखें, तो वे धर्म, जाति, पार्टी, या किसी और तंग नजरिए के  पैमानों पर खरे से खोटे, और खोटे से खरे बना दिए जाते हैं, करार दे दिए जाते हैं। यह सिलसिला लोगों का भरोसा लोकतंत्र, और खासकर राजनीति पर से उठा देता है। आखिर इंसान अपनी तथाकथित इंसानियत को अपने या अपने संगठन के फायदे के लिए किस रफ्तार से खो बैठता है, यह बात सदमा पहुंचाती है। लोग सत्ता से विपक्ष में आते ही अपनी जुबान बदल लेते हैं, उनकी हमदर्दी बढ़ या घट जाती है। ऐसा लगता है कि लोगों के बीच जो अच्छा इंसान कहा जाता है, वह इतना मतलबपरस्त रहता है कि तकलीफ में पड़े लोगों के साथ उसकी हमदर्दी भी चंद सिक्कों में बिक जाती है। 
ऐसे में मीडिया की एक जिम्मेदारी आती है कि लोगों को, संगठनों को उनके पुराने बयान दिखाकर पूछे कि सत्ता और विपक्ष के बीच भूमिका बदल जाने से पुरानी तमाम बातें क्या बदल गईं? अभी-अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रेडियो पर अपने मन की बात में भारतीय टीम की हार के बाद खेल प्रशंसकों द्वारा ओछी और गंदी जुबान में कही हुई बातों का जिक्र किया, और उस पर अफसोस जाहिर किया। लेकिन दूसरी तरफ उनके सत्ता में आने के बाद से अब तक उनके साथ के मंत्री और सांसद, पार्टी के लोग, देश की धार्मिक सद्भावना, और साम्प्रदायिक एकता के खिलाफ जितनी हिंसक बातें कर रहे हैं, उनके बारे में प्रधानमंत्री ने अब तक कुछ भी नहीं कहा है। क्या खेल, और वह भी एक खेल की एक टीम, पूरे देश से अधिक अहमियत रखती है? खिलाडिय़ों के खिलाफ हिंसक या भद्दी बातें कहने वालों के बारे में तो उन्होंने कह दिया, लेकिन देश के अल्पसंख्यकों के खिलाफ, खानपान की एक गैरसनातनी जीवनशैली के लोगों के खिलाफ जिस तरह की बातें कही जा रही हैं, उन पर प्रधानमंत्री की चुप्पी खतरनाक है। कुल मिलाकर बात यह है कि आम लोगों से लेकर देश के मुखिया तक, तंगदिली और तंग नजरिए से नीति और सिद्धांत तय कर रहे हैं। यह एक विकसित सभ्यता नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें