बुराई के खिलाफ खड़ी होती लड़कियों के साथ समाज और सरकार के खड़े होने की जरूरत

संपादकीय
02 मई 2015

पिछले कुछ दिनों से सामाजिक तनाव की कुछ बहुत अच्छी खबरें आ रही हैं। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सहित कुछ राज्यों में शादी के बीच ही दुल्हनों ने फेरों से या निकाह से इंकार कर दिया, क्योंकि दूल्हा और उसके  साथ के लोग नशे में थे, या गालियां बक रहे थे, या दुल्हन को दूल्हे के बारे में कुछ और बुरी बातें पता लग गई थीं। एक खबर तो इनसे भी ऊपर यह थी कि एक स्कूली छात्रा को मां-बाप ने जबर्दस्ती शादी में डालना चाहा, तो जबर्दस्ती करवाए गए फेरों के बाद भी उसने पुलिस को खबर की, और मां-बाप से भी टकराव मोल लिया। अब पुलिस ने दोनों तरफ के परिवार वालों के खिलाफ जुर्म कायम कर लिया है। 
यह एक अलग किस्म की जागरूकता सामने आ रही है, और जिस तरह से दुनिया में बुरी बातें फैलती हैं, अच्छी बातें भी फैलती हैं। इस जागरूकता से अगर बाकी लड़कियां भी प्रेरणा लेती हैं, और गलत किस्म के लोगों से हो रहे रिश्तों के खिलाफ उठकर खड़ी होती हैं, तो यह भारतीय समाज में एक अलग किस्म की क्रांति हो सकती है। पिछले बरसों में हमने देखा है कि छेडख़ानी और बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने के लिए अब अधिक लड़कियां और महिलाएं सामने आती हैं, इतनी अधिक की भारत में कुछ ऐसा माहौल लगने लगा है कि बलात्कार कई गुना बढ़ गए हैं। हो सकता है कि महज उनकी शिकायत बढ़ी हो। और आज स्कूली किताबों में जिस तरह से सामाजिक जागरूकता के पाठ जोड़े जा रहे हैं, छत्तीसगढ़ में ही पांचवीं की किताब में बच्चों को यौन-शोषण से सावधान करने का एक लंबा पाठ जोड़ा गया है, इसी प्रदेश में एक दूसरी स्कूली किताब में किन्नरों को भी बराबरी का इंसान मानने की समझ देने वाला पाठ जोड़ा गया है, उसी तरह बाल विवाह के खिलाफ भी जागरूकता फैलाई जा सकती है। 
आज ही एक दूसरी खबर बिहार के नालंदा से है, और वहां पर महिलाएं लाठियां लेकर मुंहअंधेरे निकलती हैं और बस्ती के पास खुले में शौच करने वाले लोगों को खदेड़कर भगाती हैं। इससे शौचालय बनाने को लोग बेबस होंगे। कुछ जगहों से ऐसी भी खबरें आती हैं कि सरकारी प्रचार अभियान के असर में आकर लोग अब ऐसे गांवों या घरों में अपनी बेटियों का रिश्ता नहीं करते जिन घरों में शौचालय नहीं हैं। छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर हमने शराब दुकानों और शराब की अवैध बिक्री के खिलाफ महिलाओं के आंदोलन देखे हैं, और शराब बेचने वाली छत्तीसगढ़ सरकार अपने उसी विभाग के तहत लगातार महिलाओं को ऐसे आंदोलन के लिए बढ़ावा देने का काम भी कर रही है। 
महिलाओं को पढ़ाने के बारे में एक नारा बहुत पहले से चले आ रहा है कि एक लड़का अगर पढ़ता है तो वह अकेले शिक्षित होता है, लेकिन अगर एक लड़की पढ़ती है तो वह पूरे घर को पढ़ाती है, पूरा परिवार शिक्षित होता है। भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं के साथ हजारों बरस से चली आ रही बेइंसाफी के बावजूद आज भी अगर लड़कियां और महिलाएं जिंदा हैं, तो इसलिए हैं कि वे तन और मन दोनों से आदमियों के मुकाबले अधिक मजबूत रहती हैं। ऐसे में समाज को उनकी ताकत और उनके हौसले, दोनों को बढ़ावा देना चाहिए। पिछले दिनों में गलत किस्म के आदमी से होते रिश्ते के खिलाफ खड़ी होने वाली लड़कियों के बारे में मीडिया में भी तारीफ की खबरें छपी हैं, और समाज के लोगों ने भी उनका हौसला बढ़ाया है। यह सिलसिला आगे बढऩा चाहिए। सरकार और समाज इन दोनों को अपनी पूरी ताकत लगानी चाहिए कि समाज सुधार के लिए उठकर खड़ी होने वाली लड़की अकेली न रह जाए। इसके लिए स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम में लड़कियों और महिलाओं के सामाजिक और कानूनी अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़ के स्कूल-शिक्षा विभाग ने अपनी पाठ्य पुस्तकों में जिस तरह के साहसी जागरूकता वाले हिस्से जोड़े हैं, उसी तरह के सुधारवादी हिस्से जिंदगी के दूसरे जरूरी पहलुओं को लेकर जोड़े जाने चाहिए। स्कूल से कॉलेज तक अगर बच्चों में हौसला भरा जाएगा, तो बड़े होकर वे एक बेहतर समाज बनाएंगे।

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