पटरियों पर ऐसे आंदोलन का हक किसी को नहीं

संपादकीय
23 मई 2015

राजस्थान में एक बार फिर आरक्षण की मांग को लेकर गुर्जर समुदाय पटरियों पर। लोगों को याद होगा कि पिछले बरस भी गुर्जरों ने पटरियों पर इतना लंबा धरना दिया था कि राजस्थान से होकर गुजरने वाली गाडिय़ां अस्थायी रूप से बंद ही कर दी गई थी। अब इतनी गर्मी में धरने के लिए गुर्जरों ने पटरियों पर तंबू तान दिए हैं, और  एक बार फिर रेलगाडिय़ां रद्द हो गई हैं। 
चूंकि यह एक से अधिक बार हो चुका है, और देश के अलग-अलग कुछ राज्यों में दूसरे लोगों ने भी रेलगाडिय़ों को रोककर विरोध करने का या मांग मनवाने का ऐसा आंदोलन किया है, इसलिए इस बारे में बात होनी चाहिए। रेलगाड़ी देश के बदन की नसों की तरह है जिनसे पूरा बदन काम करता है। अब कोई इसे कोई इन नसों को ब्लेड से काट दे, तो बदन का जो हाल होगा, वह हाल देश का हो सकता है। और रेलगाडिय़ों को रोकना अकेले गुर्जर समाज का हक नहीं है, देश में जगह-जगह बहुत से ऐसे संगठन है जिनके लंबे आंदोलन चल रहे हैं। आज अगर विदर्भ में राज्य की मांग को लेकर रेलगाडिय़ां रोक दी जाएं, बंगाल में राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के खिलाफ अगर वामपंथी रेलगाडिय़ां रोक दें, अगर आन्ध्र में किसानों की आत्महत्या का विरोध करते हुए पटरियों के किनारे के खेतों वाले किसान आकर पटरियों पर लेट जाएं, तो देश की धड़कन ही थम जाएगी। 
हमारा ख्याल है कि सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर ऐसी नौबत में दखल देना चाहिए, और बड़ी कड़ाई के साथ यह नियम लागू करना चाहिए कि रेलगाडिय़ों को रोकना किसी भी कीमत पर मंजूर न किया जाए। इन गाडिय़ों में बहुत से बीमार इलाज के लिए जाते हैं, बहुत से लोग इम्तिहान देने और नौकरी पाने जाते हैं। ऐसी जिंदगियां तबाह करने का हक किसी भी आंदोलन को, और किसी भी मांग को नहीं दिया जा सकता। पूरे देश में जगह-जगह कई तबके आरक्षण की मांग कर रहे हैं, वे सबके सब क्या पटरियों पर बैठकर देश को रोक दें? जब किसी शहर की सड़कों पर किसी प्रदर्शन के चलते, या किसी और वजह से ट्रैफिक जाम होता है, तो उसमें भी जगह-जगह मरीजों की जान जाती है। रेलगाडिय़ों में तो बड़ी संख्या में लोग चलते हैं, और उन सबके बस में यह नहीं रहता कि गाड़ी रद्द होने पर दूसरी गाड़ी में जगह पा सकें, या कि लंबा चक्कर लगाकर कहीं पहुंच सकें। 
किसी आंदोलन या समाज में अगर इतना घमंड आ जाता है कि वे कानून को कुचलकर रेलगाडिय़ों को हफ्तों तक रोक सकते हैं, तो इस देश को अपनी कानूनी ताकत का इस्तेमाल करके ऐसे लोगों को जेल में डालना चाहिए, और जेल जाकर फिर वे वहां अपना आंदोलन चलाते रहें। किसी समुदाय या कुछ आंदोलनकारियों की नाराजगी से बचने के लिए राज्य सरकारें उन पर कड़ी कार्रवाई नहीं करतीं, यह रूख अपनी जिम्मेदारी से बचने का है, और ऐसी सरकारों पर सुप्रीम कोर्ट को कार्रवाई करनी चाहिए। जब हालात स्थानीय प्रशासन या स्थानीय पुलिस की ताकत के बाहर बेकाबू होने लगें, तब भी बाहर से केन्द्र सरकार और सुरक्षा बलों को भेज सकती है, और आंदोलनकारियों से परे की आम जनता के अधिकारों को कायम कर सकती हैं। इस तरह के आंदोलन घातक और जानलेवा हैं, और इनको कड़ाई से बंद करवाने की जरूरत है। अपनी मांगों के लिए किसी को यह हक नहीं मिल सकता कि वे दूसरों की जिंदगी तबाह करें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें