कमाऊ मुजरिम को सजा से समाज को कमाई क्यों नहीं?

संपादकीय
10 मई 2015
पिछले तीन-चार दिनों से देश का मीडिया और इंटरनेट पर सोशल मीडिया सलमान खान को मिली कैद, और फिर प्रकाश की किरण की रफ्तार से मिली जमानत को लेकर उबल रहे हैं। कुछ लोग सलमान के समर्थन में, और बाकी लोग सलमान और अदालत के खिलाफ उफन रहे हैं। बात घूमफिरकर यहां आ रही है कि मरने वाले बेकसूरों को मारने वाला फिर कश्मीरी जाकर शूटिंग करने लगा, करोड़ों कमाने लगा, और फुटपाथ पर जो कुचले गए थे, वे लोग अब तक फटेहाल हैं।
हम सलमान खान के लिए अलग से किसी रियायत के हिमायती नहीं हैं, लेकिन सजा के पीछे की सोच, और सजा के असर पर इस मामले से परे भी कुछ विचार करने की जरूरत है। हम यहां पर सजा के प्रावधानों में एक नए किस्म के लचीलेपन की बात सोच रहे हैं। क्या ऐसा कुछ हो सकता है कि कानून में फेरबदल करके ऐसा इंतजाम किया जाए कि गैरपेशेवर मुजरिमों की ऐसी कैद कुछ कट जाने के बाद, उनकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के लिए किया जा सके? मिसाल के तौर पर अगले जितने बरस सलमान खान को कैद में काटने हैं, क्या उसकी जगह उनको अपने पेशे का काम करते रहने देने की रियायत दी जाए, और उसकी पूरी कमाई को समाज में इस्तेमाल किया जाए? और क्या ऐसी रियायत कम कमाई वाले, कम चर्चित, कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले दूसरे लोगों को भी दी जा सकती है? क्या इससे मुजरिम और सजा को एक अधिक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है?
ऐसी कई बातें इस मामले को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद बातचीत के लायक हैं। जब कभी किसी कानून या व्यवस्था में किसी फेरबदल की बात होती है, तो वह ऐसी किसी एक घटना, या कुछ घटनाओं के बाद ही शुरू होती है। कुछ बरस पहले दिल्ली में निर्भया से हुए बलात्कार के बाद आज देश में एक नया कानून लागू हुआ है। उसी हादसे के बाद के माहौल से वह कानून बना, और अब लागू हुआ। इसलिए अगर सलमान खान को लेकर एक नई चर्चा शुरू होती है, और कानून में एक ऐसा लचीलापन लाया जाता है, जिसका बेजा इस्तेमाल रोका जा सके, और जिससे समाज का कुछ फायदा हो सके, सजायाफ्ता की जिंदगी को खराब करने के बजाय उसका समाज के लिए कोई उत्पादक उपयोग हो सके, तो उसके बारे में सोचना चाहिए।
हम इसी मामले को लेकर सोचते हैं, तो लगता है कि जिस तरह जेल के भीतर कैदियों से तरह-तरह के काम करवाए जाते हैं, या जैसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही जेल के कैदी बाहर खाने-पीने की दुकान चलाते हैं, पेट्रोल पंप चलाते हैं, कई शहरों में कैदी बैंड पार्टी बनाकर बाहर जाकर काम करते हैं, और उनकी कमाई जेल में जमा होती है, तो यह भी एक रास्ता निकल सकता है कि सलमान खान को रोज जेल से बाहर जाकर उनके हुनर का काम करने दिया जाए, और उसकी कमाई को जेल में जमा किया जाए, और उन्हें उसमें से उतना ही हिस्सा मिले, जितना कि किसी कैदी को मिलता है। ऐसा आज देश में जगह-जगह आम कैदियों को जेल के बाहर जाकर काम करने मिल रहा है, ताकि जब वे सजा काटकर बाहर निकलें, तो भूखे न मरें, या बेरोजगार न हों।
दुनिया के कई दूसरे देशों में भी सजा के कई किस्म के तरीके रहते हैं। भारत में भी अभी-अभी किसी जज ने किसी को गौशाला में जाकर काम करने की सजा दी है। हम राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा किसी भी तरह की माफी देने के खिलाफ हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दी गई सजा के बाद किसी एक व्यक्ति द्वारा उसमें माफी या छूट नाजायज है। लेकिन हम अदालतों द्वारा ही सजा में ऐसे लचीलेपन को सुझा रहे हैं, जिससे किसी मुजरिम को सजा तो मिले, लेकिन साथ-साथ समाज को उसका फायदा भी मिले, वह मुजरिम भी सजा के बाद सामान्य जिंदगी के लायक बचे। अगर सुप्रीम कोर्ट इस सजा में एक शर्त के साथ ऐसी फेरबदल करता है कि सजा के आने वाले बरसों की सलमान खान की पूरी कमाई उनकी कार से कुचले लोगों के परिवारों के लिए मिल जाएगी, या सड़कों की हिफाजत पर खर्च की जाएगी, या नशे से छुटकारे के लिए इस्तेमाल की जाएगी, तो वह ऐसे मामलों में एक बेहतर और सार्थक सजा होगी।
लोकतंत्र में ऐसे लचीलेपन की गुंजाइश अगर अदालत को मौजूदा कानूनों में नहीं मिलती है, तो कानून में संशोधन करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए। बहुत ही दुर्लभ किस्म के मामलों में अदालतें कई तरह की रियायतें कभी न कभी पहली बार करती हैं। हम ऐसी रियायत के बजाय लचीलेपन के ऐसे संशोधन की सिफारिश करेंगे, जो जजों के भी विवेक की मनमानी पर न टिके, और एक नीति-सिद्धांत, पैमाने के आधार पर चले। सलमान खान को कैद के अगले बरसों में, आम कैदियों की बैंड पार्टी की तरह जेल से रोज बाहर आकर शूटिंग में हिस्सा लेने मिले, और उसकी कमाई समाज के काम आए, तो अपने किस्म का यह एक नया मामला होगा, लेकिन इससे सजा की सोच को एक सकारात्मक मोड़ भी मिलेगा, और आगे के लिए मिसाल भी बनेगी। वैसे तो अब सलमान खान को जमानत मिल चुकी है, लेकिन फिर भी आगे जाकर अगर कैद होती है, या ऐसे दूसरे लोगों को कैद होती है, तो उसके सामाजिक योगदान के पहलू पर सोचना चाहिए। (इसमें लिखे हुए अधिकतर तर्क कुछ बरस पहले संजय दत्त को हुई कैद के मौके पर लिखे गए संपादकीय से लिए गए हैं।)

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