पीएम के स्वागत में अफसरों की पोशाक पर नोटिस, और उससे जुड़ी कुछ बातें

विशेष संपादकीय
15 मई 2015

-सुनील कुमार

प्रधानमंत्री के छत्तीसगढ़ प्रवास पर दो जिलों में उनके स्वागत को खड़े हुए कलेक्टरों को इस बात के लिए नोटिस मिला है कि उनकी पोशाक प्रधानमंत्री की अगुवानी के लिए सरकारी शिष्टाचार नियमों में निर्धारित रस्मी पोशाक नहीं थी। एक कलेक्टर को मिले नोटिस में इस बात को भी आपत्तिजनक माना गया है कि प्रधानमंत्री का स्वागत करते हुए वह धूप का चश्मा लगाए हुए था। पिछले कुछ दिनों से मीडिया और सोशल मीडिया में इन दो कलेक्टरों की तस्वीरें चक्कर लगा रही थीं, और सरकार से उम्मीद की जा रही थी कि इन्हें टांगा जाए। आखिर राज्य सरकार ने इस आधार पर यह नोटिस दिया कि इन्होंने अखिल भारतीय सेवाओं के नियम के एक हिस्से के खिलाफ काम किया है, जो नियम कहता है कि इन सेवाओं के अधिकारी हर समय पूर्णत: सत्यनिष्ठा (इंटिग्रिटी) और समर्पण से काम करेंगे, और ऐसा कुछ नहीं करेंगे जो कि ऐसे अधिकारी से अपेक्षित न हो। 
केन्द्र सरकार का गढ़ा हुआ यह नियम, या शिष्टाचार के पैमाने ऐसे हैं जिनके तहत बहुत सी बातें आ सकती हैं, और आती हैं। जैसे कि पुलिस के पास एक दफा है जो किसी भी गरीब बेबस को गिरफ्तार करने के काम आती है, यह दफा कहती है कि  गिरफ्तार व्यक्ति चोरी की नीयत से, लुकी-छिपी हालत में पाया गया। लेकिन हम आज की इस बहस को आसमान जैसे विस्तार वाले नियमों पर ले जाना नहीं चाहते, केवल सरकारी शिष्टाचार के नियमों और परंपराओं तक सीमित रखना चाहते हैं। मई-जून के महीने में भी जब इस गर्म देश के इसी गर्म प्रदेश में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री पहुंचते हैं, तो चिलचिलाती धूप में भी खुले विमानतल पर अधिकारियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे बंद गले के कोट या जॉकेट में रहें, और ऐसे स्वागत से परे भी सरकार के नियमित कामकाज में बहुत से लोग अपनी पसंद से भी इस किस्म की औपचारिक पोशाक में रहते हैं जो कि इस देश के मौसम के ठीक खिलाफ जाती है। हो सकता है कि सरकार के शिष्टाचार नियम कहते हों कि गर्मी चाहे जितनी हो, धूप चाहे कितनी हो, अफसर को बंद गले के कपड़ों में ही रहना चाहिए, लेकिन एक इंसान की गैरसरकारी, गैरराजकीय, और गैरसामंती सामान्य समझबूझ यह कहती है कि लोगों के कपड़े मौसम और कामकाज के, काम की जगह के हिसाब से सुविधाजनक होने चाहिए। इसलिए अगर केन्द्र सरकार के ऐसे कोई बेवकूफी भरे नियम हैं भी, तो भी उनको एक पार्सल बनाकर उन अंग्रेजों को भेज देना चाहिए, जिनका छोड़ा हुआ मैला सिर पर ढोते हुए भारत में सरकारों और अदालतों के लोग गर्व हासिल करते हैं। 
हमारी इन दो अफसरों के लिए अलग से कोई हमदर्दी नहीं है, और जब तक इस देश में बेवकूफी भरा हुआ ऐसा शिष्टाचार जनता के पैसों से लागू है, तब तक ये अफसर या तो उसे ढोएं, या फिर उसे अदालत में चुनौती दें। हमें सरकार के इस नोटिस से भी कोई शिकायत नहीं है, लेकिन इस देश की सामंती व्यवस्था से शिकायत है जो कि जनता के पैसों से जनता को कुचलते हुए कुछ लोगों के झूठे घमंड को सहलाते हुए कायम है। जिस देश में लाखों बच्चे हर बरस कुपोषण के शिकार होकर मर जाते हैं, वहां का राष्ट्रपति सौ-सौ अरबी घोड़ों पर सवार सौ-सौ गैरजरूरी अंगरक्षकों की परेड में अकबर की तरह चलता है, जहां पर राज्यपालों के साथ बसों में सवार होकर पुलिस बैंड चलता है कि राज्यपाल के कार्यक्रम के पहले और बाद में राष्ट्रगान बजाया जाए, जहां पर सुप्रीम कोर्ट में जज या वकील ऐसे लबादे ओढ़कर चलते हैं, जो कि चित्रकथाओं में मैनड्रेक पहने दिखता है, या कि हॉलीवुड की फिल्मों में सुपरमैन ओढ़े हुए दिखता है, रिवाजों के ऐसे पाखंड से लदे हुए देश पर धिक्कार है। यह सारा तमाशा जनता का पेट काटकर बर्बाद की जाने वाली बिजली से ठंडे किए जाने वाले कमरों में होता है, और जिस देश का आधा हिस्सा अंधकार में डूबे रहता है, वहां पर एक-एक नेता या अफसर जनता के सौ-सौ ट्यूबलाईट जितनी बिजली एक-एक एसी पर खर्च करते हैं। जब अफसरों या मंत्रियों के बीच गर्म महीनों में भी मोटे-मोटे कोट और जॉकेट पहनकर चलने को शान माना जाता हो, जहां अफसरों के लिए इसे शर्त बना दिया गया हो, वहां पर लोगों ने यह सोचना बंद कर दिया है कि इस गर्म देश में यह सिलसिला शुरू कैसे हुआ? 
