अमरीकी नेताओं से हिन्दुस्तानी नेताओं को सीखने की जरूरत...

17 मई 2015
संपादकीय

अमरीकी राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन, और अमरीकी विदेश मंत्री रहीं उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन ने पिछले एक बरस में भाषण देकर करीब डेढ़ सौ करोड़ रूपये कमाए हैं, और एक किताब से करीब तीस करोड़ रूपये और। हिलेरी क्लिंटन अमरीकी राष्ट्रपति के अगले चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हो सकती हैं, और यह पैसा चुनाव में भी काम आ सकता है, या फिर बिल क्लिंटन ने जो लाइब्रेरी बनवाना शुरू किया है, उसमें भी काम आ सकता है, या फिर यह पूरी तरह से निजी कमाई होने से वे इसका निजी इस्तेमाल भी कर सकते हैं। अमरीका में भूतपूर्व राष्ट्रपति इसी तरह खासी कमाई करते हैं, और कई लोग ट्रस्ट बनाकर अपनी पसंद की एक जगह पर लाइब्रेरी भी बनवाते हैं। अमरीकी राष्ट्रपतियों से अलग रूस के राष्ट्रपति रहे मिखाइल गोर्बाच्येव ने भी दुनिया में व्याख्यानमाला में जाकर खासी कमाई की थी। 
संपन्न दुनिया में लोग किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के भाषण सुनकर उससे अपने निजी जीवन में फायदा उठाने के लिए खासा भुगतान भी करते हैं। भारत की राजनीति में देखें तो लोग अपने खर्च पर भीड़ जुटाते हैं, और उन्हें अपनी बात सुनाते हैं। भारत में शायद कोई ऐसा नेता न हो जो कि अपने भाषणों को बेच सकता हो। लेकिन विचारों को बेचना और उससे अपना घर चलाना, अपना चुनाव चलाना एक शानदार तरीका है। लोग सरकार में रहकर दलाली करते हैं, काला धन जुटाते हैं, और भ्रष्टाचार करके पिछले चुनाव के पूंजीनिवेश की वसूली करते हैं, और अगले चुनाव के लिए तैयारी रखते हैं। दरअसल भारत की राजनीति में, यहां के चुनाव में, और देश के तमाम किस्म के बाकी कारोबार में भी कालेधन का हिस्सा इतना अधिक है, इतनी बड़ी समानांतर अर्थव्यवस्था है, कि लोग एक नंबर में काम करना ही नहीं चाहते। और राजनीति में तो दो नंबर के पैसों का इतना बड़ा बोलबाला रहता है, वोटों को इस बेशर्मी के साथ खरीदा जाता है, वोटों के पहले टिकटें खरीदी जाती हैं, चुनाव के दौरान मीडिया खरीदा जाता है कि यहां सफेद पैसों से ये सब काम न किए जाते, और न हो सकते। 
लेकिन भारत को अमरीका से जो कुछ बातें सीखने की हैं, उनमें नेताओं के कमाने के तरीके भी हैं। यह एक अलग बात है कि भारत में उच्च-मध्यम वर्ग या संपन्न तबका, इतने बड़े नहीं हैं, जितने कि अमरीका में हैं। लेकिन वहां भी हर कोई तो टिकट खरीदकर भाषण सुनने नहीं जाते। न ही हर कोई किताबें खरीदते हैं। इन दोनों कामों के लिए जितनी फीस लग सकती हैं, जितने दाम देने पड़ सकते हैं, उतना खर्च उठाने वाले हिन्दुस्तानी भी कम नहीं हैं। इस देश में भी ऐसा सिलसिला शुरू होना चाहिए कि लोगों से टिकट, दाम, या चंदे की शक्ल में कमाई की जा सके। लोगों को याद होगा कि अरविंद केजरीवाल ने जब चुनावी राजनीति शुरू की, तो उन्होंने दावतों का इंतजाम करके उनमें टिकट रखकर लोगों को खाने पर बुलाया था, और खासा पैसा इक_ा किया था। कुछ विवादों को छोड़ दें, तो आम आदमी पार्टी ने इंटरनेट पर भी चुनावी चंदा अच्छा-खासा इक_ा किया था, और दसियों हजार लोगों ने अपने नाम से अपना एक नंबर का पैसा दिया था। इस देश में बाकी लोगों को भी जनता के बीच से पैसा जुटाने के लिए भाषण या किताब जैसी तरकीबें इस्तेमाल करनी चाहिए, इससे उनकी ताकत भी साबित होगी, और वे खुद, उनकी पार्टी कालेधन पर निर्भर रहने के बजाय ईमानदारी से काम कर सकेंगे। 

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