बयालीस बरस की बेहोशी के बाद की मौत से उठे सवाल

संपादकीय
18 मई 2015

मुम्बई के एक नामी अस्पताल में वहीं के एक वार्डब्वॉय के हमले और बलात्कार की शिकार एक नर्स आज 42 बरस लंबे कोमा के बाद चल बसी। उसे जिंदा रखने को वहां की नर्सों ने एक चुनौती माना था, और सबने रात-दिन मेहनत करके उसे जिंदा रखा था, लेकिन उसकी हालत पूरी तरह की बेहोशी की थी। और यह अस्पताल के समर्पित सहकर्मियों की वजह से ही मुमकिन हो पाया था कि वह जिंदा रही, और बिस्तर पर लगातार रहने से होने वाले जख्मों से बची भी रही। उसकी मौत ने एक बार फिर बलात्कार की तरफ ध्यान खींचा है, और चारों तरफ अस्पताल की नर्सों की तारीफ भी हो रही है कि पेशे का समर्पण ऐसा होता है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट तक एक अपील भी की गई थी कि ऐसे जिंदगी के बजाय उसे गुजर जाने की इजाजत दी जानी चाहिए, लेकिन नर्सों के समर्पण को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी। उसके परिवार ने भी उसे बहुत बरस पहले भुला दिया था। 
अब इस मौत के बाद एक सवाल यह उठता है कि क्या जीवनरक्षक तरीकों से किसी मरीज को इस हालत में इतनी लंबी जिंदगी देने का कोई औचित्य है? सहकर्मी नर्सों ने जो बीड़ा उठाया था, वह उनके पेशे की निष्ठा भी थी, और सहकर्मी के लिए उनका अतिरिक्त समर्पण भी था। लेकिन इस देखरेख से परे भी एक अस्पताल की सुविधाएं 42 बरसों तक इस हाल में पहुंच चुकी जिंदगी की बस सांसों को जारी रखने के लिए लग रही थीं, और इस देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें अस्पतालों में मामूली इलाज भी नहीं मिल पाता है।
 यहां पर दो-तीन अलग-अलग मुद्दे उठते हैं। पहला तो यह कि जब जिंदगी से परे एक धड़कन वाले मुर्दा शरीर जैसी हालत हो जाए, तो उसे कब तक जारी रखना चाहिए? एक दूसरा मुद्दा कल ही हमने छापा है कि किस तरह दक्षिण भारत में कोमा में चले गए, और दिमाग से मर चुके एक आदमी के परिवार ने उसके हाथों को अफगानिस्तान के एक ऐसे जख्मी को दान किया जिसके दोनों हाथ कट चुके थे। और अब लंबे ऑपरेशन के बाद वे हाथ फिर से एक चलते-फिरते जिंदा शरीर में काम आ रहे हैं। क्या लोगों की स्थायी बेहोशी, या कोमा, या दिमागी मौत की हालत ने उनके अंग दूसरों के काम नहीं आने चाहिए? क्या ऐसी बेहोश जिंदगी के बजाय एक सम्मानपूर्ण मौत देना बेहतर नहीं है? 
ऐसा ही एक दूसरा मामला कुछ बरस पहले दिल्ली से सामने आया था जब वहां एक सरकारी अस्पताल में भर्ती एक मरीज 19 बरस बाद कोमा में ही चल बसा था। वह वहां का एक दमकल कर्मचारी था, जिसे कि मुफ्त इलाज का अधिकार था, इसलिए उसे अस्पताल का एक कमरा मिल गया, और 19 बरस की बेहोशी के बाद उसकी लाश ही वहां से निकली। इन बरसों में पूरा परिवार उस बेहोश आदमी के साथ अस्पताल में रहते, आते-जाते तबाह हो गया था। ऐसी जिंदगी भी क्या जिंदगी जो कि पूरे घर का जीना खत्म कर दे? और दक्षिण भारत की यह मिसाल सामने है जिसमें परिवार के लोगों ने दिल कड़ा करके अपने घर के एक धड़कते हुए आदमी के दोनों हाथ दान कर दिए। दुनिया में जगह-जगह ऐसे मामले सामने आते हैं जिसमें एक छोटे बच्चे को शरीर के अंगों ने आधा दर्जन लोगों तक को नई जिंदगी दी है। 
लोगों को अपने जीते-जी अपने परिवार के लोगों को तैयार करना चाहिए कि वे उनकी ऐसी नौबत होने पर अस्पतालों में उन्हें अंतहीन जिंदा रखने की कोशिश न करें। ऐसा करके कई लोग परिवार को दीवालिया भी बना देते हैं, और अधिकतर मामलों में परिवार का जीना हराम हो जाता है। जिंदगी को लंबा खींचने वाले मेडिकल-उपकरणों की क्षमता तो अंतहीन हो सकती है, लेकिन जिंदगी के मोह को छोडऩा भी जरूरी है। भारत में अभी स्वैच्छिक मृत्यु, यूथेनेसिया, पर बहस चल रही है। कानून अभी बहुत दूर है। लेकिन भारत के कुछ धर्मों में पहले से ऐसी परंपराएं हैं कि लोग आखिरी वक्त करीब पाकर, या मृत्यु चाहने पर, खाना-पीना बंद करके मौत की तरफ बढ़ जाते हैं। हम इनसे परे फिलहाल सबसे आसान, और शायद सबसे मुश्किल भी, रास्ता सुझा रहे हैं कि कोमा में जाने के बाद कृत्रिम सांस देकर जिंदगी को लंबा नहीं खींचना चाहिए, और दो-चार दिन की कोशिश के बाद शरीर के अंग दान करने की वसीयत हर जिम्मेदार व्यक्ति को करके जाना चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें