मोदी का पहला साल, एक विदेशी मोर्चा और एक देशी मोर्चा बड़े मुद्दे

संपादकीय
16 मई 2015
मोदी सरकार का एक बरस पूरा होने पर देश भर में उसका मूल्यांकन किया जा रहा है। लेकिन मोटे तौर पर यह मूल्यांकन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक सीमित है, और यह पहला साल न सिर्फ उनकी सरकार का एक साल है, बल्कि अपने सबसे करीबी, सबसे भरोसेमंद सहयोगी अमित शाह के अध्यक्ष बनने के बाद का लगभग पहला साल भी है। इसलिए भारत सरकार के मुखिया और पार्टी के परोक्ष मुखिया के रूप में नरेन्द्र मोदी का मूल्यांकन दो पैमानों पर किया जाना चाहिए, और शायद होगा भी। 
हम अभी सरकार की बहुत बारीकियों पर जाना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि चुनाव में मोदी के किए गए वायदे, और आसमान पर दिखाया गया इन्द्रधनुष हकीकत में बदलने के लिए अभी उनके पास चार बरस बाकी हैं। लेकिन अब तक जिन मुद्दों पर मोदी का कामकाज और उनका रूख एकदम खुलकर साफ है, उनकी खूबियां और खामियां साबित हो चुकी हैं, उनकी कामयाबी और नाकामयाबी की मिसालें सामने हैं, उन मुद्दों पर मोदी के पहले साल को कसौटी पर कसने का मौका है। 
नरेन्द्र मोदी यूपीए सरकार के दस बरस, और खासकर बर्बाद आखिरी पांच बरस के बाद एक राजनीतिक और शासकीय शून्य की नौबत में प्रधानमंत्री बने। और जैसा कि आसमानी हवाओं के बीच शून्य बनने पर वहां हवा आंधी बनकर दाखिल होती है, मोदी के साथ कुछ वैसा ही हुआ। छोटी-छोटी बातों पर उनकी खामियां देखने के पहले हम यह याद करना चाहेंगे कि जिस नेता ने केन्द्र सरकार में या पार्टी के केन्द्रीय ढांचे में एक दिन भी काम नहीं किया था, वह नेता आज अंतरराष्ट्रीय मोर्चों पर, और विदेश नीति के मामले में हिन्दुस्तान का सबसे अधिक सक्रिय नेता बन गया है। पहले एक बरस में मोदी ने जितने महत्वपूर्ण देशों के साथ जितने किस्म के संबंध बनाए हैं, उनका नफा-नुकसान तो दिखने में वक्त लगेगा, लेकिन क्या किसी ने एक बरस पहले यह सोचा था कि मोदी अमरीकी राष्ट्रपति को उनका नाम, बराक, लेकर सार्वजनिक रूप से बुलाने वाले नेता कुछ महीनों में ही बन जाएंगे? विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कामयाबी या नाकामयाबी कुछ महीनों के भीतर नहीं दिखती, लेकिन मोदी ने जिस तूफानी रफ्तार से देशों के बीच भारत की खोई हुई जगह को दुबारा स्थापित किया है, वह उम्मीद से दुगुना, और अभूतपूर्व है। 
अब जो दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात मोदी के पहले बरस की है, उन्होंने एक उग्र और आक्रामक हिन्दू नेता की अपनी छवि को सुधारने के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जैसा कि भारत के प्रधानमंत्री को करना चाहिए था, और जैसा करने पर मोदी का कद अपने मौजूदा कद से अधिक बढ़ा होता। उनकी सरकार के मंत्री, उनकी पार्टी के सांसद, उनके सहयोगी संगठनों के अलग-अलग नेता, देश में एक अभूतपूर्व साम्प्रदायिकता और कट्टरता की बात कर रहे हैं, और वे उनको न रोकते दिखते हैं, और न ही उनकी पार्टी रोकने का काम कर रही है। नतीजा यह है कि अमरीकी पत्रिका, टाईम, को मोदी एक इंटरव्यू में जिस तरह की सर्वधर्म समानता की बातें कर रहे हैं, उनकी सरकार, उनकी पार्टी, और उनके साथी वैसा कुछ करते दिख नहीं रहे हैं। हो सकता है कि यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत हो रहा हो, और देश में बहुसंख्यक हिन्दू वोटों को ध्यान में रखते हुए मोदी बिना अपनी जुबान खराब किए हुए, बाकी लोगों को ऐसा कहने की छूट दे रहे हों, लेकिन उनकी सारी अंतरराष्ट्रीय सक्रियता के बावजूद इस घरेलू मोर्चे पर इस एक बरस में वे नाकामयाब रहे हैं। देश में न सिर्फ अल्पसंख्यक समुदायों, बल्कि बहुसंख्यक हिन्दू समाज की एक बहुसंख्यक मांसाहारी आबादी की खानपान की जीवनशैली के खिलाफ जिस आक्रामक अंदाज में गोवंश कानून को लागू करवाया जा रहा है, शायद उसके नुकसान भी मोदी को आज दिख नहीं रहे हैं। 
पिछली सरकार की दस बरस की लंबी आर्थिक नीतियों में फेरबदल करके इस एक बरस में उसके नतीजे तश्तरी पर पेश कर देने का जादू कोई नहीं कर सकता था। इसलिए हम अभी उस मोर्चे का अधिक विश्लेषण यहां करना नहीं चाहते। लेकिन देश के बाहर और देश के भीतर मोदी की जो अतिसक्रियता है, और जिस तरह वे बिना किसी रिमोट कंट्रोल के काम करते दिख रहे हैं, वह अपने आपमें पिछले प्रधानमंत्री के मुकाबले इतने फर्क की बात है कि जनता अभी उसे निहारने में ही लगी हुई है। दरअसल यूपीए ने अपने आपको अपने कुकर्मो से जिस तरह गटर में डाल रखा था, उसके मुकाबले फुटपाथ पर खड़ा कोई आम नेता भी ऊंचे चबूतरे पर खड़ा दिखता। मोदी को अपने पहले एक बरस में यह फायदा मिला है। लेकिन संसद और पार्टी में अपने ऐतिहासिक बाहुबल का इस्तेमाल करके वे अगर देश के एक बड़े नेता बनने का मौका खोकर महज एक हिन्दू नेता बने रहेंगे तो वह महानता का एक मौका खो भी बैठेंगे। मोदी के बारे में हमारा विश्लेषण किसी मोहब्बत और नफरत से परे का है, और उनका यह पहला साल इन दो अलग-अलग मुद्दों के साये तले गुजरा है, बाकी बातें आगे फिर कभी। 

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