पाकिस्तान की ताजा हिंसा और भारत के लिए सबक

संपादकीय
13 मई 2015
पाकिस्तान में मुस्लिमों के ही एक तबके ने जिस तरह आज मुस्लिमों के एक दूसरे तबके की बस में घुसकर 50 के करीब लोगों को गोलियां मार दीं, उससे धर्म के बारे में सोचने की जरूरत है। यह वही इस्लाम है जिसमें सूफी संत पूरे वक्त ईश्वर से मोहब्बत के गीत गाते हैं, और उनका पूरा फलसफा मोहब्बत से भरा होता है। वे खुदा को प्रेमी या प्रेमिका मानते हुए उससे मोहब्बत की बातें करते हैं, और दूसरी तरफ आज इसी इस्लाम का नाम लेकर दुनिया में ऐसे-ऐसे किस्म की, और ऐसे-ऐसे दर्जे की हिंसा हो रही है, कि उन खबरों को खुलासे से छापना भी मुमकिन नहीं है। अब जब ऐसी हिंसा के लिए किसी धर्म की शर्तों और नसीहतों का नाम लिया जाता है, तो यह लगता है कि किसी एक बात के कितने तरह के सही और गलत मतलब निकाले जा सकते हैं, और एक धर्म मोहब्बत भी सिखा सकता है, और उन्हीं शब्दों के दूसरे मतलब निकालकर नफरत से लहू भी फैलाया जाता है, फैलाया जा रहा है। आज इस्लाम के नाम पर इराक से लेकर अफगानिस्तान तक, और सीरिया से लेकर पाकिस्तान तक, यमन और अफ्रीका के कई देशों तक जिस तरह के जुल्म ढाए जा रहे हैं, जिस तरह से बच्चों और महिलाओं से बलात्कार हो रहा है, जिस तरह बेकसूर लोगों के गले काटे जा रहे हैं, और जिस तरह छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में हथियार थमाकर हत्याएं करवाई जा रही हैं, वह सब तो दुनिया के किसी धर्म में नहीं सिखाया गया है।
दरअसल निजी आस्था तक सीमित रहकर धर्म आस्थावान लोगों की जो मदद कर सकता था, उससे दूर भटककर धर्म पहले तो सार्वजनिक प्रदर्शन का सामान बनाया गया, और फिर उस सार्वजनिक प्रदर्शन में हिंसा और उग्रता जोड़-जोड़कर धर्म के नेताओं और ठेकेदारों ने अपनी ताकत में इजाफा किया। धर्म को इस तरह काम में लाया गया कि लोगों को तमाम किस्म की बेइंसाफी जायज लगने लगे, दूसरों के हक कम लगने लगें, और आस्था के सिर्फ अपने ही तरीके सही लगने लगें। इस्लाम से परे भी आज हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म से जुड़े हुए कई आक्रामक नेता रात-दिन साम्प्रदायिकता और हिंसा की आग उगल रहे हैं। एक धर्म की आग दूसरे धर्म के लोगों को आग उगलने के लिए उकसाती हैं। फिर जब दूसरे धर्म के लोग नहीं बचते, तो फिर अपने ही धर्म के कुछ अलग रिवाजों वाले समाज निशाने पर आ जाते हैं, क्योंकि इक_े किए हुए हथियारों का इस्तेमाल तो करना ही है।
हम पाकिस्तान की इस धार्मिक हिंसा को लेकर भारत के लोगों को सावधान करना चाहते हैं कि जब तक पाकिस्तान में इस्लाम की एक बिरादरी के आतंकियों को गैरमुस्लिम मिलते रहे, तब तक वे उनको मारते रहे। अब जब उंगलियों को बंदूकों के ट्रिगर चलाने की आदत ही हो गई, तो मुस्लिमों के भीतर दूसरी बिरादरी के लोगों को मारना बढऩे लगा है। आज भारत में हिन्दू हो या मुस्लिम, जिस किसी तबके के लोग धार्मिक कट्टरता की बुनियाद पर हिंसा खड़ी कर रहे हैं, वे पहले तो दूसरे धर्म के लोगों को मारेंगे, और फिर अपने ही धर्म के लोगों को भी मारने लगेंगे। हिन्दुस्तान में धार्मिक आधार पर भेदभाव और नफरत को, हिंसा और जुर्म को तुरंत रोकने की जरूरत है। यह बात तसल्ली की नहीं है कि पाकिस्तान की हिंसा के मुकाबले भारत में तो कोई हिंसा नहीं है। एक जरा सी चिंगारी बढ़कर किस तरह देश को जला सकती है, यह हमने 1992 के पहले की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद को गिराने, गोधरा में ट्रेन को जलाने, और फिर गुजरात के दंगों की शक्ल में देखा हुआ है। यह सिलसिला दुबारा खड़े नहीं होने देना चाहिए। आज बिना हथियार हिन्दू धर्म के ही अलग-अलग तबकों के बीच एक बेइंसाफी खड़ी की जा रही है। गोमांस और गोवंश के मांस को लेकर हिन्दुओं का एक छोटा सा सनातनी तबका, हिन्दू आबादी के ही बहुत बड़े हिस्से को हिन्दू धर्म से दूर धकेल रहा है। और आज जिन गलों में नारों के लायक आवाज की ताकत है, वे लोग इस बात से बेफिक्र हैं कि गाय को लेकर की जा रही सामाजिक-जातीय राजनीति से देश किस तरह कट रहा है, हिन्दू समाज किस तरह से बंट रहा है। किसी देश या समाज में जब धार्मिक या किसी और तरह की हिंसा बढ़ाई जाती है, तो वह धर्मान्ध और कट्टरवादी सोच समाज के कई पहलुओं पर हावी हो जाती है। भारत ऐसे खतरे की तरफ बढ़ रहा है, और पाकिस्तान की हिंसा को देखकर उसे यह सबक लेना चाहिए कि किस तरह अलग-अलग धर्म, जाति, और खानपान के सहअस्तित्व को कायम रखा जा सकता है।

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