बाल मजदूरी के मौजूदा कानून और नए प्रस्तावित कानून का हकीकत से लेना-देना नहीं

संपादकीय
14 मई 2015

भारत के बाल मजदूरी कानून में केन्द्र सरकार ने एक बड़ा बदलाव किया है कि अब 14 साल से कम उम्र के बच्चे भी बिना जोखिम वाले पारिवारिक कामकाज, मनोरंजन उद्योग, और खेल से जुड़े कामों में मजदूरी कर सकेंगे। लेकिन ऐसा काम वे स्कूल के समय को छोड़कर बाकी वक्त में ही कर सकेंगे। इसके साथ-साथ सरकार ने इन रियायतों से परे के बाकी किस्म के काम में बाल मजदूरी करवाने लायक लोगों के लिए सजा बढ़ाने का भी संशोधन किया है। अब ऐसा पकड़ाने पर तीन साल तक कैद दी जा सकेगी, और पचास हजार रूपये तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। 
देश में बाल मजदूरों के अधिकारों के लिए लडऩे वाले लोग ऐसे फेरबदल के खिलाफ हैं, और उनका मानना है कि इससे गरीब बच्चों के स्कूल जाने में कमी आएगी, और मां-बाप चाहे मजबूरी-बेबसी में ही, बच्चों को पारिवारिक काम में लगाएंगे, और उनको स्कूल भेजने की बंदिश लागू करना मुश्किल होगा। 
हम जब भारत में बाल मजदूरी की हकीकत देखते हैं तो सरकार का कानून एक पाखंड लगता है, और बाल मजदूरों के हक के लिए लडऩे वाले आंदोलनकारियों के मुद्दे हवा-हवाई लगते हैं। इस देश भर में किसी भी शहर-कस्बे में चले जाएं, तो हर चौराहे पर चाय ठेले या फुटपाथी होटल पर काम करते ऐसे बाल मजदूर दिखते हैं जिनके हाथ-पैर की उंगलियां पानी में डूबे-डूबे सड़ चुकी होती हैं। वे न सिर्फ बाल मजदूर होते हैं, बल्कि वे बंधुआ मजदूर भी होते हैं। और उन्हीं की उम्र के बच्चों के मां-बाप जो रहते हैं, वे समाज को चलाते, सरकार को चलाते, अदालतों को चलाते, ऐसे बच्चों को देखते चलते हैं। लेकिन निगाहों के सामने के इन बाल मजदूरों से परे के ऐसे करोड़ों बाल मजदूर हिन्दुस्तान में हैं जो कि कारखानों में, गंदी जगहों पर, खतरों के बीच, जहरीली हवा और पानी में बंधुआ मजदूर की तरह काम करते हैं। हिन्दुस्तान की हालत ऐसी है कि बंधुआ बाल मजदूरों की भलाई के लिए काम करने वाले कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिला है। जाहिर है कि इस मोर्चे पर काम करने को इतना अधिक होगा, तभी तो उन्होंने इस पुरस्कार पाने जितना काम किया होगा। 
ऐसे देश में बाल मजदूरी को रोकने का कानून एक बड़ा पाखंड है जो कि सरकार और समाज को यह दिलासा दिलाता है कि वे लोग बच्चों के लिए कुछ कर रहे हैं। दूसरी तरफ बाल मजदूरी के कानून को और कड़ा बनवाने में, उसकी अमल में लगे हुए लोग इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि उनकी कोशिशें बच्चों को किसी सुरक्षित किनारे पहुंचा रही हैं। इन दोनों के बीच बच्चों की बदहाली देखने लायक है, और ऐसा लगता है कि एक नोबल पुरस्कार से ही बच्चों की हालत बदलने वाली नहीं है। 
लेकिन हम भारत की इस आर्थिक हकीकत को भी अनदेखा करना नहीं चाहते जहां पर किसान कर्ज में डूबकर दसियों हजार की संख्या में हर बरस आत्महत्या कर रहे हैं, और जहां पर बड़े-बड़े संपन्न और विकसित प्रदेशों में कुपोषण के शिकार होकर हजारों बच्चे बेवक्त मर रहे हैं, लेकिन खबर नहीं बन पा रही है, ऐसे देश में बच्चों का काम करना बेहतर है या भूखों मर जाना, यह अंदाज लगा पाना बड़ा मुश्किल है। स्कूल की पढ़ाई है तो बहुत अच्छी, लेकिन क्या उसे जिंदगी की कीमत पर ही सुझाया जा सकता है? ऐसे बहुत से तकलीफदेह, और शर्मिंदगी खड़ी करने वाले सवाल भारत में हर चौराहे पर खड़े हैं। बाल मजदूर बहुत से घरों के चूल्हों के लिए जरूरी हैं, और ऐसे घरों को मजदूरी के बजाय पढ़ाई सुझाना पता नहीं किस हौसले के साथ किया जा सकता है। 
हम मौजूदा कानून और प्रस्तावित नए कानून को लेकर आनन-फानन कोई राय देना नहीं चाहते, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि कानूनों का हकीकत से अधिक लेना-देना नहीं है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें