सिर्फ मोदी की सभा का नहीं सरकार का ढांचा भी गिरा हुआ

संपादकीय
12 मई 2015
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभा के लिए बनाए जाते विशाल डोम को लेकर आने वाली खबरें कई तरह की फिक्र खड़ी करती हैं। वह जगह इस तरह के ढांचे को बनाने के लिए सही नहीं थी, ऐसा मौसम विभाग के लोगों की चेतावनी से पता लगता है  कि वह जगह चारों तरफ से दूर-दूर तक खुली होने की वजह से बवंडर के खतरे वाली थी। यह भी खबर है कि पिछले बरस या दो बरस पहले एक सरकारी ढांचे की दीवार आंधी के चलते ही यहां गिर चुकी थी। यह तो गनीमत है कि मोदी की सभा के वक्त पर ही ठीक एक दिन पहले यह ढांचा गिरा, और यह सोचकर ही घबराहट होती है कि अगर अगले दिन सभा के दौरान ऐसा बवंडर आया होता, और ऐसी तबाही होती, तो उसके नीचे के लाख-पचास हजार लोगों का क्या हुआ होता? फिर खबरें यह भी बताती हैं कि दिल्ली में भाजपा के एक बड़े नेता सुधांशु मित्तल की पारिवारिक कंपनी ने यह डोम बनाने का ठेका कई करोड़ रुपये में लिया था, और लापरवाही से इसका काम करते हुए हादसा होने पर कंपनी के मालिक भाग खड़े हुए। घायल मजदूरों की खबरों के आने के दो दिन पहले यह अखबार ऐसी तस्वीर छाप चुका था जिसमें ऊंचाई पर काम करने वाली मजदूर बिना किसी सुरक्षा बेल्ट के काम कर रहे थे। अभी जो जांच हो रही है, उसमें इस अखबार की ऐसी दर्जनों तस्वीरें सुबूत बन सकती हैं कि किस लापरवाही से मजदूरों की जिंदगी ऊंचाई पर टांग दी गई थी। और यही लापरवाही आखिर तक जारी रही। अब जांच से चाहे जो निकले, लेकिन कम से कम एक मजदूर की मौत तो हो ही चुकी है, और दर्जनों जख्मी भी हैं।
लेकिन लापरवाही यहीं खत्म नहीं होती। घायल मजदूरों को छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल मेकाहारा सहित दो बड़े निजी अस्पतालों में भर्ती किया गया, और इस खबर के छपने के भी पहले मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अस्पतालों के संपर्क में थे, और एक से ज्यादा बार वे इन अस्पतालों में जाकर ठीक से इलाज के निर्देश देकर आए थे। लेकिन इसके बाद भी खुद सरकार के अस्पताल, मेकाहारा, में हाल यह था कि अगले दिन वहां से चार जख्मियों के परिवारों ने इलाज न देखकर उनको वहां से निकाला, और दूसरे निजी अस्पतालों में ले जाकर भर्ती किया। अब सवाल यह उठता है कि जहां मुख्यमंत्री जाकर एक-एक घायल की नब्ज टटोल रहे हैं, वहां पर भी अगर खबरों में बने हुए इन घायलों का इलाज सरकारी डॉक्टर ठीक से नहीं कर सकते, तो फिर बाकी मरीजों के लिए उम्मीद ही क्या की जा सकती है?
हम इन बातों को इसलिए लिख रहे हैं क्योंकि हर हादसे से कुछ सबक लिए जाने चाहिए, और छत्तीसगढ़ में सरकार के अलग-अलग विभागों के ऐसे बहुत से सबक की जरूरत है। इन तमाम बातों को लेकर ढांचे के गिरने के अलावा भी जांच होनी चाहिए, और सरकार को अपने खुद के ढांचे को दुरूस्त करना चाहिए। यह गिरा हुआ ढांचा तो एक दिन के लिए बनाया जा रहा था, लेकिन सरकार का ढांचा चार बरस बाद एक बार फिर जनता की कसौटी पर खड़ा होगा। अभी वक्त बहुत है, लेकिन सरकारी ढांचा बहुत बुरी तरह गिरा हुआ दिख रहा है, और यह राज्य के लिए फिक्र की बात है।

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