दरअसल यहां राज करने वाले अंग्रेज एक ठंडे देश से आए थे, और वहां पर बंद और मोटे कपड़े पहनना जिंदा रहने की मजबूरी थी। उन्होंने भारत को आजाद करने के साथ-साथ रिवाजों की जो जूठन छोड़ी, उसे आजादी के आज करीब पौन सदी बाद भी हिन्दुस्तानी गर्व से ढो रहे हैं। ट्रेनों में टीटी से लेकर अदालतों में वकील तक पसीने के मौसम में भी काले कोट पहनने को मजबूर हैं, क्योंकि गोरों के छोड़े गए चिथड़ों से बाहर आने का हौसला हिन्दुस्तानियों में नहीं है। 
ऐसे सारे शिष्टाचार और रिवाज खत्म किए जाने चाहिए जो कि सामंती थे, और सामंती हैं। कल तक वे हिन्दुस्तान के गुलाम लोगों के खून-पसीने से चलते थे, और आज जो हिन्दुस्तान के तथाकथित आजाद लोगों के खून-पसीने से चल रहे हैं। महाराष्ट्र में अभी-अभी मंत्रियों और अफसरों को जिलों में दी जाने वाली पुलिस-सलामी बंद कर दी गई है। इसमें पुलिस की एक सलामी गारद बर्बाद होती थी, जिसे नौटंकी जैसे कपड़े पहनाकर केवल इसी काम के लिए रखा जाता था। जिस देश में विचाराधीन कैदियों को अदालतों तक पेशी पर ले जाने के लिए पुलिस कम पड़ती हो, और बरसों तक बिना सजा कैदी जेल में रहने को मजबूर रहते हैं, वहां पर सलामी के लिए पुलिस का इस्तेमाल पूरी तरह अलोकतांत्रिक और हिंसक है। सत्ता पर बैठे हुए लोगों को इस बात में बड़ा मजा आता होगा कि वे जहां जाएं, वहां उन्हें सलामी मिले। लेकिन ऐसे लोग किसी सलाम के हकदार भी नहीं हो सकते जो कि देश की गरीब जनता के पैसों से इस अंग्रेजी केक की जूठन को लोकतंत्र के फ्रिज में सम्हालकर रख रहे हैं। 
आज हिन्दुस्तान में बहुत सी बुरी सरकारी बातें जनहित याचिकाओं पर अदालती फैसलों से ही खत्म हो पा रही हैं, क्योंकि सत्ता पर बैठे लोग खुद अपनी सामंतशाही को कम करना नहीं चाहते। सरकार के ऐसे तमाम फिजूलखर्च-शिष्टाचार के खिलाफ किसी को अदालत जाना चाहिए, और लोगों के बदन से ऐसे गैरजरूरी कपड़ों की बंदिश खत्म करवानी चाहिए, जिनके लिए जनता की बिजली से कमरों को भारी ठंडा करके रखना जरूरी होता है। आज केन्द्र या राज्य सरकार की बैठकों को देखें, तो तस्वीरों से ठंडक का तो पता नहीं लगता, लेकिन कोट-जॉकेट से यह जरूर पता लगता है कि कमरों को कितना अधिक ठंडा बनाए रखने के लिए, कितनी अधिक बिजली झोंकी जा रही होगी। हिन्दुस्तानियों को, खासकर आजाद हिन्दुस्तान में पैदा होने वाले हिन्दुस्तानियों को इतने दुस्साहस की जरूरत है कि अंग्रेजों के छोड़कर गए हुए हिन्दुस्तान-विरोधी रीति-रिवाजों को, पाखंडों को, जनता के खून से सींचकर जिंदा न रखें, उसे खत्म करें। 
यह बात भी अजीब है कि चिकित्सा विज्ञान धूप में आंखों को बचाए रखने के लिए जिस तरह के चश्मे सुझाता है, वैसा चश्मा लगाने पर एक अफसर को नोटिस मिला है। कल की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चीन की तस्वीरें देखें, तो वे वहां टेराकोटा-आर्मी संग्रहालय के भीतर भी धूप का चश्मा लगाए दिख रहे हैं। अब यह कौन सा शिष्टाचार है कि प्रधानमंत्री का इंतजार करते हुए अफसर धूप में अपनी आंखों को भी अल्ट्रावायलेट किरणों से न बचाए? कई मौकों पर हेलीकॉप्टरों से उडऩे वाली धूल से अपनी आंखों को न बचाए? यह शिष्टाचार और सेवा नियमों के नाम पर एक बड़ा पाखंड है, और किसी हौसलेमंद अफसर या सामान्य नागरिक को इसे अदालत में चुनौती देनी चाहिए ताकि पूरे देश में जनता के पैसों की किस्म-किस्म से बर्बादी टले, और इस देश के लोग अपने मौसम और अपनी जरूरत के मुताबिक आम कपड़ों में रहने की आजादी पा सकें। 

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