जया की वापिसी

संपादकीय
11 मई 2015
कर्नाटक हाईकोर्ट से जयललिता के बरी होने के साथ ही पिछले हफ्ते से देश के कमजोर तबकों में चली आ रही निराशा और गहरी हो गई है। सलमान खान को जिस तरह से हाईकोर्ट जज ने आनन-फानन राहत दी, और यह कहा भी कि जिसकी क्षमता होती है, उसे अदालतों से फायदा भी मिलता है, उससे भी लोग बहुत निराश थे। हालांकि यह सच्चाई है कि जो लोग महंगे वकील रखकर अदालत के कामकाज को दुह सकते हैं, वे फायदा पाते ही हैं, और यह फायदा नाजायज नहीं है, लेकिन देश के संपन्न और विपन्न तबके के अधिकारों का फर्क बतलाता है। अब तमिलनाडू की भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता जिस तरह अनुपातहीन संपत्ति के मामले में बरसों के बाद अब हाईकोर्ट से बरी हो चुकी हैं, और ऐसे आसार हैं कि वे दो-चार दिनों में फिर मुख्यमंत्री बन जाएंगी, उससे यह लगता है कि देश में लोकतंत्र है कहां? यह लोकतंत्र चुनाव की टिकट खरीदकर, चुनाव में जीत खरीदकर, मंत्री या मुख्यमंत्री की कुर्सी खरीदकर हासिल किया जाता है, और फिर इस पूंजीनिवेश की वसूली-उगाही चालू हो जाती है। अदालतों तक मामला अगर जाता भी है, तो लालू यादव जैसे लोग लंबे वक्त तक सजायाफ्ता की हैसियत से भी नेतागिरी करते रहते हैं, और इस देश की धर्मनिरपेक्षता को तय करते रहते हैं। ऐसा ही हाल दूसरी पार्टियों के बहुत से नेताओं का है जो कि जेलों से जमानत पर छूटकर लीडर बने रहते हैं।
अब जयललिता के अलोकतांत्रिक तौर-तरीकों को देखें, तो उनकी पूरी पार्टी और उनकी पूरी सरकार सामंती युग में जीती हुई दिखती है जहां पर लोग उनके पैरों पर बिछे रहने से अधिक कुछ भी करने के हकदार नहीं हैं। कहने के लिए तो दक्षिण भारत अधिक पढ़ा-लिखा माना जाता है, तमिलनाडू एक संपन्न राज्य भी है, और वहां पर दलित चेतना भी बहुत से राज्यों से अधिक है। लेकिन जिस तरह की कुनबापरस्ती से यह राज्य आजादी के बाद से आज तक के अधिकतर वक्त पर चलते रहा है, वह भयानक है। लोग या तो जया के अन्नाद्रमुक में रहते हुए उनके तलुवे चाटते हैं, या फिर उनकी विरोधी पार्टी द्रमुक में रहते हुए करुणानिधि की कुर्सी के पहिए चूमते हैं। लोकतंत्र के भीतर यह एक भयानक नौबत है, जो कि किसी भी दूसरे किस्म के विकास के बावजूद वैसी की वैसी बनी हुई है। जयललिता राजनीति में एमजीआर की अंतरंग महिला के रूप में आईं, और एमजीआर की कुनबापरस्ती का फायदा उन्होंने पाया, और अपनी एक तानाशाही कायम की। लेकिन कम पढ़े-लिखे और कम विकसित उत्तर भारत को अगर देखें, तो मुलायम का कुनबा, लालू का कुनबा, एक से एक नमूने उत्तर भारत में भी हैं, समाजवाद के नाम पर भी हैं, क्षेत्रीय राजनीति में भी हैं, और राष्ट्रीय राजनीति में भी हैं।
आजादी की पौन सदी पूरी होने को है, लेकिन किसी भी तरह के जुर्म, किसी भी तरह के मुकदमे, किसी भी तरह की कुनबापरस्ती घटने का नाम नहीं ले रहे। जयललिता की दुबारा वापिसी लोकतंत्र के मुंह पर कानून से मंजूर तमाचे की तरह होगी। और अब उनके पैरों पर पड़े रहने वाले उनके नेता उनके सामने जमीन को कुछ खोदकर उनके पैरों से नीचे के स्तर पर लेटेंगे, क्योंकि जिस लेवल पर जया के पैर हैं, उस लेवल पर उनके चापलूसों को लेटने का दुस्साहस कैसे हो सकेगा?

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